भारत के लिए क्यों प्रैक्टिकल और फायदेमंद नहीं है 'बॉयकॉट चाइना'?

भारत के लिए क्यों प्रैक्टिकल और फायदेमंद नहीं है 'बॉयकॉट चाइना'?
पूरे देश में चीन के बहिष्कार की लहर है. फाइल फोटो.

Ladakh Border पर भारत और चीन फेसऑफ (India-China Face-off) के चलते तनाव बढ़ने के बाद पूरे भारत में लहर है कि Chinese Products का बहिष्कार कर दिया जाए. चीन के साथ Trade Relations को स्थगित कर दिया जाए. लेकिन यह कदम कितना मुमकिन है? क्यों Experts इसे बचकानी बात कह रहे हैं?

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लद्दाख में बीते 15 जून को Galwan घाटी पर India-China Stand-Off में 20 भारतीय जवानों के शहीद होने के बाद देश भर में चीन के बहिष्कार (Boycott China) के नारे और विचार चल पड़े हैं. चीन से आयात (Import) होने वाले तमाम उत्पादों पर बैन लगाए जाने की मांग की जा रही है. लेकिन क्या इस तरह का कोई बॉयकॉट संभव है?

News18 Sentimeter: न्यूज़18 ने हाल में, चीन को लेकर भारतीयों के मन की बात जानी. POLL के नतीजों के मुताबिक 70% भारतीयों ने कहा कि भले ही ज्यादा खर्च करना पड़े लेकिन चाइनीज सामान का बॉयकॉट करेंगे. करीब 91% लोगों ने कहा कि चाइनीज ऐप का इस्तेमाल बंद करेंगे. 92% भारतीयों ने कहा कि वो चीन पर भरोसा नहीं करते. 52% लोग मानते हैं कि भारत के पास कोई सहयोगी नहीं है और उसे आत्मनिर्भर रहना है.

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ये तो जनता के जवाबों से बनी तस्वीर है, लेकिन जानिए कि जानकार क्यों कह रहे हैं कि बॉयकॉट चाइना जैसी बातें अव्यावहारिक तो हैं ही, हास्यास्पद भी हैं और भारत के लिए फायदेमंद भी नहीं हैं.
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1. चीन पर भारत निर्भर है, भारत पर चीन नहीं
अगर व्यापारिक सहयोग की बात की जाए तो दो साल पहले यह हुआ कि भारत का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी अमेरिका बन गया और चीन दूसरे नंबर पर आया. भारत के कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में से 11.3% हिस्सा अमेरिका का है, लेकिन हांगकांग का 3.5% व्यापारिक हिस्सेदारी जोड़ ली जाए तो चीन हमारे व्यापार में 14% से ज़्यादा का सहयोगी हो जाता है.

दूसरी तरफ, चीन के बड़े व्यापारिक सहयोगियों में भारत का नाम नहीं है. टीओआई के विश्लेषण के मुताबिक चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी करीब 14% हिस्से के साथ अमेरिका है. जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग भी बड़े सहयोगी हैं. व्यापार के नज़रिये से भारत पर चीन की निर्भरता सिर्फ 2.1% की है.

2. किन चीज़ों के लिए चीन पर निर्भर है भारत?
भारत जितना आयात करता है, उसमें से 23% आपूर्ति चीन से होती है. अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी से बातचीत पर आधारित बेंगलूरु मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक जब चीन में कोविड 19 का प्रकोप था, तब भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी देखी गई क्योंकि हमारी निर्भरता चीन पर है. सिर्फ इसी सेक्टर में नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्नीचर से लेकर घरेलू उपयोग की कई चीज़ों तक के लिए हम चीन से आयात पर निर्भर हैं.

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3. दवाओं के लिए किस तरह है चीन पर निर्भरता?
भारत की फार्मा इंडस्ट्री उत्पादन के लिहाज़ से दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी है लेकिन मूल्य के हिसाब से 14वें नंबर पर है. inquirer की रिपोर्ट की मानें तो दवाओं के रॉ मैटेरियल के लिए भारत बड़े पैमाने पर चीन पर आश्रित है. एपीआई सहित केएसएम जैसे मूलभूत मैटेरियलों की आपूर्ति चीन से होती है. 2019 में इस तरह का करीब 70 फीसदी आयात चीन के ज़रिये हुआ. ताज़ा खबरें कह रही हैं कि सीमा पर तनाव के कारण भारत अब चीन पर इस निर्भरता को कम करने के बारे में सोच रहा है.

