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इंदिरा गांधी ने क्यों नहीं रखे कभी चीन से संबंध?

इंदिरा गांधी ने क्यों नहीं रखे कभी चीन से संबंध?

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी.

1970 के दशक की शुरूआत में भारत-चीन के संबंध (India-China Relations) बेहतर होने का मौका आया था और दूसरी बार 1980 के दशक में. दोनों ही बार प्रधानमंत्री Indira Gandhi थीं लेकिन इसे मौके की नज़ाकत कहें या Foreign Policy की समस्याएं कि भारत चीन के ​बीच Border Dispute सुलझने की कगार तक पहुंचकर भी सुलझा नहीं.

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    Ladakh स्थित Galwan Valley Face-Off के बाद भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव की स्थिति इसलिए है कि एक बार फिर चीन ने सीमा विवाद (LAC Issue) को हवा दी है. चीन के साथ सीमा विवाद 1962 के युद्ध (Sino-Indian War) के समय से है. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कैसे भारत और चीन के संबंधों को सुधारने और विवाद को निपटाने के मौके बने थे लेकिन बात नतीजे तक नहीं पहुंच सकी. क्या इसके लिए इंदिरा गांधी ज़िम्मेदार थीं? या फिर भारतीय Foreign Policy की मजबूरियां?

    बेहतर संबंध के लिए इंदिरा और माओ के संदेश
    भारत और चीन के बीच 1962 का ऐतिहासिक युद्ध हो चुका था. 1966 में इंदिरा गांधी भूटान का पक्ष ले चुकी थीं और चीन उनसे नाराज़ था. दोनों देशों के रिश्तों में उलझनें बनी हुई थीं. 1960 के दशक के अंत तक चीन सीमाओं को लेकर सोवियत रूस के साथ उलझ चुका था और कुछ भूभाग पर कब्ज़ा करना चाहता था. इधर, भारत के लिए पाकिस्तान चुनौती बनता जा रहा था और पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह भड़क रहा था.

    इन हालात में, तत्कालीन प्रधानमंत्री ​इंदिरा गांधी चीन के साथ संबंध बेहतर करना चाहती थीं. इस संदेश के साथ 1970 में उन्होंने अपने करीबी राजनयिक ब्रजेश मिश्रा को चीन भेजा भी था. चीन में, कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख और तानाशाह माओ त्से तुंग ने भी मिश्रा को भारत के साथ संबंध बेहतर करने के मन का संदेश दिया. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच तनाव खत्म होने के बजाय और क्यों बढ़ा?


    भारत-रूस संधि तक पहुंची बात
    अस्ल में, उस समय का राजनीतिक परिदृश्य समझे बगैर भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को नहीं समझा जा सकता. एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन थे, जो भारतीयों और खासकर इंदिरा से बेहद नफरत करते थे. दूसरी तरफ, सोवियत रूस के खिलाफ निक्सन अमेरिकी दबदबे के लिए चीन के साथ रिश्ते गांठने में लगे थे. ऐसे में, भारत को पाकिस्तान से भी निपटना था.

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    चीन के प्रधानमंत्री रहे झाउ एनलाई और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक तस्वीर.


    इन तमाम हालात के चलते इं​दिरा गांधी ने भारत चीन दोस्ती से ज़्यादा तवज्जो भारत रूस मैत्री समझौते को दी. इसकी एक वजह बताते हुए राजनीतिक रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने लिखा है कि अस्ल में, इंदिरा के करीबी सलाहकार सोवियत रूस के हिमायती ज़्यादा थे, चीन के साथ संबंध सुधार के कम.

    चीन ने भारत को कपटी समझा या गलतफहमी?
    भारत एक तरफ, चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए संदेश भी भेज रहा था और दूसरी तरफ, चीन के साथ सीमा विवाद में उलझे रूस की तरफ उसका झुकाव भी साफ था. ऐसे में चीन से झाउ एनलाई ने इंदिरा गांधी के संदेशों के जवाब नहीं दिए और बात 1971 में भारत व रूस के बीच 'शांति, दोस्ती और सहयोगी' के समझौते तक पहुंच गई.

    इंदिरा गांधी के इस कदम को चीन ने उस वक्त यही समझा कि भारत ने उसके दुश्मन के साथ हाथ मिलाकर चीन के खिलाफ हरकत की है. हालांकि इंदिरा ने साफ किया था कि भारत का यह कदम पाकिस्तान के खिलाफ था. लेकिन क्या चीन को कोई गलतफहमी हुई?


