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कोरोना वायरस: अमेरिका में क्यों ज़्यादा मारे जा रहे हैं अश्वेत? क्या है नस्लभेद?

Bhavesh Saxena | News18India
Updated: April 9, 2020, 5:11 PM IST
कोरोना वायरस: अमेरिका में क्यों ज़्यादा मारे जा रहे हैं अश्वेत? क्या है नस्लभेद?
अमेरिका में अल्पसंख्यक अश्वेतों के जीवन​ की स्थिति पर चिंता जताई जा रही है. फाइल फोटो.

अमेरिकी राज्यों में अल्पसंख्यकों की आबादी और उसके हिसाब से कोविड 19 संक्रमण से मारे जा रहे इस समुदाय के लोगों की संख्या के आंकड़े आपको चौंका देंगे. जानें कैसे वैश्विक महामारी ने अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के भयानक हालात के बारे में सोचने पर एक बार फिर मजबूर कर दिया है.

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अमेरिकी राज्यों (United States of America) से कोरोना वायरस (Corona Virus) संक्रमण के मामलों और मौतों के बारे में अब तक जो डेटा सामने आया है, उसके आंकड़े इस तरह हैं : लुइसियाना राज्य में मारे गए कोविड 19 (Covid 19) संक्रमितों में से 70 फीसदी अफ्रीकी अमेरिकी (African Americans) रहे. मिलवाउकी काउंटी में संक्रमण से जितनी मौतें हुई हैं, उनमें 81 फीसदी अश्वेत (Black Americans) हैं. शिकागों में मृतकों में से 70 फीसदी अश्वेत हैं. वैश्विक महामारी सबके लिए खतरनाक है लेकिन अमेरिका में अश्वेत इसकी चपेट में ज़्यादा क्यों हैं?

वायरस जनित इस वैश्विक महामारी (Pandemic) ने दुनिया के कई देशों की व्यवस्थाओं की खामियों को उजागर किया है. उपरोक्त दुर्भाग्यपूर्ण आंकड़ों ने साबित कर दिया है कि अमेरिका (America) में एक बड़ी आबादी के साथ किस कदर भेदभाव का माहौल है. जानिए कि क्यों अमेरिका में अल्पसंख्यक (Minority) अश्वेतों के लिए खतरा बहुसंख्यकों की तुलना में ज़्यादा क्यों है.

यह है आबादी का नमूना
डब्ल्यूएलओएक्स की रिपोर्ट के मुताबिक मिशिगन में अश्वेतों की आबादी 14 फीसदी है लेकिन कोरोना से मरने वालों में 41 फीसदी अश्वेत हैं. इलियोनॉइ राज्य में 15 फीसदी आबादी है लेकिन मृतकों में 42 फीसदी अश्वेत हैं. इसी तरह जहां कोरोना से मारे गए लोगों में 70 फीसदी अश्वेत हैं, उस लुइसियाना राज्य में अश्वेतों की आबादी 32 फीसदी ही है. ये आंकड़े सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे अफ़सोसनाक स्थिति कहकर हर कोशिश किए जाने का आश्वासन दिया.



क्या अल्पसंख्यकों पर रही नज़र?


सीएनएन की रिपोर्ट कहती है कि कोरोना वायरस के कारण हो रही मौतों से इस तरह का आंकड़ा सामने आने के बाद साफ है कि संघीय सरकार ने आबादी की स्थिति पर नज़र नहीं रखी. एडम्स एंड अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ. प्रैक्टिस हैरिस के हवाले से लिखा गया है कि 'इन प्रमाणों के बाद ज़रूरी है कि नस्ल और खास समुदायों की तरफ खास ध्यान दिया जाए'.

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अश्वेत अमेरिका में बदतर हालात में हैं इसलिए किसी भी किस्म के संक्रमण के लिए आसान शिकार हैं. फाइल फोटो.


क्यों ज़्यादा चपेट में आए अश्वेत?
ऐसा नहीं है कि वायरस किसी किस्म का नस्लभेद कर रहा है और श्वेतों की तुलना में अश्वेतों को ज़्यादा शिकार बना रहा है. बल्कि, स्थिति यह है कि अश्वेत अमेरिका में बदतर हालात में रह रहे हैं इसलिए किसी भी किस्म के संक्रमण की चपेट में आने के लिए आसान शिकार हैं. आइए बिंदुवार समझें कि क्यों अश्वेत कोविड 19 के शिकार बड़ी तादाद में हुए.

1. पहले से गंभीर बीमारियां
यह बात आपको महीनों से बताई जा रही है कि जो लोग पहले से किसी रोग के शिकार हैं, उनमें कोविड 19 संक्रमण की आशंका ज़्यादा है. सीएनएन की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका में रह रहे अश्वेत समुदाय के काफी लोग पहले से ही डायबिटीज़, दिल और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं. वहीं, एसीएलयू की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में जब पहला कन्फर्म केस सामने आया था तभी से पहले से बीमार इस समुदाय के लिहाज़ से सर्वाइवल रेट यानी बचने की संभावना घट गई थी.

