इसलिए खारिज करने लायक है कश्मीर पर UN की मानवाधिकार रिपोर्ट

कश्मीर में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है और इसके लिए भारत कितना ज़िम्मेदार है? इस तरह के सवालों के जवाब पर आधारित यूएन की एक रिपोर्ट को भारत ने खारिज कर दिया है. क्यों यह रिपोर्ट खारिज की गई, कारणों की पड़ताल करें.

News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 6:33 PM IST
इसलिए खारिज करने लायक है कश्मीर पर UN की मानवाधिकार रिपोर्ट
विदेश मंत्रालय प्रवक्ता रवीश कुमार यूएन की मानवाधिकारों की रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर चुके हैं.
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Updated: July 9, 2019, 6:33 PM IST
कश्मीर में मानवाधिकारों के हालात को लेकर संयुक्त राष्ट्र (यूनाइटेड नेशंस) की रिपोर्ट को भारत सिरे से खारिज कर चुका है.  भारत ने कहा है कि ये रिपोर्ट पक्षपाती है और पाकिस्तान में राज्य की शह पर पनप रहे आतंकवाद को एक तरह से समर्थन देती हुई लगती है. भारत ने तमाम आंकड़ों के हवाले से इस रिपोर्ट को खारिज किया है और यूनाइटेड नेशंस पर निष्पक्ष रवैया न बरतने का आरोप भी लगाया है. ऐसा क्या है इस रिपोर्ट में कि भारत को इतनी तीखी प्रतिक्रिया देना पड़ी? और क्यों इस रिपोर्ट को लेकर पाकिस्तान उछलकर भारत की तरफ उंगली उठा रहा है? इन सवालों के जवाब में असल में पाकिस्तान की कलई खुलती है, जिसे इस रिपोर्ट में यूएन ने खुद स्वीकार भी किया है.

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सबसे पहले ये जानें कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय के हाई कमिश्नर (OHCHR) ने ये रिपोर्ट जारी की है और इसके पहले चैप्टर के पहले शीर्षक में भारत के कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का ज़िक्र है तो दूसरे शीर्षक के अंतर्गत पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का भी. इसके निष्कर्ष में भी यह रिपोर्ट कहती है कि दोनों ही देशों के हिस्से वाले कश्मीर में मानवाधिकारों का हनन चिंता का सबब बना हुआ है. ये रिपोर्ट दोनों ही सरकारों को कठघरे में खड़ा करती है. लेकिन पाकिस्तान की कलई इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में ही खुल जाती है.

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पाकिस्तान वाले कश्मीर के सही आंकड़े नहीं मिले
इस रिपोर्ट की तथ्यात्मकता पर सवालिया निशान भी लगता है क्योंकि रिपोर्ट की प्रस्तावना में यह स्वीकार किया गया है कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाले आज़ाद कश्मीर और गिलगिट बाल्टीस्तान वाले हिस्से से पूरे और सही आंकड़े मिले ही नहीं हैं. ये भी स्वीकारा गया है कि ऐसे में, वहां मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर सही मूल्यांकन हो ही नहीं सका है. ऐसे में, इस रिपोर्ट पर एकतरफा होने का आरोप जायज़ भी लगता है क्योंकि पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर को लेकर बहुत सीमित आकलन प्रस्तुत किया गया है.

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विदेश मंत्रालय ने यूएन की इस रिपोर्ट को भारत की संप्रभुता और अखंडता पर हमला करार दिया था.

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इसलिए नहीं सामने आया पीओके का सच
रिपोर्ट की प्रस्तावना में पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में मानवाधिकारों की पूरी स्थिति के साफ न हो पाने का कारण भी इशारों में ज़ाहिर किया गया है. प्रस्तावना के 5वें पाइंट के अंतर्गत लिखा गया है :

जैसा कि 2018 की रिपोर्ट में देखा गया था, भारतीय कश्मीर से जिस मात्रा और गुणवत्ता की सूचनाएं मिलीं, उतनी ही उलट स्थिति पीओके से मिलने वाली सूचनाओं की रही. भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य में कई चुनौतियों के बावजूद एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार सक्रिय रहने के लिए स्वतंत्र और काबिल हैं, जो वहां मानवाधिकारों की स्थिति को दर्ज कर पा रहे हैं. दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्ज़े में आने वाले आज़ाद कश्मीर और गिलगिट बाल्टीस्तान हिस्सों में अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है, शांति से सभा करने, मत रखने तक की आज़ादी नहीं है, तो ऐसे में वहां से मिलने वाली सूचनाएं ही सीमित रही हैं, जिनके आधार पर मानवाधिकारों की स्थिति का आकलन किया गया है.

कैसे तैयार की गई है रिपोर्ट?
इस रिपोर्ट में मैथडोलॉजी खंड में बताया गया है कि इस रिपोर्ट को तैयार करने में किन पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया.
* भारत और पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर की स्थितियों की लगातार मॉनीटरिंग की गई.
* इस रिपोर्ट को तैयार करने में जिन दस्तावेज़ों को आधार बनाया गया उनमें सूचना के अधिकार के तहत मिली सूचनाएं, सक्रिय कार्यकर्ताओं, एनजीओ, पत्रकारों से मिली सूचनाएं, संसद, पुलिस और कोर्ट से मिली सूचनाएं शामिल हैं.
* इस रिपोर्ट के लिए कार्यालय ने कई चश्मदीदों, पीड़ितों और विशेषज्ञों ने गोपनीय इंटरव्यू किए हैं.
* ये भी दावा किया गया है कि रिपोर्ट के लिए ज़्यादातर उन सूचनाओं पर भरोसा किया गया है जो भारत और पाकिस्तान के सरकारी स्रोतों से मिली हैं या फिर विभिन्न मुद्दों पर सक्रिय अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विश्लेषणों से.

दो बातें हैं ध्यान देने लायक
पहली बात तो यह कि इस रिपोर्ट को तैयार करने की पद्धति का जिक्र करते हुए इसमें प्रस्तावना के 5वें पॉइंट को जस का तस लिखा गया है, जो ये साबित करता है कि पाकिस्तान से सही और पूरे आंकड़े नहीं मिलने के बावजूद इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है. और रिपोर्ट खुद इस बात पर ज़ोर दे रही है. दूसरी बात यह कि, इस रिपोर्ट की मैथडोलॉजी में यह भी स्वीकारा गया है कि OHCHR को कश्मीर में घुसने की इजाज़त इस बार भी नहीं मिली इसलिए आरोपों का सत्यापन नहीं हो सका.

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