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क्यों कुछ राज्यों में भारी बारिश और बाढ़ से हो रही है तबाही?

असम का एक बाढ़ग्रस्त इलाका.  (File Photo)

असम का एक बाढ़ग्रस्त इलाका. (File Photo)

उत्तराखंड (Uttarakhand) और उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में अगले दो दिनों के लिए भारी बारिश का अलर्ट है. दूसरी ओर मध्य व पश्चिमी हिस्सों समेत भारत के कई हिस्सों में अगस्त के तीन हफ्तों में औसत से ज़्यादा बारिश 1983 के बाद के रिकॉर्ड तोड़ चुकी है. असम (Assam), ओडिशा (Odisha) में बाढ़ के हालात हैं. जानिए कि देश में मानसून (Monsoon in India) का मौसम तबाही की वजह क्यों बना है.

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    ओडिशा में बाढ़ (Flood in Odisha) से लोग परेशान हो रहे हैं और असम में बाढ़ (Flood in Assam) के कहर के बाद बचाव कार्य चल रहे हैं. इस बीच, मौसम विभाग (IMD) ने अब उत्तर भारत (North India) में भारी बारिश की भविष्यवाणियां (Weather Forecast) कर दी हैं. यही नहीं, गुजरात (Gujarat) और दक्षिणी पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में भी भारी बारिश से बाढ़ जैसे हालात बन रहे हैं. जानिए कि क्यों भारत के कई हिस्सों में बारिश से कहर टूट रहा है और किस तरह.

    करीब दो महीने पहले ही पश्चिमी भारत ने निसर्ग चक्रवात (Cyclone Nisarga) का सामना किया था. उसके बाद से पश्चिमी भारत से मानसून का सफर शुरू हुआ. महाराष्ट्र (Maharashtra) में कई जगह भारी बारिश के बाद गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के साथ ही कोंकण के कई हिस्सों में भारी बारिश हुई. दूसरी तरफ, एक मानसून सक्रिय होकर बिहार से पश्चिम बंगाल और असम तक कहर ढाता रहा.

    पूरे भारत में इन दिनों किस तरह जल आपदा टूटी हुई है और इसके पीछे क्या वजहें सामने आ रही हैं? इस सवाल से जुड़े तमाम पहलुओं को समझकर आप मौसम के समीकरणों को समझ सकते हैं.

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    पिछले एक दशक में बाढ़ से होने वाला नुकसान करीब 3 अरब डॉलर हर साल रहा.


    बाढ़ की घटनाओं की बाढ़!
    साल 1950 के बाद से मध्य भारत में भारी बारिश की घटनाएं तीन गुना हो चुकी हैं. मध्य और उत्तर भारत में भारी बारिश से गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल के साथ ही गोवा, उत्तर कर्णाटक और दक्षिण केरल जैसे इलाके प्रभावित होते हैं. एक और आंकड़ा कहता है कि 1950 से 2017 के बीच भारत में बाढ़ की 285 घटनाएं हुईं, जिनसे करीब 85 करोड़ की आबादी प्रभावित हुई. इनमें से करीब 2 करोड़ लोग बेघर हो गए तो करीब 71000 जानें गईं.

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    इन तमाम घटनाओं से हुए नुकसान का मूल्य करीब 60 अरब डॉलर आंका जाता है. इस संबंध में एक रिपोर्ट की मानें तो पिछले एक दशक में बाढ़ से होने वाला नुकसान करीब 3 अरब डॉलर हर साल रहा.

    बढ़ती बाढ़ का क्या कोई पैटर्न है?
    जिन इलाकों में कुल बारिश कम हो रही है, वहां भारी बारिश की घटनाएं बढ़ती दिखी हैं. इस अजीबो गरीब पैटर्न से आपदा खड़ी हो जाती है और खेती बाड़ी को बड़ा नुकसान होता है. कारणों में भी पैटर्न दिखता है. उत्तरी अरब सागर में मानसून हवाएं काफी उतार चढ़ाव भरी रही हैं, जिससे मॉइश्चर सप्लाई बढ़ी है यानी यह पूरे मध्य भारती बेल्ट में भारी बारिश का कारण है. इसके पीछे एक फैक्टर मानवीय गतिविधियों से बढ़ा कार्बन उत्सर्जन है.

