क्यों दक्षिण भारत की सियासत में बेहद कामयाब हैं फिल्मी सितारे?

रजनीकांत और कमल हासन (File Photo)

रजनीकांत और कमल हासन (File Photo)

Tamil Nadu Assembly Elections 2021: पहली बात है क्षेत्रीय विचारधारा से जुड़ी हिस्ट्री और दूसरी कि कैसे फिल्मों को पॉलिटिक्स के लॉंच पैड के तौर पर इस्तेमाल किया गया! बॉलीवुड (Bollywood) हो या बंगाली सिनेमा (Bengal Cinema), कलाकारों ने बड़ा जोखिम नहीं लिया.

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  • Last Updated: April 6, 2021, 12:19 PM IST
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दक्षिण कोयंबटूर सीट (Coimbatore South) से दिग्गज एक्टर कमल हासन (Kamal Haasan) चुनाव लड़ रहे हैं. असम, केरल, पांडिचेरी और पश्चिम बंगाल के साथ ही तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में आज 6 अप्रैल वोटिंग डे (Voting Day) है. खबरों के मुताबिक बेहद लोकप्रिय रजनीकांत (Rajinikanth) और हासन मतदान कर चुके हैं. हासन उन दिग्गज नामों की लिस्ट में शुमार हो गए, जो सिनेमा जगत से राजनीति में आए.

तमिलनाडु में जयललिता रही हों, या करुणानि​धि या फिर एमजी रामचंद्रन - फिल्मी जगत से जुड़ी ये हस्तियां मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब रही हैं. एमजी रामचंद्रन पहले दिग्गज अभिनेता थे, ​जो मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए. अविभाजित आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने भी यह उपलब्धि हासिल की थी. आखिर दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में एक्टर सियासत में इतने कामयाब क्यों और कैसे होते रहे?

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क्या सच में बड़ी है ये कामयाबी?
एक वर्ग यह भी मानता है कि दक्षिण की सियासत में जितनी बड़ी संख्या में सिने सितारे कूदे, उनमें से बड़ी कामयाबी कम के ही हिस्से में आई. यानी अनुपात काफी कम रहा. दूसरी तरफ भारत के अन्य हिस्सों से तुलना में देखें तो दक्षिण के ये स्टार काफी कामयाब दिखते हैं. उत्तर भारत में एक्टिंग की पृष्ठभूमि से आकर सीएम की कुर्सी तक पहुंचने की मिसाल नहीं मिलती.

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न्यूज़18 कोलाज


सुनील दत्त, शत्रुध्न सिन्हा और विनोद खन्ना ऐसे नाम जरूर रहे, जिन्होंने बॉलीवुड से केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय किया, लेकिन दक्षिण भारत में जिस तरह फिल्मी ब्रिगेड ने राजनीतिक वर्चस्व हासिल किया, वैसा किसी और हिस्से में नहीं दिखा. पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई फिल्मी सितारे दिखते हैं. हाल में मिथुन चक्रवर्ती भी सुर्खियों में रहे, लेकिन यहां भी उन्हें भीड़ खींचने वाली स्टार पावर के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता रहा. हालांकि ये बात सही है कि लोकसभा चुनावों में फिल्मी सितारे अक्सर जीत हासिल करते रहे हैं.



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दक्षिणी सितारों का लेखा जोखा?

अन्नादुरई से लेकर कमल हासन तक तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ राजनीति केंद्र में रही. तमिलनाडु के पहले सीएम अन्नादुरई का नाता फिल्मों से रहा. उन्होंने फिल्मों की स्क्रिप्ट्स में द्रविड़ विचारधारा को परोसने की शुरूआत की थी. 1952 की एक तमिल फिल्म "पराशक्ति" इस मामले में टर्निंग पॉइंट कही जाती है, जिसकी स्क्रिप्ट करुणानिधि ने लिखी थी.