    कम्युनिस्ट पार्टी से दल बदलकर 1996 में भाजपा में शामिल होने वाले कुलकर्णी ने द वायर के लिए लेख में लिखा है कि एक हद तक चीन का मानना ठीक था क्योंकि समझौते में चीन को रोकने के बारे में ज़िक्र था. इस समझौते में चीन को 'अप्रत्याशित दुश्मन' और माओ की 'हंसी को छल' बताकर चीन से सतर्क रहने, जैसे जुमलों का इस्तेमाल हुआ था.

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    तो क्या था रूस के साथ समझौता?
    इस समझौते का एक बड़ा पहलू था आर्टिकल IX, जिसका सार ये था कि पड़ोसी हमले के चलते हुए युद्ध की स्थिति में रूस भारत का साथ देगा और भारत रूस का. अब सवाल खड़ा होता है कि भारत को रूस के साथ इस तरह के समझौते की उस वक्त क्या ज़रूरत थी.

    यह सही है कि पाकिस्तान और अमेरिका उस वक्त भारत के लिए खतरे थे, लेकिन कुलकर्णी इशारा करते हैं कि यह समझौता चीन से निपटने के लिए ही था क्योंकि पाकिस्तान के खिलाफ भारत को किसी विदेशी मदद की ज़रूरत नहीं थी. बहरहाल, इसके बाद बांग्लादेश की स्थापना के लिए भारत पाकिस्तान युद्ध हुआ. और इस समय तक चीन के साथ संबंध सुधार के लिए इंदिरा सरकार की थोड़ी बहुत कोशिशें नाकाम हो चुकी थीं.

    इंदिरा के पास आया था एक और मौका
    साल 1970-71 में चीन के साथ संबंध सुधार के मोर्चे को अंजाम तक न पहुंचा सकीं इंदिरा गांधी के पास दूसरा मौका 1983 में आया, जब चीन के साथ सीमा विवाद को हल किया जा सकता था. भारत के वरिष्ठ राजनयिक श्याम सरन ने बाद में अपनी किताब में इस पूरे मामले को विस्तार से बताया.

    चीन ने कहा था कि अगर इंदिरा गांधी चीन का दौरा करें और आमने सामने बैठकर चर्चा करें तो प्रस्ताव पर चर्चा की जा सकती थी. सरन के मुताबिक चीन में भारत के वरिष्ठ राजनयिक वेंकटेश्वरन ने तब अक्साई चीन को लेकर सीमा​ विवाद पर एक प्रस्ताव रखा था, जिसे लेकर चीन ने यह संदेश भिजवाया था. उस समय के विदेश नीति सलाहकार जी पार्थसारथी तक जब यह संदेश पहुंचा तो क्या हुआ?

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    भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की एक यादगार तस्वीर.


    और इस तरह टल गई थी बात
    'अगर यह पैकेज डील होती है और चीन मान जाता है तो भारत के लिए यह सुनहरा मौका ​होगा.' सरन ने अपनी किताब में लिखा है कि पार्थसारथी को इस तरह पूरा संदेश दिया गया था लेकिन उन्होंने चीन के कपट को याद किया और यही कहा कि चीन नेहरू और इंदिरा दोनों के साथ पहले ज़बान से मुकर चुका है, उसका विश्वास नहीं कर सकते. पार्थसारथी के स्तर पर बात खत्म हो जाने के बाद वेंकटेश्वरन ने सीधे इंदिरा गांधी से यह चर्चा की थी.

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    अपनी किताब में सरन ने लिखा कि तब इंदिरा ने 1985 के आम चुनाव हो जाने के बाद इस बारे में कुछ तय करने की बात कही थी. लेकिन, अफसोस उससे पहले ही इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. 2019 में भाजपा के खिलाफ जाकर राहुल गांधी का समर्थन करने वाले कुलकर्णी ने इस ज़िक्र के साथ लिखा कि अजीब इत्तिफाक है कि 1964 में नेहरू ने कश्मीर मुद्दे पर शेख अब्दुल्ला को जनरल अयूब खान से बातचीत के लिए भेजा था. बात सकारात्मक भी थी, लेकिन तब नेहरू नहीं रहे थे.

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