    क्या कह रही हैं स्टडीज़?
    न्यूयॉर्क के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में दावा किया गया कि मॉनसून के लो लेवल जेटस्ट्रीम के शिफ्ट होने से भारत के पश्चिमी तटों के दक्षिणी हिस्से पर पिछले तीन दशकों से मॉइश्चर का ट्रेंड बना हुआ है. दूसरी तरफ, भू विज्ञान मंत्रालय की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के असर के कारण 21वीं सदी में भारत में गर्मियों में बारिश होने और भारी बारिश होने की घटनाएं बढ़ेंगी.

    भारत में बढ़ रही बाढ़ पर केंद्रित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बाढ़ का खतरा गंभीर और अप्रत्याशित होता जा रहा है. साल 2018 में ही भारत में बाढ़ से 950 अरब रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ. वहीं, शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ने के पीछे खराब ड्रेनेज सिस्टम और जलीय स्रोतों पर बेतहाशा अतिक्रमण रहे हैं. एक और बड़ी वजह यह है कि बाढ़ नियंत्रण के लिए कई एजेंसियां काम कर रही हैं, जिनके बीच कोई समन्वय नहीं है.

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    2018 में ही भारत में बाढ़ से 950 अरब रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ. (File Photo)


    तटीय शहरों पर बना रहेगा खतरा
    कई स्टडीज़ का दावा है कि मुंबई और कोलकाता जैसे भारतीय तटीय शहरों पर क्लाइमेट के कारण होने वाली बाढ़ का खतरा बना रहेगा. ये भी कहा गया है कि इन शहरों में विकास की दौड़ में पर्यावरण का खयाल नहीं रखा गया है,​ जिससे ये खतरे और बढ़े हैं. उदाहरण के लिए मुंबई के तटों पर मैंग्रूव के कुदरती जंगलों का काट दिया जाना एक बड़ा कारण रहा है, जिससे समुद्री तूफान और बाढ़ का खतरा बढ़ा है.

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    ये भी उल्लेखनीय है कि मध्य भारत में 1989 और 2000 की बाढ़ रही हो, मुंबई में 2005 की या 2007 में दक्षिण एशियाई बाढ़, ये सभी घटनाएं लगातार हुई भारी बारिश के कारण हुई थीं. और इस भारी बारिश की वजह वही मॉइश्चर सोर्स था, जो अरब सागर के पश्चिमी बहाव से आया था.

    उत्तर पूर्व में बाढ़ हर साल का दर्द
    हर साल असम में बाढ़ के तीन से चार दौर सामने आते हैं, जो राज्य के पूरे ज़मीनी इलाके के 39.58% हिस्से यानी करीब 31.05 लाख हेक्टेयर को प्रभावित करते हैं. ईस्टमोजो की डॉक्युमेंट्री के मुताबिक यह प्रभावित हिस्सा देश में बाढ़ के जोखिम वाले कुल इलाके का करीब 10% है. इस पूरे ब्योरे का मतलब यह है कि हर साल असम में बाढ़ से 200 करोड़ रुपये का नुकसान हो जाता है.

    कारण ब्रह्मपुत्र नदी और भारी बारिश ही है. जैसे बिहार में कोसी नदी जीवन रेखा भी है और बाढ़ की त्रासदी की वजह भी, ऐसे ही असम के लिए ब्रह्मपुत्र है. हाल में असम में जो बाढ़ आई, उसने 100 से ज़्यादा जानें लीं और लाखों को विस्थापित किया. 1950 से असम में यही हालात बने हुए हैं. डॉक्युमेंट्री की मानें तो इसका बड़ा कारण यही है कि यहां के नेता बाढ़ के बाद एक्शन में आते हैं, बाढ़ से बचने के लिए पूर्व तैयारी नहीं की जाती.

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