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शिवाजी गणेशन स्टारर इस फिल्म ने राज्य में द्रविड़ जनता को केंद्र में रख दिया था. इसके बाद से यहां द्रविड़ राजनीति ज़ोर शोर से शुरू हुई. फिल्मों का काफी असर ब्रिटिश काल से ही राज्य में रहा. पूर्व केंद्रीय नेता और डीएमके के नेता मुरासोली मारन ने एक बार कहा था कि कांग्रेस के समय में सेंसर बोर्ड के ज़रिये कई सीन फिल्मों से काट दिए जाते थे ताकि द्रविड़ विचार को तरजीह न मिले. जर्मन वेबसाइट "डैशविले" की एक रिपोर्ट में पत्रकार सदानंद मेनन के हवाले से कहा गया :

1967 से 1969 के बीच जब एक्टर्स और स्क्रिप्ट लेखक द्रविड़ राजनीति में उतरे, तबसे ही उनका एक जनाधार साफ दिखता रहा है, जिसे सिनेमा के राजनीति में प्रभाव की शुरुआती बड़ी लहर समझा जाना चाहिए.


फिल्मों के इतिहासकार मानते हैं कि द्रविड़ पार्टियों के अब तक 07 मुख्यमंत्रियों में 05 का सीधा संबंध फिल्मी दुनिया से या तो बतौर एक्टर रहा या लेखक/कलाकार. इसी तरह, आंध्र प्रदेश में भी फिल्मी कलाकारों ने राजनीति में बड़ी परिभाषाएं गढ़ीं.

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लंबे समय तक तमिलनाडु की राजनीति करुणानिधि बनाम जयललिता ही रही.


उत्तर और दक्षिण में क्या फर्क?

साउथ में यह ट्रेंड साफ दिखता रहा है कि फिल्मी सितारे अपनी अगुवाई में नई पार्टी बनाने से परहेज़ नहीं करते. तमिल पॉलिटिक्स हो या तेलुगु, फिल्मी कलाकारों ने राजनीति के किलो को ढहाने के लिए हौसला दिखाया है. इसके बरक्स उत्तर या भारत के ​अन्य हिस्सों में फिल्मी कलाकार किसी न किसी पार्टी के बैनर तले ही राजनीति में आते दिखे हैं.

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सुपरस्टार अमिताभ बच्चन हों या ड्रीम गर्ल खिताब वाली हेमा मालिनी, जया प्रदा रही हों स्वरा भास्कर, सभी ने किसी न किसी पार्टी का दामन थामने में ही दिलचस्पी दिखाई है. नई पॉलिटिकल पार्टी खड़ी करने के जोखिम के मामले में बॉलीवुड के नहीं बल्कि साउथ फिल्म इंडस्ट्री के चिंरजीवी, पवन कल्याण जैसे स्टारों के नाम लगातार आए.

कितना बड़ा है जनाधार?

मशहूर फिल्म क्रिटिक शुभ्रा गुप्ता कह चुकी हैं कि तमिलनाडु के जनमानस में यह बहुत यूनिक बात रही है कि फिल्मी कलाकारों को लेकर वो काफी वफादार रहे. असल में इसका बहुत बड़ा कारण यह रहा कि तमिल एक्टरों ने बड़ी संख्या में पौराणिक कथाओं के किरदारों को निभाया और जनता के बीच उनकी छवि धार्मिक भावनाओं से जुड़कर बनी रही.

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चिंरजीवी और पवन कल्याण


एमजीआर की बात करें या रजनीकांत तक की, इन सितारों का फैन बेस दक्षिण भारत में जिस स्तर तक रहा है, संभवत: हिन्दी या उत्तरी सिनेमा के किसी कलाकार का नहीं रहा. लोकप्रियता केवल लोकप्रियता तक नहीं, बल्कि दक्षिणी कलाकारों के लिए पूजा तक पहुंचती रही है. फिल्म इतिहासकार अंबुमणि एक और पहलू बताते हैं :

तमिल और तेलुगु फिल्में राजनीति की शुरूआत के लिए प्रोपैगैंडा मशीन की तरह रहीं. कई लोगों ने यह समझ लिया था कि फिल्मों के ज़रिये जनता के मन तक छाप बनाई जा सकती है इसलिए उन्होंने राजनीति में आने का ज़रिया फिल्मों को बनाया गया.


कुल मिलाकर फैक्ट यह है कि दक्षिण की राजनीति में सिनेमाई कलाकारों का वर्चस्व साफ रहा है. चूंकि रजनीकांत सक्रिय राजनीति में आने में हिचकिचाहट दिखाते रहे हैं, तो अब कमल हासन पर उन लोगों की नज़रें टिकी हैं, जो दक्षिण की सत्ता की स्टारकास्ट में खासी दिलचस्पी लेते हैं.
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