कोरोना वायरस को रोकने में लॉकडाउन की रणनीति को अब मददगार क्यों नहीं मान रहे विशेषज्ञ?

कोरोना वायरस को रोकने में लॉकडाउन की रणनीति को अब मददगार क्यों नहीं मान रहे विशेषज्ञ?
पुणे में लॉकडाउन के दौरान बंद दुकानों की फाइल तस्वीर.

देश में Corona Virus संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है. कुल कन्फर्म केसों के लिहाज़ से India दुनिया का चौथा सबसे प्रभावित देश है. लॉकडाउन के दौरान और Unlock के बाद संक्रमण बढ़ा. तो क्या अब फिर देश में लॉकडाउन किया जाना चाहिए? Research के ताज़ा सर्वे से जोड़कर इस मुद्दे पर क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) का ताज़ा सर्वे विशेषज्ञों के बीच बहस का मुद्दा बन चुका है. देश के 83 शहरों में 26400 लोगों के साथ संवाद पर आधारित यह Study देश में Infection की स्थिति को बयान करने के मकसद से की गयी. दूसरी तरफ, मंगलवार और बुधवार को प्रधानमंत्री Narendra Modi देश में Covid-19 संक्रमण की स्थिति के मद्देनज़र लॉकडाउन की दशा और दिशा तैयार करने के लिए राज्यों से बातचीत करेंगे. ऐसे में विशेषज्ञ इन स्थितियों पर कड़ी प्रतिक्रिया दे रहे हैं.

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विशेषज्ञों की नज़र में नेशनल लॉकडाउन कितना ज़रूरी है? आंकड़ों के मुताबिक विशेषज्ञ देश में कोरोना वायरस संक्रमण को कैसे समझ रहे हैं? इन सब मुद्दों पर आने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि आईसीएमआर के सर्वे में क्या बिंदु सामने आए हैं.



1. देश की 0.73% आबादी में कोरोना वायरस संबंधी एक्सपोज़र के सबूत मिले हैं.
2. लॉकडाउन की वजह से संक्रमण के फैलने की रफ्तार कम हुई.
3. संक्रमण मृत्यु दर बहुत कम 0.08% यानी बहुत कम है.
4. ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में संक्रमण फैलने का खतरा 1.09 गुना ज़्यादा है और शहरी झुग्गी बस्तियों में यह खतरा 1.89 गुना ज़्यादा है.

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इस रिपोर्ट को लेकर विशेषज्ञों ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसके निष्कर्षों का विश्लेषण कर बताया है कि हकीकत अलग है. एक तरफ एम्स के पूर्व डायरेक्टर एमसी मिश्रा ने साफ कहा कि देश के कुछ हिस्सों में कम्युनिटी संक्रमण के हालात हैं. सरकार को ये मानना चाहिए और ज़्यादा अलर्ट होकर काम करना चाहिए. वहीं विशेषज्ञों ने माना कि आईसीएमआर ने देश के आकार को देखते हुए बहुत छोटे समूह पर सर्वे किया है.

क्या वाकई लॉकडाउन से कुछ फायदा हुआ?
भारत के प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील की मानें तो पहले पॉज़िटिव देखना ज़रूरी है. लॉकडाउन के चलते कोरोना मरीज़ों का रिकवरी रेट बढ़ा. केस दोगुने होने का समय 5.5 दिन से 16 दिन के आसपास पहुंचा और अब करीब 23 दिन है. देश में टेस्टिंग क्षमता 1 लाख टेस्ट प्रतिदिन तक बढ़ी.

जमील के मुताबिक ऐसे मॉडल्स हैं, जिनके अनुमान के मुताबिक अगर लॉकडाउन नहीं होता तो भारत में 20 मई तक 50 लाख केस होते. जबकि 20 मई तक भारत में 1.1 लाख केस थे. केस फैटेलिटी रेट का ग्लोबल औसत करीब 7 फीसदी है जबकि भारत में 3 फीसदी है यानी मौतों की दर कम है. प्रति दस लाख आबादी के हिसाब से भी मौतों की दर भारत में काफी कम है.


