मुस्लिम देशों से क्यों बिगड़ रहे हैं भारत के संबंध?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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ज़्यादातर एशिया के मुस्लिम देशों के साथ भारत के संबंध बेहतर रहना इसलिए ज़रूरी है ​क्योंकि तेल जैसे कई ज़रूरी कारोबार इन्हीं देशों के साथ मिलकर संभव हैं. सिर्फ ज़रूरतों के लिए ही नहीं बल्कि करीबी पड़ोसियों से बेहतर संबंध कूटनीतिक रूप से भी ज़रूरी होते हैं. इन संबंधों को लेकर पूरा परिदृश्य आपको जानना चाहिए.

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मध्य पूर्व (Middle East) के मुस्लिम आबादी बहुल देशों और फारस के देशों के साथ पिछले कुछ सालों में भाजपा की सरकार (Modi Government) ने बेहतर संबंध स्थापित कर वाहवाही लूटी थी. घोषित रूप से राष्ट्रवादी और हिंदुत्व (Hindutva) समर्थक एजेंडे वाली पार्टी की सरकार के लिए यह उप​लब्धि वाकई बहुत बड़ी थी, लेकिन अब पिछले पांच सालों की भारत (India) सरकार की मेहनत पर बड़ा खतरा दिख रहा है क्योंकि कई मुस्लिम देश (Muslim Countries) भारत से नाराज़ नज़र आ रहे हैं.

कोविड 19 (Covid 19) संक्रमण के दौर में अर्थव्यवस्था (Economy) पहले ही नाजुक मोड़ पर है और ऐसे में मुस्लिम देशों के साथ अगर बात कारोबारी बायकॉट तक पहुंच जाती है तो विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भारत के लिए बड़े नुकसान की आशंका होगी. अच्छे संबंध क्यों खराब हो रहे हैं और ये भी जानें कि पूरा परिदृश्य कैसा बन रहा है.

एक के बाद एक चार वजहों से नाराज़गी
भारत में पिछले साल यानी 2019 से एक के बाद एक चार घटनाएं ऐसी हुईं, जो न केवल दुनिया भर में चर्चा का विषय रहीं, बल्कि उनके आधार पर सरकारों के बीच भी कई किस्म की चर्चाएं हुईं. इन पर एक नज़र.
1. कश्मीर से धारा 370 ​​हटाकर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटना.


2. नागरिकता संबंधी कानून यानी सीएए को लेकर सरकार के खिलाफ भारत में खास तौर से मुस्लिम समुदाय के व्यापक प्रदर्शन.
3. इसी साल 23 फरवरी से शुरू हुए दिल्ली दंगों में ज़्यादातर मुस्लिम आबादी के खिलाफ भारी हिंसा.
4. कोरोना वायरस महामारी के दौरान विशेषकर तब्लीगी जमात प्रकरण के बाद मुस्लिमों को महामारी के लिए ज़िम्मेदार ठहराकर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की लहर.

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तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोगान के साथ भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी. फाइल फोटो.


इन चार प्रमुख कारणों से पिछले कुछ समय से भारत के मुस्लिम देशों के साथ संबंधों को लेकर एक गतिरोध बना हुआ है. इस बारे में रणनीतिक रूप से विदेश मंत्रालय ने डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी की हैं, लेकिन एक पूरा परिदृश्य चेतावनी देता हुआ लग रहा है कि भारत को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा. आइए सिलसिलेवार समझें.

तुर्की ने पाक के पक्ष में दिखाए तेवर
इस साल 14 फरवरी को पाकिस्तान की संयुक्त संसद में तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोगान ने अपने 25 मिनट के भाषण में 6 बार कश्मीर का ज़िक्र किया और इसे तुर्की की आज़ादी के संघर्ष के साथ जोड़कर कहा कि तुर्की के लिए कश्मीर महत्वपूर्ण है जैसे पाकिस्तान के लिए है. भारत ने इस भाषण को खारिज करते हुए कहा था कि यह भारत का अंदरूनी मामला है और भारत ने तुर्की के राजदूत को आपत्ति पत्र भी दिया.

मलेशिया ने की आलोचना
पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रिश्ते बढ़ाने वाले मलेशिया ने भी सितंबर 2019 में आलोचना करते हुए भारत को कश्मीर में घुसपैठ कर उस पर कब्ज़ा करने संबंधी बयान दिया था. इसके बाद मलेशिया ने सीएए के संदर्भ में भी आलोचना करते हुए कहा था कि यह कानून कुछ मुस्लिमों को नागरिकता से वंचित करने के लिए है.

