टायफून की जगह भारत ने फाइटर जेट राफेल पर क्यों खेला दांव?

टायफून की जगह भारत ने फाइटर जेट राफेल पर क्यों खेला दांव?
लड़ाकू विमान राफेल के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.

लद्दाख में सीमा (Ladakh Border) पर चीन के साथ विवाद और तनाव (India-China Tension) के हालात के बीच भारत को चर्चित यूरोपीय लड़ाकू विमानों राफेल की पहली खेप जुलाई के आखिर तक मिलने की उम्मीद है. ये भी कहा गया है कि चीन के साथ मौजूदा संघर्ष की स्थिति को देखते हुए राफेल विमानों (Rafale fighter jets) की डिलीवरी भारत समय से पहले चाह रहा है.

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भारत ने यूरोफाइटर के लड़ाकू विमान टायफून की जगह फ्रांस निर्मित फाइटर जेट राफेल को ज़्यादा तवज्जो दी. मोदी सरकार (Modi Government) ने फ्रांस के साथ जो समझौता (Rafale Deal) किया, उसके मुताबिक 7.87 अरब यूरो की कीमत में 36 राफेल फाइटर जेट खरीदे जाएंगे, जिनकी शुरूआती खेप भारत को मिलने वाली है. सवाल ये है कि भारत ने टायफून (Eurofighter Typhoon) की तुलना में राफेल के लिए डील क्यों की? साथ ही, ये भी जानिए कि क्यों भारत का पड़ोसी देश टायफून के लिए बड़ा सौदा कर रहा है.

टायफून नहीं, राफेल चुनने की वजहें क्या?
पहली बड़ी वजह तो यही थी कि भारत अपनी परमाणु शक्ति को केंद्र में रखकर ताकत बढ़ाना चाहता है. चूंकि राफेल जेट आसानी से न्यूक्लियर हथियारों को कैरी सकते हैं, इसलिए भारत के लिए यह सौदा ज़रूरत के मुताबिक रहा. दूसरी तरफ, भारत को अपने न्यूक्लियर ​हथियारों को ज़मीन, हवा और पानी से लॉंच करने वाले सुरक्षा सिस्टम की त्रयी को पूरा करना था इसलिए भी राफेल को तवज्जो दी गई.

भारत ने टायफून की जगह राफेल को राजनीतिक कारणों से भी चुना. अस्ल में, फ्रांस के साथ भारत के संबंध इस तरह के रहे हैं कि न्यूक्लियर विस्फोटक कैरी करने के लिए लड़ाकू विमान में रूपांतरण या कुछ फीचरों का बदलाव करवाया जा सकता है. दूसरी तरफ, यूरोफाइटर टायफून का प्रबंधन और नियंत्रण चूंकि चार यूरोपीय देशों के हाथ में है, इसलिए ऐसे किसी भी संशोधन के लिए चार देशों की सहमति लेना होती, जो कि लंबी और तनावपूर्ण प्रक्रिया हो सकती थी. वैसे भी जर्मनी का रिकॉर्ड ऐसे मामलों में भारत के लिए उलझा हुआ रहा है.
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टायफून फाइटर जेट के लिए तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.


दोनों फाइर यूरोपियन प्रोजेक्ट थे लेकिन...
अस्ल में, 1970 के दशक के आखिर में पांच यूरोपीय देशों फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और यूके ने मिलकर यूरोफाइटर टायफून और डासॉल्ट राफेल दोनों प्रोजेक्टों को साझा तौर पर शुरू किया था. लेकिन फ्रांस इन प्रोजेक्टों में जिस तरह की तकनीक का इस्तेमाल चाहता था, अन्य देशों के साथ उसे लेकर सहमति बन नहीं पा रही थी. 1985 में फ्रांस ने इस प्रोजेक्ट से अलग होकर अपने स्तर पर फाइटर जेट राफेल डेवलप करने का फैसला किया.

बड़ी टायफून डील क्यों कर रहा है भारत का पड़ोसी?
राफेल बनाम टायफून की कहानी में ताज़ा पेंच ये है कि भारत के पड़ोसी देश इंडोनेशिया अपनी पूरी फ्लीट के लिए 15 यूरोफाइटर टायफून लड़ाकू जेट की खरीदी करना चाह रहा है. इंडोनेशियाई रक्षा मंत्री के पत्र के हवाले से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की खबरों के मुताबिक कहा जा रहा है कि इंडोनेशिया को हमेशा से यूरोपीय तकनीक पर भरोसा रहा है.

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इंडोनेशिया चूंकि अपनी वायुसेना को मज़बूत और आधुनिक करना चाहता है इसलिए वह ऑस्ट्रिया के साथ इस सौदे में दिलचस्पी ले रहा है. हालांकि मीडिया रिपोर्टों में ये भी कहा गया है कि इंडोनेशिया को इस सौदे के लिए मंज़ूरी मिलने में काफी उलझनें पेश आ सकती हैं क्योंकि जर्मनी, इटली, स्पेन और यूके की सहमति ज़रूरी होगी. हालांकि पहले ये भी खबरें थीं कि इंडोनेशिया राफेल सौदा चाहता था, लेकिन अपने बजट के चलते इंडोनेशिया यह सौदा नहीं कर सका.

चूंकि CAATSA के तहत इंडोनेशिया के अमेरिकी फंड प्रभावित हुए हैं और वित्तीय संकटों के चलते इंडोनेशिया के सामने स्थिति यह है कि वो रूस के साथ Su-35 Flanker-E नाम के 11 लड़ाकू विमानों की 1.1 अरब डॉलर की डील से मुकर नहीं सकता, इसलिए राफेल के बदले टायफून को चुनना उसकी मजबूरी भी है.
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