कौन हैं शाहीन बाग के शहजाद अली, जो बीजेपी ज्वाइन करने से चर्चा में हैं

कौन हैं शाहीन बाग के शहजाद अली, जो बीजेपी ज्वाइन करने से चर्चा में हैं
बीजेपी ज्वॉइन करने वाले एक्टिविस्ट शहज़ाद अली. चित्र एएनआई से साभार.

100 दिनों से भी ज़्यादा चले चर्चित विरोध प्रदर्शन (Anti CAA Protests) में कथित तौर पर शामिल रहे अली ने कहा कि वो CAA पर भाजपा नेताओं से बात करेंगे, लेकिन ये नहीं बताया कि क्या वो अब भी सीएए रद्द किए जाने के पक्ष में हैं, जो शाहीन बाग प्रदर्शन (Shaheen Bagh Protests) की प्रमुख मांग थी! शाहीन बाग प्रदर्शनों से क्या सच में जुड़े थे अली? जानिए पूरा ब्योरा.

  • News18India
  • Last Updated: August 19, 2020, 5:03 PM IST
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भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई (Delhi BJP) ने बीते रविवार को एक एक्टिविस्ट शहज़ाद अली, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. महरीन और आम आदमी पार्टी (AAP) की पूर्व कार्यकर्ता तबस्सुम हुसैन (Tabassum Hussain) सहित करीब 200 लोगों को पार्टी सदस्य के तौर पर शामिल किया, तबसे खलबली मची है. वजह यह है कि खास तौर से अली को शाहीन बाग विरोध प्रदर्शनों (Shaheen Bagh Protest) का एक आयोजक बताकर कहा गया है कि शाहीन बाग विरोध के पीछे रहे 'एजेंडे' का पर्दाफाश हो गया है.

अली के दावे के मुताबिक उनके साथ करीब 200 मुस्लिमों ने बीजेपी की सदस्यता ली है, जिनमें से करीब 50 शाहीन बाग निवासी हैं. अली ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक पार्टियों ने जिस तरह भुनाने की कोशिश की, उससे नाराज़ होकर उन्होंने नागरिकता संशोधन एक्ट यानी सीएए पर भाजपा में रहकर भाजपा नेताओं से संवाद करने का मन बनाया.

पहला सवाल तो यही है कि ये शहज़ाद अली कौन हैं? क्या ये वास्तव में शाहीन बाग​ विरोध प्रदर्शनों में बतौर आयोजक शामिल रहे हैं? दूसरा सवाल ये है कि अली को पार्टी में शामिल करने से भाजपा क्या संदेश देती है और भाजपा नेतृत्व के सामने क्या सवाल खड़े होते हैं? इन तमाम बातों को सिलसिलेवार ढंग से जानना ज़रूरी है.



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राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल द्वारा अली को नियुक्त किए जाने का यह पत्र सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ.

कौन हैं शहज़ाद अली?
हर शख़्स का एक अतीत होता है और इसी के ज़रिये किसी को समझने में मदद मिलती है. शाहीन बाग विरोध प्रदर्शनों के पहले से अली राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल नाम की संस्था से जुड़े रहे हैं. फरवरी 2019 में उन्हें इस संस्था का दिल्ली का प्रदेश सचिव बनाया गया था. इसके अलावा, द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक अली भारतीय सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SDPI) और भारतीय पॉपुलर फ्रंट (PFI) से भी जुड़े रहे हैं.

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फरवरी में दिल्ली चुनाव के दौरान अली ने SDPI के ओखला उम्मीदवार तस्लीम अहमद रहमानी के लिए खुलकर प्रचार किया था. द वायर के मुताबिक रहमानी ने अली के सहयोग की बात मानी है. वहीं, अली की फेसबुक के रिकॉर्ड के हवाले से कहा जाता है कि उन्होंने गुजरात में विधायक जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ जातिगत भेदभाव वाली व आपत्तिजनक भाषा (नमकहराम, धोखेबाज़, एहसानफरामोश और मक्कार) का इस्तेमाल किया था.

इसके अलावा, एक वीडियो में अली ​कथित तौर पर मेवाणी के खिलाफ भद्दी भाषा के प्रयोग के लिए माफी मांगते भी दिखे. 17 सालों से शाहीन बाग में रहने का दावा करने वाले अली खुद को वर्तमान में एक्टिविस्ट बताते हुए मीडिया से कह चुके हैं कि वो पहले मोबाइल इंडस्ट्री में सेल्स विभाग में काम करते थे. अली मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से ताल्लुक रखते हैं.

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सीएए के विरोध में 100 दिनों से ज़्यादा समय तक लगातार चला शाहीन बाग प्रदर्शन.


