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नेपाल और चीन मिलकर फिर से क्यों नाप रहे हैं एवरेस्ट की हाइट?

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

Covid-19 के चरम पर रहने के दौरान इसी साल मई में चीन ने सर्वे (China Survey) पूरा किया. आखिर इतनी क्या हड़बड़ी रही? अब पर्वत चोटी के साथ चीन-नेपाल ने 'राष्ट्रवाद' को जोड़ दिया है, यह भी भारत के विरोध (China & Nepal Against India) का ही कदम है!

  • News18India
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    कई सालों से यह सामान्य ज्ञान (General Knowledge) का प्रश्न रहा है कि 'दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी (Highest Mountain on Earth) माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई कितनी है?' इस सवाल का जवाब 8848 मीटर सालों से दिया जाता रहा है, लेकिन अब जनरल नॉलेज की अपडेट किताबें लीजिएगा, ताकि आप इस सवाल का जवाब सही दे सकें. जी हां, नेपाल और चीन (Nepal & China) के बॉर्डर पर स्थित एवरेस्ट या सगरमाथा की ऊंचाई को दोनों देश मिलकर नए सिरे से नापने की प्रक्रिया तकरीबन पूरी कर चुके हैं. नया आंकड़ा जल्द ही सामने आ सकता है.

    हिमालयी पर्वत शृंखला के बीच स्थित एवरेस्ट पीओके में स्थित दूसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी के2 से करीब सवा दो सौ मीटर ऊंची है. 19वीं सदी के मध्य में भारत में सर्वेयर जनरल रहे ब्रिटिश भूगोलवेत्ता सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर इस चोटी का नामकरण हुआ था. इसके बाद इस 20वीं सदी के मध्य में फिर नापने के बाद हाइट तय हुई थी. बहरहाल, क्यों इसे दोबारा नापा जा रहा है और एवरेस्ट की हाइट नापने के इतिहास व तरीकों के बारे में जानना दिलचस्प है.

    सच में कितनी ऊंचा है एवरेस्ट?
    सबसे पहले तो यही जानना चाहिए कि एवरेस्ट की ऊंचाई पर विवाद क्या रहा है. 1856 में अधीन भारत के ग्रेट ट्रिगनोमेट्रिक सर्वे (GTS) सर्वे ने 8840 मीटर हाइट तय की थी. इसके बाद 1955 में भारतीय सर्वे ने हाइट 8848 मीटर तय की, जिसे चीन ने 1975 में पु​ष्ट किया था. लेकिन 1999 में जीपीएस और रडार तकनीक की मदद से अमेरिकी सर्वे ने दावा किया कि वास्तविक ऊंचाई 8850 मीटर है.

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    एवरेस्ट की हाइट का आधिकारिक अब तक आंकड़ा वही रहा है, जो भारत ने तय किया था.




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    इसके बाद 2005 में चीन ने फिर इसे मापा और दावा किया कि ऊंचाई 8844.43 रह गई. इन तमाम दावों के बाद एवरेस्ट की ऊंचाई विवादित हो गई. विशेषज्ञों के मुताबिक स्थायी रॉक समिट के बावजूद हर साल एवरेस्ट की मोटाई में फर्क आता है. इन तमाम वजहों से भी एवरेस्ट की ऊंचाई नेपाल और चीन मिलकर फिर नाप रहे हैं. लेकिन क्या सिर्फ यही कारण है?

    विवाद की एक दिलचस्प कहानी
    19वीं सदी में GTS ने एवरेस्ट की जो ऊंचाई तय की, उसे लेकर एक मान्यता की कहानी है. कहते हैं कि सच में उस वक्त ऊंचाई 29000 फीट मापी गई थी, जिसका मतलब था 8839 मीटर. लेकिन उस वक्त इस आंकड़े को लेकर सोचा गया कि लोग इतने एग्ज़ेक्ट आंकड़े पर विश्वास नहीं करेंगे इसलिए इसमें मन मुताबिक दो फीट और जोड़कर इसे 29002 फीट यानी 8840 मीटर तय करने की कवायद हुई थी. हालांकि इस मान्यता के पीछे कोई पुख्ता सबूत नहीं दिया जाता.

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    दोबारा पैमाइश के पीछे क्या हैं कारण?
    साल 1956 से एवरेस्ट की ऊंचाई आधिकारिक तौर पर 8848 मीटर ही मानी गई है, जिसे Survey of India ने तय किया था. 2015 में नेपाल में आए भूकंप जैसी पृथ्वी के भीतर होने वाली हलचलों से एवरेस्ट की ऊंचाई में बदलाव आने की बात कही गई है. दूसरी तरफ, ये भी एक फैक्ट रहा है कि एवरेस्ट की ऊंचाई इस बात पर भी निर्भर करती रही कि कौन सा देश माप रहा था.

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    एवरेस्ट की ऊंचाई को लेकर दूसरी बहस ये भी है कि इसे कहां तक मापा जाना चाहिए? यानी सबसे ऊंचे रॉक पॉइंट तक या फिर सबसे ऊंचे बर्फ पॉइंट तक? नेपाल और चीन इस बात पर बरसों तक उलझने के बाद 2010 में राज़ी हुए नेपाल के बर्फ पॉइंट तक की ऊंचाई का दावा 8848 मीटर का ठीक है और रॉक पॉइंट तक की ऊंचाई के लिए चीन का 8844.43 मीटर का दावा सही है.

    इसके बाद 2019 में चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल यात्रा पर पहुंचे, तब दोनों देशों ने एवरेस्ट की हाइट को फिर मापने के बाद साझा विश्लेषण जारी करने पर सहमति दी. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती.

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    नेपाल और चीन संयुक्त रूप से जल्द ही एवरेस्ट की हाइट को लेकर घोषणा कर सकते हैं.


    क्या और भी कोई कारण है?
    जी हां, ये सब तो तकनीकी बातें हैं, जो दुनिया के सामने रखी जाती हैं. एक अहम और अंदर की बात यह है कि पहले जो भी मान्य सर्वे हुए हैं, वो सब भारतीय, अमेरिकी या यूरोपीय सर्वेयरों के ज़रिये किए गए. चूंकि एवरेस्ट नेपाल और चीन के बॉर्डर पर स्थित है इसलिए अब दोनों देश अपने हिसाब से दुनिया को आधिकारिक आंकड़ा देना चाहते हैं.

    नेपाल की टीम ने एवरेस्ट का सर्वे पिछले साल पूरा कर लिया था, जबकि चीन ने इस साल मई में कोरोना वायरस के कहर के बीच सर्वे पूरा किया. नेपाली टाइम्स की विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल ने समुद्र तल का आधार बंगाल की खाड़ी से लिया है जबकि चीन ने येलो सी यानी पीले समुद्र से. ये भी कहा गया ​है कि नेपाल के आंकड़े तैयार हैं और वह चीन की तरफ से फाइनल गणना के इंतज़ार में है. दूसरे, महामारी के चलते भी आधिकारिक घोषणा की तारीख कुछ आगे बढ़ाई गई है.

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