लॉकडाउन के नुकसान कैसे समझे जाएं?
Wellcome Trust DBT India Alliance के सीईओ जमील के विश्लेषण के मुताबिक कुल कन्फर्म केस लॉकडाउन के दौरान 300 गुना रफ्तार से बढ़े और मौतों की संख्या 450 गुना तक बढ़ी. लॉकडाउन की शुरुआत से पहले एक दिन में करीब 121 कन्फर्म केस प्रतिदिन थे. वहीं लॉकडाउन खत्म होने के दिन एक दिन में करीब 8780 केस थे, यानी इस आंकड़े में भी 70 गुना से ज़्यादा बढ़ोतरी हुई. लॉकडाउन के चलते माइग्रेशन बड़ी समस्या इसलिए रहा क्योंकि इससे संक्रमण गांवों तक पहुंचा.

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टेस्टिंग पर अब भी क्यों है सवाल?
जमील ने एक इंटरव्यू में बताया कि भारत में टेस्टिंग क्षमता पहले की तुलना में बढ़ी ज़रूर है लेकिन दुनिया में सबसे ज़्यादा केसों वाले जो दस देश हैं, उनकी तुलना में भारत में सबसे कम टेस्टिंग हो रही है. प्रति दस लाख की आबादी पर हम करीब 4000 टेस्ट ही कर पा रहे हैं, जो बहुत कम है.

क्या लॉकडाउन को हास्यास्पद कहा जाए?
समझने की स्थिति यह है कि भारत ऐसा इकलौता देश रहा जिसने कम केसों के समय लॉकडाउन किया और जब लॉकडाउन खुला तो कोरोना केसों की संख्या लगातार बढ़ने के हालात रहे. ऐसा कहीं और नहीं देखा गया. बाकी देशों में लॉकडाउन खोले जाने के समय केसों की संख्या घट रही थी.

क्या है आने वाले हफ्तों का अनुमान?
डॉ. जमील के मुताबिक जबकि 10,000 से ज़्यादा नए कन्फर्म केस रोज़ आ रहे हैं और आउटब्रेक की रफ्तार 3 फीसदी प्रतिदिन तक है, तो अनुमान हैं कि जुलाई के मध्य तक हम संक्रमण के चरम पर पहुंचेंगे. यानी चार से पांच हफ्तों के भीतर. ऐसे में जुलाई में करीब 6 लाख और सितंबर तक 9 से 9.5 लाख कुल कन्फर्म केस होंगे.

आईसीएमआर की स्टडी को समझना ज़रूरी
सर्वे में दावा किया गया कि देश के 83 शहरों की 0.73 फीसदी आबादी में कोरोना वायरस के एक्सपोज़र का इतिहास पाया गया. यानी करीब 1 करोड़ की आबादी! इसे दूसरे ढंग से कैलकुलेट किया जाए तो संक्रमण के कुल मामले देश में करीब 2 करोड़ तक हो सकते हैं क्योंकि इस आबादी से भी संक्रमण फैलने से इनकार नहीं किया जा सकता और यह भी ज़ाहिर हो चुका है कि संक्रमण के ज़्यादातर मामले एसिम्प्टोमैटिक ही रहे हैं.

