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चीन में अब मंगोल आबादी क्यों है नाराज़? क्यों हो रहे हैं विरोध प्रदर्शन?

चीन में मंगोल समुदाय एक भाषा नीति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए. (चित्र गार्जियन से साभार)

चीन में मंगोल समुदाय एक भाषा नीति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए. (चित्र गार्जियन से साभार)

चीन कह रहा है कि यह 'साझा भाषा संस्कृति' को बढ़ावा देने वाला कदम है, लेकिन दक्षिणी मंगोलिया (Southern Mongolia) को पुराने ज़ख्म अच्छी तरह याद हैं. "दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है", फिर यह तो गर्मागर्म दूध परोसा गया है. चीन की हान संस्कृति (Chinese Culture) के एक और हमले से किस तरह मंगोल आहत हैं और क्या है पूरी कहानी?

  • News18India
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निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को सूल... किसी से उसकी भाषा छीन लेना, उसके पूरे इतिहास (History), ज्ञान और उसकी सांस्कृतिक विरासत (Cultural Legecy) को नष्ट कर देना ही है. यानी आप किसी समुदाय की भाषा पर हमला (Ethnic Genocide) करते हैं, तो वह समुदाय बचने की हर मुमकिन कोशिश करेगा ही, चाहे बगावत ही करनी पड़ जाए. ऐसा ही कुछ इन दिनों चीन में हो रहा है.

पिछले दिनों न्यूज़ 18 ने आपको बताया था कि चीन के एक हिस्से में किस तरह उइगर मुसलमानों को कुचलने के लिए चीन तरह तरह के हथकंडे अपना रहा है. अब जानिए कि कैसे इनर मंगोलिया में क्यों हज़ारों लोग चीन के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं.

कोरोना वायरस (Corona Virus) संक्रमण के प्रकोप के कुछ थमने के बाद जब स्कूल खुलने की नौबत आई, तो इनर मंगोलिया में अभिभावकों के सामने एक नई मुश्किल आ खड़ी हुई. स्कूलों में तीन खास विषयों को मंगोलियाई भाषा की जगह चीन की आधिकारिक भाषा मैंडेरिन (Mandarin) में पढ़ाए जाने के नियम जारी हुए. इस नियम और चीन के इस हमले के बारे में जानने से पहले जानना चाहिए कि यह कहानी कितनी लंबी है.

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इतिहासकार लामजाब बोरजिगिन और उनकी किताब का मुखपृष्ठ.


एक किताब बताती है हकीकत
'चाइना कल्चरल रिवॉल्यूशन' नाम की एक किताब 75 वर्षीय इतिहासकार लामजाब बोरजिगिन ने लिखी थी, जिसे छपने में बड़ी मुश्किल होने पर लामजाब ने इसकी 2000 प्रतियां गुपचुप ढंग से छपवाईं. चीन सरकार ने इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया और काफी कोशिशों के बावजूद चीन 1100 से ज़्यादा कॉपीज़ ज़ब्त नहीं कर पाया. लामजाब पर बौखलाहट में चीन ने सिर्फ तीन घंटे का मुकदमा चलाकर उन्हें नज़रबंद करवा दिया.

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असल में, लामजाब की यह किताब इनर मंगोलिया में उस दमन की नृशंस कहानी बयान करती है, जिसे चीन ने पिछले 50 सालों में अंजाम दिया. 70 के दशक से सिलसिलेवार चले इस दमन में चीन ने करीब 1 लाख लोगों को मौत के घाट उतारकर एक पूरी जाति को खत्म करने की साज़िश किस तरह रची, कैसे यातनाएं दी गईं और कैसे एक संस्कृति को नष्ट किया गया, यह किताब इस पूरे इतिहास को सामने रखती है.

