बिहार चुनाव : क्या स्वामित्व योजना के साथ जेपी और नानाजी को जोड़ बीजेपी ने खेला मास्टर स्ट्रोक

स्वामित्व योजना के पोस्टर में जेपी और नानाजी की तस्वीर.
स्वामित्व योजना के पोस्टर में जेपी और नानाजी की तस्वीर.

किसानों को संपत्ति या स्वामित्व कार्ड (Swamitva Yojana) सौंपने के लिए केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर का दिन चुना क्योंकि इस दिन लोकनायक जेपी और ग्रामोदय के पुरोधा नानाजी की जयंती थी. पीएम मोदी (PM Modi) ने इसे संयोग कहा, लेकिन क्या हैं इस संयोग के सियासी अर्थ?

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  • Last Updated: October 12, 2020, 9:21 AM IST
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लोकनायक जयप्रकाश नारायण (Loknayak Jaiprakash Narayan) और भारतीय जनसंघ के प्रमुख स्तंभ रहे नानाजी देशमुख (Nanaji Deshmukh) को जयंती के मौके पर याद किया ही जाना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों महापुरुषों की याद में उन्हें भारत का गौरव करार दिया. यह परंपरा है कि जयंती और पुण्यतिथि पर इतिहास व्यक्तित्वों को याद किया ही जाता है, लेकिन इस बार बिहार चुनाव (Bihar Assembly Election) के मद्देनज़र इसे 'स्मार्ट प्ले' समझा जाना चाहिए. दो महानायकों की जयंती के मौके पर पीएम ने स्वामित्व योजना के तहत प्रॉपर्टी कार्डों का वितरण करके एक तीर से दो निशाने का गुर दिखाया है.

'न केवल दोनों की जन्मतिथि एक है, बल्कि दोनों महापुरुषों के संघर्ष और आदर्श भी काफी समान रहे... नानाजी ने जेपी की विचारधारा को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया और गांवों के विकास के लिए किए गए नानाजी के काम हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे.' मोदी ने इस अंदाज़ में जन नेताओं को याद करते हुए बिहार चुनाव के अखाड़े में एक अहम दांव खेला. इस दांव को समझने के लिए इन दो विभूतियों को समझना भी ज़रूरी है.

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आज़ाद भारत के सबसे कद्दावर नेता
जयप्रकाश नारायण को स्वतंत्र भारत में उभरने वाले सबसे बड़े जननेता के रूप में याद किया जाता रहा है. इसी कारण उन्हें लोकनायक उपाधि भी मिली थी. भारत छोड़ो आंदोलन के नायक के रूप में उभरने के बाद 1970 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार की नीतियों के खिलाफ देश भर में एक बड़ा आंदोलन 'संपूर्ण क्रांति' के रूप में खड़ा करने के लिए जेपी को भुलाया नहीं जा सकता.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


सामाजिक सेवाओं के लिए साल 1965 में मैगसैसे अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले जेपी को 1999 में भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में भारत रत्न से नवाज़ा गया था. जेपी का जीवन समानांतर राजनीति और देशसेवा में समर्पण का जीवन रहा. 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय जेल जाने के दौरान उनका संपर्क राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी और अच्युत पटवर्धन जैसे नेताओं से हुआ था.

जेल से निकलने के बाद कांग्रेस में वामपंथी समूह ने कांग्रेस समाजवादी पार्टी बनाई, जिसके सचिव जेपी थे. महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले जेपी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और 1947 से 1953 के बीच देश की सबसे बड़ी मज़दूर यूनियन यानी रेलवे कर्मचारी संघ का नेतृत्व किया.

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...
1960 के दशक में जेपी बिहार की राजनीति के लिए राज्य में लौट आए थे. 1970 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार की नीतियों के खिलाफ उन्होंने संर्पूण क्रांति छेड़ी थी, जिससे घबराकर इंदिरा गांधी ने आपातकाल जैसा कदम उठाया था. इसके बाद जेपी के आह्वान पर रामलीला मैदान में 1 लाख से ज़्यादा लोग केंद्र सरकार के विरोध में इकट्ठे हो गए थे. यहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता गूंज उठी थी 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.'

