दिल्ली में हर महीने क्यों होंगे सेरो-सर्वे, किसके होंगे टेस्ट?

दिल्ली में हर महीने क्यों होंगे सेरो-सर्वे, किसके होंगे टेस्ट?
दिल्ली में सेरो सर्वे की योजना. प्रतीकात्मक तस्वीर.

सेरोलॉजिकल सर्वे (Serosurvey) में खून के नमूने (Blood Samples) रैंडम तरीके से लिये जाते हैं और इसके नतीजों से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी समुदाय में कोरोना वायरस (Coronavirus) के संक्रमण फैलने की आशंका कितनी है. वैश्विक महामारी (Pandemic) के खिलाफ रणनीति बनाने के​ लिए दिल्ली सरकार (Delhi Government) ने लगातार ये सर्वे करने की योजना बनाई है.

  • News18India
  • Last Updated: August 2, 2020, 1:10 PM IST
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कोरोना वायरस (Corona Virus) संक्रमण की चपेट में बुरी तरह से आई दिल्ली में अब ये जानने की कवायद चल रही है कि राज्य में कितने लोगों में एंटीबॉडीज़ (Antibodies) विकसित हो चुकी हैं. दिल्ली के सीएम (Delhi CM) अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) के दफ्तर के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए पोस्ट से पता चलता है कि दिल्ली में हालिया दूसरे सेरोलॉजिकल सर्वे की मदद से सरकार (Delhi Govt) Covid-19 के खिलाफ लड़ने की रणनीति बनाएगी.

अब सवाल ये है कि दूसरी बार इस तरह के सर्वे की ज़रूरत दिल्ली में क्यों पड़ी? इससे पहले इस सर्वे के बारे में भी आपको जानना चाहिए कि इसमें क्या जांचा जाता है.

क्या होता है सेरोलॉजिकल सर्वे?
वास्तव में ये सीरम टेस्ट जैसा होता है. इसके ज़रिये यह पता लगाया जाता है कि किसी व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ विकसित हो चुकी हैं या नहीं. वायरस जैसे बाहरी ऑर्गनिज़म से लड़ने के लिए शरीर का इम्यून सिस्टम जो प्रोटीन पैदा करता है, उन्हें एंटीबॉडीज़ कहा जाता है.
तकरीबन 4 हज़ार मौतों और सवा लाख से ज़्यादा कोविड केसों के बाद पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में संक्रमण की रफ्तार पर कुछ रोकथाम नज़र आई है. इन हालात में दिल्ली में दोबारा सेरो सर्वे करने की ज़रूरत क्यों पड़ी, ये भी जानने लायक है क्योंकि लोगों में ये प्रोटीन सिर्फ तभी विकसित हो सकते हैं, जब वो संक्रमित होने के बाद रिकवर हो चुके हों.



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न्यूज़18 क्रिएटिव


कैसे मददगार होते हैं सेरो सर्वे?
किसी समुदाय में कोविड 19 किस तरह और कितनी तेज़ी से फैल सकता है, इसका अनुमान लगाने में सेरोलॉजिकल सर्वे से मदद मिलती है. चूंकि पूरी आबादी का टेस्ट किया जाना संभव नहीं है, इसलिए यह पता नहीं चल सकता कि कितने लोग संक्रमित हैं. इसकी बड़ी वजह ये है कि संक्रमितों की बड़ी संख्या में लक्षण नहीं दिखाई देते.

कुल मिलाकर समझने की ये बात है कि सेरो सर्वे के नतीजे कोई निश्चित स्थिति नहीं बल्कि एक अनुमान या अंदाज़ा बताते हैं. कोविड 19 महामारी हर जगह एक तरह से फैल नहीं रही इसलिए इस सर्वे के नतीजों से मदद मिल सकती है. पहला सेरो सर्वे राज्यों के स्वास्थ्य विभागों, एनसीडीसी और WHO इंडिया के साथ मिलकर पूरे देश में आईसीएमआर ने करवाया था.

देश के 83 ज़िलों में करीब 26400 लोगों पर मई 2020 में करवाए गए इस सर्वे में पता चला था कि सर्वे में शामिल सिर्फ 0.73 फीसदी आबादी कोरोना वायरस के संपर्क में आ चुकी थी और एंटीबॉडीज़ डेवलप कर चुकी थी. दिल्ली में ये सर्वे दक्षिण पूर्व के कंटेनमेंट ज़ोन में किया गया था, जहां 9% से 11% तक सेरो पॉज़िटिव पाए गए थे.

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क्या है दूसरा सेरो सर्वे?
दूसरी बार होने जा रहा ये सर्वे दिल्ली पर फोकस करने वाला रहा. दिल्ली के 11 ज़िलों में 27 जून से 10 जुलाई के बीच कुल 21387 सैंपल रैंडम तरीके से लिये गए. NCDC द्वारा करवाए गए इस सर्वे में सेरो पाज़िटिव होने की दर 22.86% पाई गई. दिल्ली के मध्य, उत्तर पूर्व और शाहदरा इलाकों में यह पाज़िटिव दर सबसे ज़्यादा 27% मिली.

अब दिल्ली में कोविड 19 महामारी के फैलाव को समझने और उसके हिसाब से रणनीति तैयार करने के लिए​ दिल्ली सरकार अब हर महीने के पहले पांच दिनों के दौरान सेरो सर्वे करवाएगी. दिल्ली में सेरो सर्वे के बारे में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की मानें तो सर्वे में हर टीम हर दिन 25 से 40 तक नमूने जुटाएगी, जिसमें एंटीबॉडीज़ की जांच होगी. इस जांच के लिए राज्य में 18 लैब को ज़िम्मा सौंपा जा चुका है.

दिल्ली सरकार का इस तरह का सेरो सर्वे बेशक NCDC द्वारा पहले कराए गए सर्वे से छोटे स्तर का होगा लेकिन इसमें भी 15000 के आसपास लोगों का कवर करने का लक्ष्य है. इसके साथ ही, इस सर्वे में जो नमूने लिये जाएंगे, उसके लिए आयु वर्ग के हिसाब से भी निर्देश ​दिए गए हैं ताकि अलग अलग उम्र के लोगों में महामारी का असर जाना जा सके.
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