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क्या हैं सही सवाल और ज़रूरतें?
1. क्या हमारे अस्पताल और प्रशासन अनलॉक से बढ़ने वाले केसों को झेलने के लिए तैयार हैं?
2. 1.38 अरब की आबादी वाले देश में प्रति वर्ग किलोमीटर 400 लोग औसतन रहते हैं और स्वास्थ्य सुरक्षा सिस्टम के हिसाब से देश दुनिया में 143वें नंबर पर है. अगर हमने हर्ड इम्युनिटी के आइडिया के तहत 60 फीसदी लोगों के संक्रमित होने के आइडिया पर काम किया तो 83 करोड़ संक्रमण होंगे. क्या देश तैयार है?
3. डेटा सही ढंग से कलेक्ट किए जाने और पारदर्शी ढंग से मुहैया कराए जाने की ज़रूरत है.
4. टेस्टिंग का विकल्प नहीं है. टेस्टिंग के बगैर आप न तो हॉटस्पॉट जान सकेंगे और न ही आप नियंत्रण संबंधी नीति बना सकेंगे. जमील के मुताबिक दुर्भाग्य से केंद्र हो या राज्य, सरकारें लोगों में डेटा को लेकर विश्वास पैदा करने में नाकाम साबित हो रही हैं.

तो क्या कोई और विकल्प है?
अस्पताल अगर दबाव झेलने में टूट सकते हैं तो फिर विकल्प क्या है? जमील कहते हैं​ कि कोविड मरीज़ों को बहुत ज़रूरी होने पर ही अस्पताल में दाखिल किया जाना चाहिए. वरना होम आइसोलेशन विकल्प है. लेकिन सवाल ये है कि जहां एक पूरा परिवार एक कमरे में रहता हो या गांवों में छोटे से घरों में ज़्यादा लोग हों, वहां ये कैसे मुमकिन है? ऐसे में कम्युनिटी आइसोलेशन जैसे तरीके खोजने होंगे.

भारत एकरूप देश नहीं है बल्कि एक देश में कई देश यहां बसते हैं इसलिए जगहों और स्थितियों के हिसाब से हमें अनूठे हल खोजने होंगे ताकि हम संक्रमण पर रोकथाम कर सकें.


क्या देशव्यापी लॉकडाउन होगा कारगर?
डॉ. जमील इस बारे में साफ कहते हैं कि इस स्थिति में नेशनल लॉकडाउन अब मददगार साबित होने वाला नहीं है. अब क्लस्टरों और हॉटस्पॉट्स को देखते हुए वहां सख्ती से लॉकडाउन की रणनीति बनाना ज़रूरी है. और क्लस्टरों को जानने के लिए फिर वही बात कि टेस्टिंग तो करना ही होगी. इन स्थितियों में डॉ. जमील ने स्कूलों, कॉलेजों को खोले जाने का विरोध कर चेताया कि शैक्षणिक संस्थान बहुत जल्दी हॉटस्पॉट बन जाएंगे.

मुझे ऑनलाइन टीचिंग का कॉंसेप्ट भी भारत के लिहाज़ से कारगर नहीं लगता क्योंकि यह बहुत संभ्रांत वर्ग का आइडिया है, आम जनता के लिए उपयोगी नहीं है. मुझे लगता है कि छात्रों को एक साल का नुकसान अगर होता भी है तो होने दीजिए, यह एक साल जीवन में कोई नुकसान नहीं करेगा.


भारत खतरा उठाने के लिए कितना तैयार?
बेतरतीब अनलॉक या हर्ड इम्युनिटी के कॉंसेप्ट के चलते भारत में संक्रमण और अस्पतालों पर लोड की क्या स्थिति बनेगी? इसे समझें. 60 फीसदी आबादी यानी करीब 83 करोड़ लोग संक्रमित होते हैं और 15 फीसदी मामलों में अस्पताल बिस्तरों की ज़रूरत पड़ती है तो देश में 12.5 करोड़ आइसोलेशन बेड चाहिए होंगे. यही नहीं, 4.2 करोड़ ऑक्सीजन सपोर्ट और आईसीयू बेड. देश में अभी 1 लाख ऑक्सीज़न सपोर्ट बेड 34 हज़ार आईसीयू बेड हैं. कुल मिलाकर, संक्रमण तेज़ी से बढ़ा तो देश का स्वास्थ्य सिस्टम लाचार हो जाएगा.

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