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दो साल के दमन के बाद आपातकाल हटा और 1977 में चुनाव की घोषणा हुई तो इंदिरा सरकार के खिलाफ, जेपी के निर्देशन में जनता पार्टी का उदय हुआ. जनता पार्टी की सरकार देश के इतिहास में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी. जेपी की आवाज़ पर कई युवा और नेता आंदोलन से जुड़ चुके थे. इस जेपी आंदोलन ने बिहार को लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, शरद यादव, सुशील कुमार मोदी जैसे भविष्य के प्रमुख नेता दिए थे.

जेपी के नक्शे कदम पर नानाजी की अहमियत
देश की राजनीति में एक आदर्श कायम करने में नानाजी देशमुख का नाम सम्मान से लिया जाता है. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तब नानाजी को मंत्री पद संभालने को कहा गया लेकिन उन्होंने जेपी के आदर्श पर चलते हुए गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और गरीबी से आज़ाद करने के विकास कार्यों के लिए खुद को समर्पित किया. 1980 में राजनीति को विदा कहकर नानाजी पूरी तरह से गांवों के विकास के लिए जुट गए.

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देश में गांवों के विकास पुरुष कहे जाने वाले नानाजी देशमुख.


भारतीय जनसंघ की स्थापना में नानाजी का अहम रोल था. उत्तर प्रदेश में 1957 में जनसंघ की मौजूदगी हर ज़िले में होने के पीछे नानाजी की संगठन क्षमता ही थी. संगठन खड़ा करने में माहिर नानाजी और समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया का ही कमाल था कि उत्तर प्रदेश में 1967 में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी. नानाजी की संगठन क्षमता इमरजेंसी के दौरान भी दिखी, जब उन्होंने इंदिरा सरकार के खिलाफ अंडरग्राउंड आंदोलनों को ज़िंदा रखा.

जेपी के सपने के सारथी बने नानाजी
जेपी आंदोलन के विस्तार और गांवों के विकास को लेकर जेपी की दृष्टि को साकार करने के लिए नानाजी ने ग्रामीण कायाकल्प के लिए जो प्रोजेक्ट शुरू किया था उसका नाम भी जेपी और उनकी पत्नी के नाम पर 'जयप्रभा ग्राम' रखा था. इससे पहले, 1980 में जब जनता पार्टी टूटी और भाजपा का जन्म हुआ, तब नानाजी ने राजनीति को अलविदा कह दिया था और समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया था.

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ग्रामोदय और स्वाबलंबन जैसे दो मोर्चों पर नानाजी ने शेष जीवन काम किया. देश की पहली ग्रामीण यूनिवर्सिटी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना भी उन्हीं का कारनामा रहा. राज्य सभा के मानद सदस्य और पद्मविभूषण के बाद मरणोपरांत नानाजी को पिछले साल भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

क्या यह मोदी का मास्टर स्ट्रोक है?
जेपी और नानाजी के बारे में जानने के बाद समझा जा सकता है कि बिहार चुनाव के दौरान, सरकार के दावे के मुताबिक 'किसानों के लिए ऐतिहासिक और ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने वाली' स्वामित्व योजना के तहत प्रॉपर्टी कार्ड बांटे जाने का कदम कितना अहम है. 'आत्मनिर्भर भारत' की चर्चा करने, महात्मा गांधी के वैचारिक धरातल को प्रचारित करने के बाद बीजेपी इन दो चेहरों को अपने बैनर पर लेकर आई है.

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बिहार चुनाव के दौरान पीएम ने प्रॉपर्टी कार्ड बांटने का कार्यक्रम किया.


बिहार की तमाम स्थानीय पार्टियां और क्षेत्रीय नेता कई बार जेपी और उनके आदर्श के अनुयायी होने के नाम पर राजनीति करते रहे हैं, लेकिन अब भाजपा यहां भी सेंध लगाने की तैयारी में है. बिहार के सबसे बड़े नेता यानी जेपी और गांव के विकास के लिए सबसे सम्मानित नेता यानी नानाजी को बैनर पर लाने को भाजपा का मास्टर स्ट्रोक माना ही जाना चाहिए.
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