मिशिगन के फ्लिंट के जनप्रतिनिधि टायरॉन कार्टर के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि 'इस वैश्विक महामारी ने उन मुद्दों को एनलार्ज करके सामने रखा है, जिनके बारे में पहले ही चिंता की जानी थी जैसे स्वास्थ्य सुरक्षा तक पहुंच, कुछ समुदायों में पर्यावरण मुद्दे, हवा की क्वालिटी, पानी की गुणवत्ता आदि.' कार्टर ने कहा कि फ्लिंट में लोग अस्थमा से भी ग्रस्त हैं.


2. हेल्थकेयर की सुविधा
श्वेत समुदायों की तुलना में अमेरिका में अश्वेतों के पास हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधाएं बहुत कम हैं और नौकरी देने वालों के द्वारा उन्हें यह सुविधा नहीं दी जाती. सीएनएन के मुताबिक कैसर कमीशन की 2015 की रिपोर्ट में चर्चा थी कि क्यों सभी के लिए हेल्थकेयर सुविधा तक पहुंच होना महत्वपूर्ण है, महामारी का समय हो या नहीं.

खुद कोरोना संक्रमण के पॉज़िटिव पाए गए कार्टर के हवाले से कहा गया है ​कि हेल्थकेयर की सुविधाओं के अभाव के कारण महामारी का बेहद खराब असर अश्वेत समुदाय पर पड़ा.

3. रोज़गार की समस्याएं
कोरोना वायरस के फैलते ही अमेरिका में वर्क फ्रॉम होम का चलन शुरू हुआ लेकिन अफ्रीकी अमरीकी समुदाय में 5 में से 1 से भी कम व्यक्ति के औसत से यह मुमकिन हुआ. एसीएलयू की रिपोर्ट कहती है कि इस समुदाय के हिस्से में ज़्यादातर वो काम हैं ​जो कम वेतन और बगैर अतिरिक्त लाभ के हैं यानी हेल्थ इंश्योरेंस, सिक लीव या बचत जैसी सुविधाएं इस समुदाय को प्राप्त नहीं हैं.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


दुकानों में सहयोगी, स्टोर्स में क्लर्क या वेयरहाउस कर्मचारी या घरों में स्वास्थ्य सहयोगी जैसे काम अश्वेत समुदाय के हिस्से में ज़्यादा हैं इसलिए इनके पास रोज़गार छोड़ने के मौके भी कम हैं क्योंकि इनकी आय सीमित है. रिपोर्ट कहती है कि इनके रोज़गार के विकल्प बेरोज़गारी और परिवार की भुखमरी हैं.

4. भीड़ में रहना मजबूरी
यह भी आपको महीनों से पता है कि कोरोना वायरस संक्रमण शहरों यानी ज़्यादा घनत्व वाली जगहों यानी भीड़भाड़ की स्थिति में ज़्यादा फैलने के आसार रहते हैं. प्यू के विश्लेषण के मुताबिक अमेरिका में अश्वेत समुदाय के लोग चूंकि कम आय वर्ग से ताल्लुक रखते हैं इसलिए शहरों में घने बसे इलाकों में रहने के लिए मजबूर होते हैं.

कोरोना संक्रमण की स्थिति में स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं कि ऐसे लोग आइसोलेशन में रहें लेकिन जो लोग हाउसिंग प्रोजेक्टों, बेघरों के लिए बने शेल्टरों या जेलों या चॉल जैसी जगहों पर रहते हैं, उनके लिए तकरीबन असंभव हो जाता है. और सीएनएन की मानें तो अमेरिका में अश्वेत समुदाय की यही स्थितियां हैं. इसका उदाहरण यह है कि शिकागो में कोरोना वायरस संक्रमित लोगों में ब्लैक नॉन लैटिनो समुदाय के लोग 52 फीसदी हैं, जो व्हाइट नॉन लैटिनो समुदाय के लोगों की अपेक्षा दोगुनी संख्या है.


ट्रंप पर हैं नस्लीय भेदभाव के इल्ज़ाम
अमेरिका में अश्वेत अब भी संक्रमण के शिकार होने के लिए ज़्यादा असुरक्षित हैं. एसीएलयू की रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड 19 की स्थिति भयावह होने से पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप को विशेषज्ञों ने सलाह दी थी कि कम आय वर्ग और असुरक्षित हेलथकेयर वाले समुदायों में बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की जाए और स्वास्थ्य सुविधाएं दी जाएं लेकिन ट्रंप ने इन सलाहों को नज़रअंदाज़ किया. यही नहीं, अमेरिका में मास्क की कमी और भेदभाव करने वाली कुछ नीतियों के लिए भी ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को ज़िम्मेदार ठहरा दिया था.

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First published: April 9, 2020, 5:08 PM IST
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