क्यों अंबाला एय़रबेस पर ही उतर रहे हैं राफेल? स्क्वाड्रन 17 से क्या है रिश्ता?

क्यों अंबाला एय़रबेस पर ही उतर रहे हैं राफेल? स्क्वाड्रन 17 से क्या है रिश्ता?
फ्रांस से भारत के लिए राफेल का पहला बैच संयुक्त अरब अमीरात पहुंच चुका है.

चार साल पहले राफेल सौदे (Rafale Deal) के समय या सितंबर 2019 में नंबर 17 स्क्वाड्रन (No. 17 Squadron) को दोबारा जीवन मिलने के वक्त... या जब पिछले साल अक्टूबर में फ्रांस की दासॉल्ट की प्रोडक्शन यूनिट से पहला राफेल मिला था, तब भी किसने सोचा था कि देश को राफेल विमानों की पहली खेप मिलते वक्त भारत और चीन सीमा (India-China Border) पर हालात मुश्किल होंगे.

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  • Last Updated: July 28, 2020, 12:38 PM IST
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भारत पहुंचने के लिए फ्रांस से रवाना हो चुके 5 राफेल विमान (Rafale Jet) 27 जुलाई को अल दाफरा एयरबेस पर पहुंच चुके हैं. राफेल फाइटर जेट की यह पहली खेप कल यानी 29 जुलाई की सुबह उड़कर भारत के अंबाला एयर फोर्स स्टेशन (Ambala Air Force Station) पर दोपहर तक पहुंचने की उम्मीद है. भारतीय सेना (Indian Air Force) के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना बनने जा रहे राफेल विमानों के लिए भारत में अंबाला एयरबेस (Ambala Airbase) को रणनीतिक और सामरिक महत्व के कारण चुना गया है.

सितंबर 2016 में जब भारत और फ्रांस के दासॉल्ट एविएशन (Dassault Aviation) के बीच 36 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए 59000 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था, तब किसने सोचा था कि इन विमानों का भारत आगमन कठिन हालात में होगा. कोरोना वायरस (Corona Virus) के कारण मई में आने वाले पहले बैच को जुलाई में तब आना पड़ रहा है, जब भारत और चीन के बीच लद्दाख से सटे बॉर्डर पर जारी तनाव (Ladakh Border Tension) को करीब डेढ़ महीना हो चुका है.

भारतीय वायु सेना के बेड़े की खास ताकत के तौर पर शामिल होने जा रहे राफेल के आगमन के बाद 20 अगस्त के आसपास औपचारिक इंडक्शन कार्यक्रम होगा. इससे पहले ये भी कहा जा चुका है ​कि हालात के मद्देनज़र इन लड़ाकों का पहला इस्तेमाल लद्दाख में हो सकता है क्योंकि वायुसेना वहां पहले ही ज़मीनी सेना की मदद के लिए कॉम्बैट एयर पैट्रोलिंग कर रही है. जानिए कि इन विमानों की लैंडिंग के लिए अंबाला एयरबेस ही क्यों चुना गया.



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न्यूज़18 ग्राफिक्स


राफेल के लिए होम बेस
सबसे खराब स्थिति से निपटने के लिए राफेल भारतीय जंगी बेड़े का हिस्सा बन रहा है. यानी इसे ऐसी जगह पर रखना ज़रूरी है, जहां से कम से कम समय में यह जंग में अपना ज़्यादा से ज़्यादा योगदान दे सके. इसमें भी कोई शक नहीं है कि राफेल फाइटरों को चीन और पाकिस्तान से लगने वाली सीमाओं की निगरानी के मकसद से लाया जा रहा था, लेकिन तब ये नहीं पता था​ कि चीन के साथ संबंध इतनी तेज़ी से तनावपूर्ण हो जाएंगे.

भारत की सीमाएं बनी हुई हैं संवेदनशील
पाकिस्तान के साथ 740 किलोमीटर की LoC और चीन के साथ 3448 किमी लंबी LAC भारत साझा करता है और इन दिनों दोनों ही बॉर्डर पर संवेदनशील स्थितियां हैं. इस पूरे मंज़र को मद्देनज़र रखते हुए राफेल विमानों के लिए हरियाणा के अंबाला और पश्चिम बंगाल के हाशीमारा को होम बेस के तौर पर चुना गया है, जिनमें से 5 राफेल के पहले बैच को अंबाला में उतारा जाएगा, जहां से लद्दाख बॉर्डर करीब है.

