जानें वीर सावरकर पर अंतरराष्‍ट्रीय अदालत 'हेग' में क्‍यों चलाया गया था मुकदमा

जानें वीर सावरकर पर अंतरराष्‍ट्रीय अदालत 'हेग' में क्‍यों चलाया गया था मुकदमा
स्‍वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के कारण वीर सावरकर की स्‍नातक की डिग्री भी निलंबित कर दी गई थी.

महाराष्‍ट्र के नासिक में 28 मई 1883 को जन्‍मे विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ने पुणे के फार्ग्‍युसन कॉलेन से वकालत भी की थी, लेकिन इंग्लैंड के राजा (British Crown) के प्रति वफादारी की शपथ लेने से इनकार करने के कारण उन्हें वकालत नहीं करने दी गई.

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वीर सावरकर (Veer Savarkar) को क्रांतिकारी, वकील, कवि, नाटककार, लेखक और देश में हिंदुत्‍व की राजनीति को बढ़ावा देने वाले नेता के तौर पर पहचाना जाता है. आजादी के आंदोलन से जुड़ने के बाद अपने उग्र राजनीतिक विचारों और बंग-भंग आंदोलन में सक्रिय भूमिका के साथ ही विदेशी वस्‍तुओं के बहिष्‍कार के कारण विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) ब्रिटिश हुकूमत को अखरने लगे थे. सावरकर को 1901 में नासिक के एक अंग्रेज अधिकारी की हत्‍या में संलिप्‍त होने के आरोप में लंदन (London) के विक्‍टोरिया स्‍टेशन से गिरफ्तार कर समुद्री मार्ग से भारत लाया जा रहा था.

जब जहाज फ्रांस (France) की समुद्री सीमा में पहुंचा तो वह अंग्रेज अधिकारियों को चकमा देकर समंदर में कूद गए. हालांकि, उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया गया. इस बार उनकी गिरफ्तारी फ्रांस की सीमा में हुई थी, इसलिए उन पर अंतरराष्‍ट्रीय अदालत हेग में मुकदमा चलाया गया. इस तरह का ये पहला मामला था. माना जाता है कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद यूरोपीय समुदाय का ध्‍यान भारत के स्‍वतंत्रता आंदोलन पर पड़ा था.

वफादारी की शपथ नहीं ली तो डिग्री होने के बाद भी नहीं करने दी वकालत
वीर सावरकर की लिखी गई 'The Indian War of Independence-1857 से ब्रिटिश शासन बुरी तरह से हिल गया था. उनकी इस किताब को कुछ देशों ने अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया था. सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के निकट भागुर गांव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था. महज 9 वर्ष की उम्र में उनकी मां राधाबाई का हैजे से निधन हो गया. इसके सात वर्ष बाद उनके पिता दामोदर पंत सावरकर का भी निधन हो गया.



सावरकर का पालन पोषण उनके बड़े भाई गणेश ने किया. उन्‍होंने पुणे के फर्ग्‍युसन कॉलेन से स्‍नातक की डिग्री हासिल की, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्‍सा लेने के कारण अंग्रेजी हुकूमत (British Raj) ने इसे वापस ले लिया था. यही नहीं, लंदन के ग्रे इन कॉलेज से वकालत की डिग्री भी हासिल की थी, लेकिन इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से इनकार कर देने पर उन्‍हें वकालत करने से रोक दिया गया.



कालापानी की सजा के दौरान फांसी देखने के लिए किया गया था पाबंद
सावरकर से घबराकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्‍हें अंडमान निकोबार जेल में एकांत कारावास की सजा सुनाई थी. उस वक्‍त उन्‍होंने जेल की कोठरी की दीवारों पर कविताएं लिख डाली थीं. जेल से छूटने के बाद उन्‍होंने इन्‍हें दोबारा लिखा था. अंडमान निकोबार की सेल्‍युलर जेल की कोठरी नंबर 52 में 1910 से 1920 तक रहने के दौरान सावरकर को जमकर यातनाएं दी गईं. यह कोठरी फांसी गृह के ठीक ऊपर थी. सेल्‍युलर जेल में हर साल 4 से 5 लोगों को फांसी दी जाती थी. सावरकर को इन फांसियों को देखने के लिए पाबंद किया जाता था.

काले पानी की सजा के बाद 1921 में उन्‍हें महाराष्‍ट्र की रत्‍नागिरी जेल में भेज दिया गया. वहां से 1924 में उन्‍हें सशर्त रिहा कर दिया गया. उन्हें रत्नागिरी जिले से बाहर जाने की मनाही थी और राजनीति में भाग लेने से भी रोक दिया गया था. अंग्रेज सरकार उनसे इस कदर घबराती थी कि उन्‍हें 2-2 बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी.

वीर सावरकर की लिखी गई 'The Indian War of Independence-1857 से ब्रिटिश शासन बुरी तरह से हिल गया था. उनकी इस किताब को कुछ देशों ने अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया था.


सावरकर ने ही तिरंगे की सफेद पट्टी में चक्र लगाने का दिया था सुझाव
भारत के राष्ट्रध्वज में सफेद पट्टी के बीच मौजूद चक्र का सुझाव सबसे पहले वीर सावरकर ने ही दिया, जिसे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मान भी लिया था. उन्‍होंने ही सबसे पहले भारत की पूर्ण आजादी को स्‍वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्‍य बनाया और घोषित किया. उन्‍होंने देश में धर्म की आड़ में फैली कई तरह की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाया. इसके लिए उन्‍होंने लंबी यात्राएं कर लोगों से बातचीत कर उन्‍हें कुरीतियों के प्रति जागरूक ने किया.

