आखिर भारत में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में क्‍यों पेश आ रही हैं मुश्किलें?

आखिर भारत में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में क्‍यों पेश आ रही हैं मुश्किलें?
भारत में दो महीने से ज्‍यादा के लॉकडाउन समेत तमाम प्रयासों के बाद भी रोज नए कोरोना पॉजिटिव आने की संख्‍या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है.

भारत में कोरोना मरीजों की संख्‍या (Coronavirus in India) 1.74 लाख को पार कर चुकी है. इनमें 4,982 लोगों की मौत हो गई है. वहीं, 82 हजार से ज्‍यादा लोग इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं. भारत में कोरोना वायरस से मृत्‍यु दर (Mortality Rate) 2.9 फीसदी पहुंच गई है, जबकि ठीक होने की दर (Recovery Rate) 47.5 फीसदी हो गई है.

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दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्‍या 60.61 लाख से ज्‍यादा हो गई है, जिनमें 3.67 लाख से ज्‍यादा की मौत हो चुकी है. वहीं, भारत में संक्रमितों की संख्‍या (Coronavirus in India) पिछले कुछ दिनों में तेजी से बढ़ी है. अब तक भारत में कोरोना मरीजों की संख्‍या 1.74 लाख को पार कर चुकी है. इनमें 4,982 लोगों की मौत हो गई है. वहीं, 82 हजार से ज्‍यादा लोग इलाज के ठीक हो चुके हैं. भारत में कोरोना वायरस से मृत्‍यु दर 2.9 फीसदी पहुंच गई है, जबकि ठीक होने की दर 47.5 फीसदी हो गई है. दो महीने से ज्‍यादा के लॉकडाउन (Lockdown) और हर तरह की संख्‍ती के बाद भी भारत में रोजाना नए पॉजिटिव (Corona Positive) मामले आने की संख्‍या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है. आखिर ऐसी क्‍या बता है, जिसकी वजह से देश में कोरोना वायरस के मामलों को थामने में मुश्किल पेश आ रही है.

हर 13 दिन में दोगुने हो रहे हैं कोरोना पॉजिटिव मामले
देश में पहले तीन कोरोना वायरस के मामले जनवरी के आखिरी सप्‍ताह में सामने आ गए थे. इसके बाद अब तक 1.74 लाख संक्रमित मामलों की पुष्टि हो चुकी है. देश में 22 मई तक कोरोना टेस्ट की पॉजिटिव दर 4 फीसदी थी. वहीं, कोरोना वायरस के कारण मृत्यु दर करीब 3 फ़ीसदी थी. वहीं, ठीक होने की दर में भी शानदार इजाफा हुआ है. देश में कोरोना मामलों के दोगुने होने में 13 दिन लग रहे हैं. ये आंकड़े बहुत बुरी तरह से प्रभावित कई देशों के मुकाबले काफी संतोषजनक हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात और मध्य प्रदेश में पूरे देश के 80 फीसदी से ज्‍यादा मामले हैं.

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लॉकडाउन की वजह से पिछले दो महीने में 37 हजार से 78 हजार लोगों की जिंदगी बचाई गई है. फिर भी पॉजिटिव केस के हिसाब से भारत दुनिया के 10 शीर्ष देशों में शामिल हो चुका है




टेस्टिंग के मामले में पीछे, हर 10 लाख पर सिर्फ 2,198 टेस्‍ट


संक्रमण से मरने वालों में आधे से ज्‍यादा मरीजों की उम्र 60 साल या ज्‍यादा थी. सरकार का दावा है कि लॉकडाउन की वजह से पिछले दो महीने में 37 हजार से 78 हजार लोगों की जिंदगी बचाई गई है. फिर भी पॉजिटिव केस के हिसाब से भारत दुनिया के 10 शीर्ष देशों में शामिल हो चुका है. वहीं, नए संक्रमण के मामलों में दुनिया के शीर्ष पांच देशों में है. पहले चरण का लॉकडाउन 25 मार्च को शुरू हुआ था. उस समय देश में सिर्फ 536 मामले थे. वहीं, इस समय रोजाना टेस्टिंग की संख्‍या भी एक लाख से ज्‍यादा हो गई है. फिर भी अभी प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ 2,198 टेस्ट ही हो रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण के मामलों में वृद्धि पहले के मुकाबले ज्‍यादा टेस्टिंग होने के कारण नजर आ रही है. टेस्ट करवाए जाने वालों के दायरे में अब उन लोगों के संपर्क में आने वाले बिना लक्षण वाले लोगों को भी शामिल कर लिया गया है.