4. क्या किसी तरह चीन की हम पर निर्भरता है?
समग्र रूप में कहा जाए तो 'नहीं'. गुरुस्वामी के विश्लेषण में कहा गया है कि 1990 में भारत और चीन में प्रति व्यक्ति आय एक जैसी थी. फिर चीन आगे निकलता चला गया. 1996 में एक ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी पर पहुंचने वाले चीन की तुलना में हमने साल 2000 में यह आंकड़ा छुआ. इसके 20 साल बाद अब चीन की जीडीपी 13 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि हमारी 2.5 ट्रिलियन डॉलर की है और हम 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का पीछा करने के बारे में सोच रहे हैं. वहीं, चीन के लिए भारत बहुत छोटा व्यापारिक साझेदार है.

5. क्या चीनी प्रोडक्ट को बैन करना व्यावहारिक है?
इस मामले में भावनाओं से नहीं कायदों से काम लेना ज़्यादा अहम होता है. विश्व व्यापार संगठन के सदस्य दोनों देश हैं, और इस संगठन की सदस्यता के नियम के अनुसार किसी सदस्य देश को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता. सदस्यों के बीच व्यापार की स्वतंत्रता WTO की अनिवार्य शर्त है. ऐसे में विदेश और व्यापार नीतियों के तहत इस तरह का कोई कदम उठाया जाना बड़े बदलावों और लंबे समय के अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के साथ ही मुमकिन होगा.

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इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलिकॉम उत्पादों के लिए भारत की चीन पर निर्भरता ज़्यादा है.


रही बात सामाजिक बॉयकॉट की, तो यहां भी विशेषज्ञ यही कहते हैं कि आरएसएस या दूसरे संगठन इस तरह की रैलियां कर ऐसे संदेश फैला सकते हैं लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं की क्षमताएं और आदतें सबूत हैं कि चीनी उत्पादों का बॉयकॉट मौजूदा हालात में मुमकिन नहीं है. कोरियाई कंपनी सैमसंग, ताइवानी एचटीसी और जापानी कंपनी सोनी की तुलना में अगर चीनी कंपनी तकरीबन वैसे ही फीचरों के साथ सस्ता मोबाइल फोन देती है, तो यह भारतीय बाज़ार के मुफीद है. ताज़ा उदाहरण भी है कि वन प्लस 8 प्रो की लॉंचिंग के साथ ही मिनटों में ऑनलाइन सेल का रिकॉर्ड बना.

6. क्या बॉयकॉट चीन से कोई फायदा होगा?
जानकारों के मुताबिक यह कदम समझदारी भरा नहीं है. बताए गए आंकड़ों और स्थितियों से साफ है कि चीन की हम पर कोई खास निर्भरता नहीं है इसलिए ऐसे में बॉयकॉट करने पर चीन को नुकसान होने वाला नहीं है. दूसरी तरफ, एफडीआईमार्केट पोर्टल की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में चीनी कंपनियों का निवेश लगातार बढ़ा है. बॉयकॉट से निवेश को लेकर भारत का ही नुकसान होगा.

एक और पहलू ये है कि हर साल 8 लाख भारतीय चीन की यात्रा पर विभिन्न कारणों से जाते हैं, लेकिन इसकी तुलना में सिर्फ 2.5 लाख चीनी ही भारतीय आते हैं.

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पिछले कुछ सालों में चीनी निवेश भारत में काफी बढ़ा है.


7. क्या होगा बॉयकॉट का असर?
अगर चीनी उत्पादों को या चीन के साथ व्यापार को बैन करने जैसे कदम उठाए भी जाते हैं तो तुलनात्मक रूप से गरीबों और कम आय वाले वर्ग को सबसे ज़्यादा नुकसान झेलना होगा. चीन के प्रोडक्ट के विकल्पों के तौर पर भारतीय उपभोक्ताओं के लिए जापानी या कोरियाई प्रोडक्ट होंगे, जो काफी महंगे साबित होंगे. नंबर दो, बॉयकॉट से भारत की नीतिगत विश्वसनीयता को ठेस पहुंचेगी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि बिगड़ेगी. और तीसरी बात यह कि बॉयकॉट चीन के जवाब में चीन ने बदले की भावना से कदम उठाए तो भारतीय उत्पादकों और एक्सपोर्टरों को भी भारी नुकसान झेलना होगा.

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कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था की बात हो या सामाजिक व्यवस्था की, बॉयकॉट चीन का विकल्प फौरन संभव तो क्या, व्यावहारिक भी नहीं है और विशेषज्ञों के नज़रिये से किसी मज़ाक से कम भी नहीं.
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