सावरकर ने धर्म परिवर्तन कर चुके हिंदुओं की वापसी के लिए कई आंदोलन और प्रयास किए. उनके तर्कों के आगे विरोधी टिक नहीं पाते थे. वे सभी धर्मों में शामिल रुढ़िवादी परंपराओं के घोर विरोधी थे और खुलेआम कुरीतियों का विरोध करते थे. यही वजह थी कि वे कई बार धर्म के ठेकेदारों के निशाने पर आ जाते थे. महात्‍मा गांधी की हत्या में सावरकर पर सहयोगी होने का आरोप लगा था, लेकिन अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो सका और वे बरी हो गए. सावरकर ने 26 फरवरी 1966 अंतिम सांस ली थी.

कांग्रेसी नेता पीके अत्रे ने सावरकर को दी थी 'वीर' की उपाधि
कांग्रेस के साथ मतभेद की वजह से 1936 में सावरकर के साथी ही उनका विरोध करने लगे थे. लेकिन, एक कांग्रेसी नेता, पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार पीके अत्रे सावरकर के साथ खड़े हुए थे. अत्रे ने पुणे में बालमोहन थियेटर के कार्यक्रम में सावरकर स्वागत कार्यक्रम किया. कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सावरकर को कार्यक्रम के दौरान ले झंडे दिखाने की धमकी दी थी.

इस विरोध के बावजूद हजारों की संख्या में लोग कार्यक्रम में आए और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम हुआ. इसी दौरान अत्रे ने सावरकर को 'वीर' की उपाधि देते हुए कहा था कि जो काला पानी से नहीं डरा, काले झंडों से क्या डरेगा? वहीं, जब सावरकर जेल में बंद थे, तब उन्होंने 1857 की क्रांति पर आधारित विस्तृत मराठी ग्रंथ '1857 चे स्वातंत्र्य समर' लिखा था. यह ग्रंथ बेहद चर्चित हुआ था और इसी के नाम से अत्रे ने सावरकर को 'स्वातंत्र्यवीर' नाम दिया था.

कांग्रेसी नेता पीके अत्रे ने सावरकर को 1857 की क्रांति पर किताब लिखने के कारण 'स्वातंत्र्यवीर' नाम दिया था


 

भगत सिंह के सहयोगी रहे दुर्गादास खन्ना ने एक साक्षात्कार में बताया था कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में भर्ती होने के दौरान भगत सिंह और सुखदेव ने उनसे पूछा था कि क्या मैंने वीर सावरकर की रचनाओं को पढ़ा है? भगत सिंह ने तो 1857 पर सावरकर की लिखी किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित भी कराया था. दशकों बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस ने इसका जापानी संस्करण प्रकाशित किया. इस पुस्तक के तमिल संस्करण को भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के खिलाफ मारे गये छापे के दौरान जब्‍त किया गया था.

अभिनव भारत के जरिये क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए गढ़ा नेटवर्क
एक युवा क्रांतिकारी के रूप में सावरकर ने देश में क्रांतिकारियों के पहले गुप्त समाज-मित्र मेला की स्थापना की, जो बाद में अभिनव भारत के नाम से जाना गया. उन्‍होंने पूरे भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए शानदार नेटवर्क गढ़ा. उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के दौरान पूर्ण स्वतंत्रता के लिए एक आह्वान किया, जिसे कांग्रेस ने 1930 में अपनाया. पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने पहली बार विदेशी कपड़ों के सार्वजनिक दहन का आयोजन किया. इसके लिए उन्हें कॉलेज अधिकारियों ने निष्कासन का दंड दिया.

लंदन के ग्रे इन कॉलेज में कानून के छात्र के रूप में सावरकर ने स्वतंत्र भारत के सपने को साकार करने के लिए अंतर-महाद्वीपीय उपनिवेश विरोधी तंत्र का निर्माण किया. वह इस तंत्र के सशस्त्र संघर्ष के प्रयासों का केंद्र बन गए. श्यामजी कृष्णवर्मा, मैडम भीकाजी कामा, सरदार सिंह राणा, मदन लाल ढींगरा, वीवीएस अय्यर, निरंजन पाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, लाला हरदयाल, एमपीटी आचार्य और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने दमनकारी अंग्रेजों की राजनीतिक हत्याओं के लिए बम, पिस्तौल व बम मैनुअल की खरीद तथा तस्करी जैसे कई क्रांतिकारी कामों को अंजाम दिया.

युवाओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने को प्रेरित कर रहे थे सावरकर
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने भारतीय युवाओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर प्रशिक्षण लेने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वे बाद मे नेताजी की आईएनए मे शामिल हो सकें. लेखक और इतिहासकार विक्रम संपत अपने एक लेख में लिखते हैं कि  नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो पर 25 जून 1944 को एक प्रसारण में कहा था कि जब राजनीतिक गोरखधंधे और दूरदर्शिता की कमी के कारण गुमराह हो रही कांग्रेस पार्टी के लगभग सभी नेता भारतीय सेना में शामिल सैनिकों को भाड़े के सैनिकों के रूप में कुप्रचारित कर रहे हैं, तब वीर सावरकर निडर होकर भारत के युवाओं को सशस्त्र बलों में भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. ब्रिटिश सेना में शामिल ये युवक ही हमारी आईएनए के लिए प्रशिक्षित जवानों और सैनिकों को प्राप्त करने का श्रोत हैं.

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First published: May 28, 2020, 11:24 AM IST
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