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अंबाला एयरबेस ही क्यों?
दिल्ली से महज़ 200 किमी की दूरी पर स्थित अंबाला एयरबेस रणनीतिक महत्व का स्क्वाड्रन रहा है, जो दिल्ली में वेस्टर्न एयर कमांड के अधिकार में आता है. फरवरी 2019 में पाकिस्तान के बालाकोट में एयरस्ट्राइक के लिए मिराज यहीं से उड़े थे. इसके अलावा, 1999 के कारगिल युद्ध के समय में भी अंबाला के इस एयरबेस ने अहम भूमिका निभाई थी, जब 234 ऑपरेशनल उड़ानें यहां से भरी गई थीं.

अंबाला एयरबेस पर पहले से जगुआर विमानों के दो स्क्वाड्रन (No. 14 और No. 5) तैनात हैं. राफेल की रेंज इनसे बेहतर होगी. अंबाला एयरबेस LoC और LAC से बराबर दूरी पर यानी बीच में स्थित है. यहां से लड़ाकू विमान कम समय के भीतर आक्रमण या बचाव के किसी भी मिशन पर पहुंच सकते हैं.


अंबाला एयरबेस चुनने की और वजहें
वायुसेना के अफसर राफेल के लिए अंबाला एयरबेस चुनने के पीछे कुछ और तकनीकी कारण भी बताते हैं. मसलन बॉर्डर से इस एयरबेस की डेप्थ, यहां का इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी सुविधाएं, लोकल फ्लाइंग के लिए एयरस्पेस और प्रशिक्षण की सुविधाओं का होना. चीन और पाकिस्तान दोनों ही देशों के नापाक इरादों के चलते अंबाला एयरबेस की भूमिका वैसे भी अहम हो जाती है. अब जानिए उस स्क्वाड्रन के बारे में, जो राफेल से पुनर्जीवित होने जा रहा है.

क्या है नंबर 17 स्क्वाड्रन?
राफेल विमान न केवल वायु सेना को नई ऊर्जा और शक्ति देंगे बल्कि नंबर 17 स्क्वाड्रन को दोबारा जीवन भी देंगे. अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर वायु सेना के इस स्क्वाड्रन को 2016 में भंग कर दिया गया था, लेकिन पिछले साल 11 सितंबर को इसे राफेल विमान की आमद के चलते फिर जीवन मिलना शुरू हुआ. 1951 में जब इस स्क्वाड्रन की स्थापना हुई थी, जब हार्वर्ड-II B की उड़ानें इसके अधिकार में थीं. इसके बाद से डि हैविलैंड वैम्पायर, हॉकर हंटर, मिग 21 और अब राफेल इस स्क्वाड्रन का हिस्सा होंगे.

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राफेल और जंग के हालात की स्ट्रैटजी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत और चीन के बीच युद्ध होता है तो चीन का चापलूस रहा पाकिस्तान भी दूसरी तरफ से भारत पर हमला बोलकर मुसीबतें बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा. ऐसे में भारत की वायुसेना को दो अलग मोर्चे बनाने से बेहतर है कि एक बड़ी यूनिट के तौर पर रणनीति बनाई जाए. राफेल के न होने से चीन की ताकत के सामने भारत की वायु सेना बड़े संकट में हो सकती थी.

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चीनी वायुसेना के पास स्वदेशी लड़ाकू विमानों Xian H-6, Xian JH-7, Chengdu J-7, Shenyang J-16, Chengdu J-20, Shenyang J-11, Chengdu J-10, Shenyang J-16, Shenyang J-8 की बड़ी रेंज के साथ ही रूस के Sukhoi Su-30 और Sukhoi Su-35 भी हैं. इस तुलना में भारत के पास कम जंगी विमान थे. हालांकि चीन के स्वदेशी लड़ाकों की वास्तविक युद्ध में परीक्षा होना बाकी है.

दूसरी तरफ, पाकिस्तान के पास मिराज के साथ JF-17 Thunder और F-16 जैसे लड़ाकू विमान हैं और माना जा सकता है कि दोतरफा हमले से भारत के सामने बड़ी विकट स्थिति बन सकती है. राफेल के आने से भारत की वायुसेना मज़बूत तो होती है, लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि राफेल भारत की कमियों को कुछ हद तक पूरा करता है, सीमा पर दोतरफा खतरे की तुलना में अतिरिक्त ताकत नहीं जोड़ता.

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को अपने स्क्वाड्रनों की संख्या को बढ़ाना ही होगा, वह भी समय रहते. राफेल यकीनन गेमचेंजर साबित हो सकता है इसलिए उसके एयरबेस की लोकेशन भी महत्वपूर्ण है, खासकर ऐसे समय में जब सीमा पर भारत के नज़रिये से हालात नाज़ुक हैं.
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