ईरान ने भी खोला मुंह
कश्मीर का मुद्दा हो या सीएए का या उसके बाद दिल्ली हिंसा का, भारत का पुराना दोस्त रहा ईरान चुप नहीं बैठा और आलोचना पर आमादा दिखा. कश्मीर के मुस्लिमों के साथ बेहतर सलूक करने की हिदायत देने के साथ ही ईरान ने भारत सरकार से 'हिंदू अतिवादियों पर कार्यवाही' की मांग भी की और दिल्ली हिंसा के संदर्भ में 'मुस्लिमों के खिलाफ नरसंहार जैसे संगठित अपराध' को रोकने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि ऐसा रहा तो भारत 'इस्लाम जगत में अलग थलग' कर दिया जाएगा.

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सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान के साथ पीएम नरेंद्र मोदी. फाइल फोटो.


अन्य मुस्लिम देशों ने उठाई आवाज़
दिल्ली दंगों को लेकर इंडोनेशिया ने जकार्ता में भारतीय राजदूत को तलब कर जवाब मांगा था. वहीं, बांग्लादेश के विदेश और गृह मंत्रियों ने अपनी भारत यात्रा पिछले साल दिसंबर में रद्द कर दी क्योंकि उसने सीएए को अपने देश के खिलाफ समझा. सीएए और दिल्ली दंगों के खिलाफ अफगानिस्तान में प्रदर्शन हुए.

सऊदी और यूएई ने दिखाई दोस्ती
इन तमाम देशों के विरोध या आलोचनात्मक रवैये के बीच सऊदी अरब और यूएई ने भारत के पक्ष में बयान दिए. कश्मीर मुद्दे को इन्होंने भारत का अंदरूनी मामला करार दिया. अस्ल में, 2015 में पाकिस्तान ने इन देशों का साथ नहीं दिया था, तबसे दोनों देश भारत के पक्ष में हैं और​ रिफाइनरियों में निवेश समेत समेत कई तरह के महत्वपूर्ण कारोबारी रिश्ते भारत और इन दो देशों के बीच परवान चढ़ रहे हैं.

भारत पर कैसे हो रहा है असर?
ट्रंप और अमेरिका के सामने झुक जाने से बेहद नाराज़ ईरान ने भारत से तेल का आयात बंद करने के साथ ही चाबहार में अपनी दिलचस्पी खत्म कर ली है. भारत के मुस्लिम देशों के साथ संबंधों को लेकर इंडियन एक्सप्रेस के लेख के मुताबिक अब कश्मीर और सीएए के मुद्दे पर भी ईरान फोकस कर रहा है. वहीं, चीन के प्रभुत्व को रोकने के लिए इंडो पैसिफिक समझौते को लेकर इंडो​नेशिया के साथ भारत के संबंध महत्वपूर्ण हैं. इसके अलावा मलेशिया ने भारत से पाम आइल के आयात और तुर्की ने स्टील उत्पाद के आयात को खत्म कर दिया है.

साथ ही, इस्लामिक कॉन्फ्रेंस के संयुक्त संगठन यानी ओआईसी ने कश्मीर के मुद्दे पर मुस्लिम देशों की एक संयुक्त बैठक का प्रस्ताव रखा है, लेकिन यह संगठन अरब देशों के प्रभुत्व वाला है, फिर भी विशेषज्ञों के मुताबिक जिस तरह संगठन पर दबाव बन रहा है, कश्मीर पर मुस्लिम देश किसी तरह का संयुक्त स्टैंड ले सकते हैं. फॉरेन पॉलिसी की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ मुस्लिम देशों के भारत में निवेश की परियोजनाएं भी इन कारणों से खटाई में पड़ चुकी हैं.

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भारत में मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को लेकर अरब देशों में नाराज़गी दिख रही है.


भारत ने किया डैमेज कंट्रोल
अरब देशों समेत मुस्लिम देशों की नाराज़गी को देखते हुए भारत ने कुछ रणनीतिक कदम उठाए हैं. एफपी की रिपोर्ट की मानें तो भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूएई, कतर, ओमान और सऊदी अरब से बातचीत कर आश्वासन दिया कि रमज़ान के दौरान भारत मुस्लिमों को भोजन सप्लाई करवाएगा और महामारी के दौरान हर संभव इलाज व मदद भी देगा.

और 'इस्लामोफोबिया' भी चर्चित
अल जज़ीरा की एक हफ्ते पहले की रिपोर्ट इस बात पर आधारित है कि भारत में ​मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का सिलसिला जारी है और लगातार हो रहे घटनाक्रमों से भारत में इस्लामोफोबिया पैदा हुआ है. इसके कारण मुस्लिम समुदाय हिंसा का शिकार हो रहा है. साथ ही, इस पूरे परिदृश्य को लेकर अरब देशों के मुस्लिम भारतीय मुस्लिमों के पक्ष में आ रहे हैं और अरब देशों में रहने वाले हिंदुओं की आलोचना करते हुए उन्हें सावधान भी कर रहे हैं कि वो अपनी टिप्पणियों को संयमित रखें.

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