सच में शाहीन बाग प्रदर्शन से जुड़े रहे अली?
अली ने इस बारे में मीडिया में खुलकर बात की है और दावा किया कि वो शाहीन बाग में ही रहते हैं तो बेशक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा रहे और सबूत के तौर पर रिकॉर्डेड इंटरव्यू हैं. अली ने यह भी दावा किया शाहीन बाग और आसपास के इलाकों से 200 से ज़्यादा लोगों ने उनके साथ बीजेपी की सदस्यता ली. लेकिन, सवाल ये है कि अली के इस दावे को समर्थन क्यों नहीं मिला? शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन की प्रमुख आयोजक रितु कौशिक के हवाले से द प्रिंट की रिपोर्ट कहती है :

इस विरोध प्रदर्शन में सैकड़ों और हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया, लेकिन इस विरोध प्रदर्शन की खूबी यही थी कि कोई नेता इसका चेहरा नहीं था. हमारी दादियों और नानियों को ​इस विरोध प्रदर्शन को ज़िंदा रखा. अली जैसे लोग कभी इस विरोध के केंद्र में नहीं रहे.


इस रिपोर्ट में प्रदर्शनकारियों के हवाले से ये भी कहा गया कि अली पूरे प्रदर्शन में महत्वहीन व्यक्ति रहे. उनका कोई योगदान नहीं रहा. वहीं, वायर की रिपोर्ट में भी सक्रिय प्रदर्शनकारी रहे शोएब जमई के हवाले से लिखा गया कि शाहीन बाग में कई लोग आते थे, इसका मतलब ये नहीं कि सभी प्रदर्शनकारी थे. अली कभी प्रदर्शनकारियों की मुख्य मीटिंगों में शामिल नहीं रहे.

शाहीन बाग प्रदर्शन में शामिल रहीं एक दादी गुलबानो ने भी कहा कि प्रदर्शन में कोई सियासी आदमी शामिल नहीं था. लोग आते थे, बोलते थे, कविताएं सुनाते थे और चले जाते थे. गुलबानो को याद नहीं कि अली प्रदर्शन में कब और कैसे सक्रिय थे.

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अली के भाजपा ज्वाइन करने के बाद ट्विटर पर इस तरह की प्रतिक्रियाएं भी दिखीं.


विरोध प्रदर्शन को बदनाम करने की चाल?
अली और उनके सहयोगियों के बीजेपी ज्वाइन करने की खबरों के बाद शाहीन बाग से जुड़े प्रदर्शनकारी साफ तौर पर यही कह रहे हैं कि यह उनके प्रदर्शन को बदनाम करने की चाल है. अली जैसे लोगों के ज़रिये प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों की छवि खराब की जा रही है. वहीं, आम आदमी पार्टी ने खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए कह दिया कि 'साबित हुआ कि शाहीन बाग प्रदर्शन स्क्रिप्टेड था, जो चुनाव के मद्देनज़र भाजपा के इशारे पर चल रहा था.'

लेकिन इन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक खास बात निकलकर यह सामने आ रही है कि शाहीन बाग के प्रदर्शनकारी साफ कह रहे हैं कि उन्हें 'सीएए और एनआरसी से दिक्कत रही है, भाजपा से नहीं'.

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भाजपा से किए जा रहे हैं ये सवाल
पार्टी में अली का स्वागत करने वाली भाजपा के सामने जो अहम सवाल खड़े हो रहे हैं, वो इस तरह हैं :

* राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल कथित तौर पर बीजेपी की शह पर खड़ी हुई संस्था है, जिससे अली शाहीन बाग घटनाक्रम के पहले से जुड़े रहे. ऐसे में अली की भाजपा में एंट्री क्या मायने रखती है?
* दिल्ली दंगों की बात रही हो या हालिया बेंगलूरु हिंसा की, भाजपा SDPI और PFI जैसे संगठनों या पार्टियों पर न केवल सवाल खड़े करती रही, बल्कि इन पर गंभीर आरोप लगाती रही है. इन दोनों से संबद्ध रहे अली के स्वागत से भाजपा क्या संदेश दे रही है?
* कभी दलितों के खिलाफ मुखर रहे, तो कभी समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव के बगलगीर दिखे अली को पार्टी में जोड़ना क्या भाजपा का प्रोपैगेंडा है ताकि शाहीन बाग प्रदर्शन के बारे में गलत आमराय बने?
* गृह मंत्री अमित शाह से लेकर दिल्ली के नेता प्रवेश वर्मा तक कई भाजपा नेताओं ने शाहीन बाग प्रदर्शनकारियों को कड़े शब्दों में कोसा था, तो अब शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों का पार्टी में स्वागत क्यों?

कुल मिलाकर, दक्षिण पूर्व दिल्ली के पास स्थित शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से रहे, लेकिन दिल्ली चुनाव के समय उत्तर पूर्व दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों से इन प्रदर्शनों की छवि खराब हुई. कई तरह से राजनीति के अखाड़े बन चुके इस प्रदर्शन के नाम पर अली का भाजपा में जाना एक अवसरवाद है, या ये प्रदर्शन ही 'प्रोपैंगेंडा' का हिस्सा थे, अब यह वक्त ही बताएगा.
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