आबादी को ऐसे बांट दिया गया
सदियों पहले इनर मंगोलिया और आउटर मंगोलिया मिलकर ग्रेटर मंगोलिया बनाते थे, लेकिन चीन की नज़र जबसे पड़ी, तबसे यहां बस्तियों और आबादियों संबंधी बदलाव शुरू हुए. 1911 में जब चीन राजशाही से आज़ाद होकर गणतंत्र बना, तब मंगोलिया के भी आज़ाद होने की उम्मीद जागी लेकिन रूस की मदद के बावजूद मंगोलिया कभी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो सका. खास तौर से इनर मंगोलिया पर चीन का कब्ज़ा बना ही रहा.

इनर मंगोलिया का मतलब है 12 फीसदी चीन, लेकिन 1911 से चीन ने जिस तरह यहां आबादी के समीकरण बदले, उसका अंजाम ये हुआ कि 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद यहां मंगोल अल्पसंख्यक हो चुके थे और चीन का हान समुदाय यहां हावी था. जैसा हमने उइगर मुसलमानों संबंधी रिपोर्ट में आपको चीन की सांस्कृतिक दमन नीति के बारे में बताया था.

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इसके बाद माओ ने जब 70 के दशक में चीन की संस्कृति के विस्तार के नज़रिये से एक आक्रामक नीति घोषित की और चीन ने तबसे कम से कम साढ़े चार करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारकर कई जातियों और संस्कृतियों के दमन को अंजाम दिया. इनमें मंगोल बस्तियां और आबादी भी शामिल है.

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मंगोल इतिहासकार लामजाब को नज़रबंद किए जाने की चर्चा सोशल मीडिया पर हुई थी.


एक बार फिर संस्कृति पर हमला
जानकारों के हवाले से ​एक रिपोर्ट कहती है कि उइगर मुसलमानों के मामले में दमनकारी नीतियों के लिए चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव होने के बावजूद चीन अल्पसंख्यकों को पूरी तरह अपने में मिलाकर हर विरोध की गुंजाइश खत्म कर देना चाहता है. इसी तरह के मंसूबों के चलते इनर मंगोलिया में अब तथाकथित 'राष्ट्रीय भाषा में शिक्षा' की नीति जबरन थोपी जा रही है.

रिपोर्ट की मानें तो जर्मनी बेस्ड निर्वासित समूह इनर मंगोलियन पीपुल्स पार्टी के प्रमुख तेम्तसिल्तू शोब्तसूद ने कहा है कि मंगोल भाषा को खत्म करने के लिए 'यह चीन का हथकंडा है. जबकि पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की चर्चा है, इनर मंगोलिया की आवाज़ कोई नहीं सुन रहा.'

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कैसे हो रहा है विरोध?
चीन के इस नापाक मंसूबे को समझ चुके इनर मंगोलिया के कई लोग बड़ी संख्या में जुटकर प्रदर्शन कर रहे हैं. 'अपनी मादरी ज़बान के लिए हम देंगे जान' जैसे नारे इन प्रदर्शनों में गूंज रहे हैं. कई महिलाएं चीनी नीति के खिलाफ चल रहे हस्ताक्षर अभियान में अपने दस्तखत या अंगूठे के निशान दे रही हैं, जो सोशल मीडिया पर काफी प्रसारित हो रहा है.

राजनीति, इतिहास और भाषा व साहित्य जैसे तीन प्रमुख विषयों को चीन की आधिकारिक मैंडेरिन भाषा में पढ़ाए जाने के इस नए कानून के खिलाफ विरोध ज़ोर पकड़ रहा है. अभिभावक अपने बच्चों को बोर्डिंग स्कूलों से छुड़वा रहे हैं तो सामान्य स्कूल न भेजने के फैसले ले रहे हैं. आम तौर से जहां 1000 बच्चों का रजिस्ट्रेशन होता था, अब सिर्फ 40 का हो रहा है. अपनी मातृभाषा के लिए तमाम मंगोल एकजुट दिख रहे हैं.

दूसरी तरफ, सैकड़ों हजारों लोगों के प्रदर्शन को कुचलने के लिए दंगा निरोधक पुलिस भारी संख्या में तैनात है और चीन अपने सांस्कृतिक हमले को बलपूर्वक लागू करने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहा है.

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