अमेरिका ने हिरोशिमा पर परमाणु हमले का फैसला क्यों और कैसे किया?

जापान के हिरोशिमा पर आज ही के दिन 1945 में परमाणु बम गिराया गया था. तबसे 6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है. इसे मानव इतिहास में काला दिन भी कहा जाता है, क्योंकि हिरोशिमा और नागासाकी ही दो ऐसे शहर हैं जहां परमाणु हमले की त्रासदी भोगी गई.

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Updated: August 6, 2019, 8:17 AM IST
अमेरिका ने हिरोशिमा पर परमाणु हमले का फैसला क्यों और कैसे किया?
हिरोशिमा पर हमले का फोटोग्राफ जापान के संग्रहालय में सुरक्षित है.
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Updated: August 6, 2019, 8:17 AM IST
अमेरिका दुनिया का इकलौता देश है, जिसने मानव इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार करने वाले परमाणु बमों का इस्तेमाल किया है. 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराया था, जिसमें 80 हज़ार लोग मौके पर ही मारे गए थे और अगले कुछ समय में रेडिएशन से 80 हज़ार लोग और. इस हमले से उपजे रेडिएशन से घातक रोगों के शिकार लोगों की मौत भी जोड़ी जाए तो हिरोशिमा पर परमाणु हमले से करीब 2 लाख लोग मारे गए थे.

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हिरोशिमा के तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम से हमला किया गया था और जापान पूरी तरह तबाह हो गया था. साथ ही, मानव युद्ध इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी भी जन्म ले चुकी थी. इस हमले पर बाद में, कई बार अमेरिका भी पछतावा ज़ाहिर कर चुका और दुनिया के तमाम देश हमेशा इसकी आलोचना करते रहे. जानिए कि दूसरे विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने आखिर क्यों और कैसे जापान पर इस भीषण हमले का फैसला किया था.

एक समिति बनाई गई थी

अमेरिकी वैज्ञानिक जुलाई 1945 में परमाणु बम का सफल परीक्षण कर चुके थे, जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी समर्पण कर चुका था. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के सामने उसके बाद जापान की चुनौती बनी हुई थी. ऐसे में, ट्रूमैन ने युद्ध सचिव हेनरी स्टिमसन की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाकर यह तय करने को कहा था कि जापान पर परमाणु बम से हमला किए जाने के बारे में विचार किया जाए.

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हिरोशिमा परमाणु बम त्रासदी की याद में बने संग्रहालय में तस्वीरें देखने हर पीढ़ी आती है.

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हैरी ट्रूमैन प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी में पदस्थ सैम रशे के हवाले से सीएनएन ने एक रिपोर्ट में छापा था कि उस वक्त परमाणु हमला करने के पक्ष में समिति के ज़्यादातर सदस्य थे और खास तौर से स्टिमसन इसके ज़बरदस्त पक्षधर थे. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चार्ल्स मेयर के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि उस वक्त ट्रूमैन के लिए कोई और विकल्प भी संभव था, लेकिन बात इस बिंदु पर फंस गई थी कि बाद में इस सवाल का जवाब कैसे दिया जाएगा कि जब युद्ध को जल्द खत्म करने का विकल्प था, तो देर तक युद्ध क्यों लड़ा गया.

मनोवैज्ञानिक तौर पर हार चुके थे अमेरिकी
हार्वर्ड में वर्ल्ड वॉर टू पर एक कोर्स पढ़ाने वाले मेयर का कहना था कि जापान बगैर शर्त के समर्पण के लिए राज़ी नहीं था. वहीं, रशे का कहना था कि अमेरिका के सामने चिंता ये थी कि उस वक्त इवो जिमा और ओकिनावा में युद्ध बहुत महंगा पड़ चुका था यानी जापान के एयरफोर्स और नेवी बेस को तबाह करने के बावजूद अमेरिका के सैनिक बहुत बड़ी संख्या में मारे गए थे.

रशे का मानना था कि उस वक्त एक मनोविज्ञान के तौर पर यह बात अमेरिकी खेमे में घर कर गई थी कि जापानी फौज आखिरी आदमी के बचे रहने तक शिद्दत से लड़ाई करने पर आमादा थी. मेयर के मुताबिक वर्तमान समय में सुसाइड अटैक को हम एक नई हमला पद्धति के तौर पर जानते हैं, लेकिन उस वक्त जापान ने ये तरकीब ईजाद की थी और अमेरिका के खिलाफ कई सुसाइड अटैक अंजाम दिए गए थे. एक तरह से पूरा जापान पूरी ताकत से भिड़ चुका था.

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आखिरी उपाय था परमाणु हमला
रशे के हवाले से रिपोर्ट में उल्लेख है कि अमेरिकी सेना को यह महसूस होने लगा था कि बगैर परमाणु बम के इस्तेमाल के उसके लिए युद्ध जीतना मुमकिन नहीं था. मेयर के अनुसार इतिहासकारों का मानना रहा है कि विश्व युद्ध में सोवियत यूनियन का कूद पड़ना युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करने के लिए अमेरिका को उकसाने वाला कारण रहा.

रशे का कहना था कि परमाणु बम के इस्तेमाल को लेकर जब सहमति बन गई थी, तब जापान में चार ठिकानों को चिह्नित किया गया था, जहां हमला किया जा सकता था. इन चार में से कहां परमाणु बम गिराना था, इसका फैसला ट्रूमैन ने सेना पर छोड़ा था. हिरोशिमा के सैन्य महत्व को देखते हुए सेना ने इस शहर को चुना. 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराया गया और 9 अगस्त को नागासाकी पर. इसके बाद जापान ने 14 अगस्त को बगैर शर्त समर्पण कर दिया था.

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First published: August 6, 2019, 8:17 AM IST
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