शहरों से गांवों की ओर फैलना शुरू हो चुका है कोरोना वायरस
संक्रमण के शहरों से गांवों की ओर फैलने के सबूत भी मिलने लगे हैं. मई की शुरुआत में लॉकडाउन में दी गई छूट के साथ ही इस बात की आशंका जताई जा रही थी कि शहरों में रहने वाले लोगों के अपने गांवों की ओर लौटने पर संक्रमण अब तक बचे रह गए गांवों तक भी पहुंच जाएगा. फिर भी संतोष की बात सिर्फ इतनी सी है कि देश में कोविड-19 से मृत्‍यु दर काफी कम है. इस पर नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत कहते हैं कि हमारा ध्यान मौत के मामलों को कम करने और ज्यादा से ज़्यादा लोगों को ठीक करने पर होना चाहिए. एक शीर्ष वायरोलॉजिस्ट का कहना है कि आने वाले कुछ हफ्तों में हालात गंभीर होने जा रहे हैं. दिल्ली और मुंबई के डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के मामले में वृद्धि को देखते हुए अस्पतालों में बिस्तर व दूसरे संसाधन की कमी चिंता का कारण बनी हुई है.

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लॉकडाउन में ढील के बाद से अस्‍पतालों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से रोज सामने वाले नए मामलों की संख्‍या बढ़ती जा रही है.


लॉकडाउन में छूट के साथ ही फूलने लगे हैं डॉक्‍टरों के हाथ-पांव
लॉकडाउन में छूट मिलने के साथ ही डॉक्टरों के हाथ-पांव फुलने लगे हैं. इंदौर में कोरोना वार्ड में ड्यूटी कर रहे रवि दोसी कहते हैं कि हालात डराने वाले हैं. अब काफी लोगों ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया है. दफ्तर में किसी कर्मचारी के छींकने पर 10-15 सहकर्मी अस्पताल आ जाते हैं और टेस्ट की मांग करते हैं. इससे अस्‍पतालों पर दबाव बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि पूरे देश में एकसाथ लॉकडाउन लगाने और हटाने या ढील देने की नीति से काम नहीं चलेगा. राज्‍यों के हालात के हिसाब से फैसले लेने होंगे. वहीं, बिना लक्षण वाले मामलों को लेकर कोई पुष्‍ट अनुमान तक नहीं है. पिछले महीने सरकार के वरिष्‍ठ वैज्ञानिक ने कहा था कि 100 में से 80 मामले बिना लक्षण वाले या मामूली लक्षण वाले हैं. अगर इन सभी मामलों में सही से काम नहीं किया गया तो पहले से बेहाल अस्‍पतालों में हालात बदतर हो जाएंगे.

बिना लक्षण वाले पॉजिटिव केस की कॉन्‍टैक्‍ट ट्रेसिंग बढ़ाना जरूरी
स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लक्षण वाले और बिना लक्षण वाले मरीजों के लिए ज्‍यादा टेस्टिंग और कॉन्‍टैक्‍ट ट्रेसिंग की जरूरत है. साथ ही आइसोलेशन और क्‍वारंटीन सेंटर्स की भी जरूरत है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन के बायोस्टेटिक और ऐपिडॉमाेलॉजी के प्रोफेसर भ्रामर मुखर्जी कहते हैं कि हमें रोजमर्रा की जिंदगी में वायरस के जोखिम को कम से कम कर के जीना सीखना होगा. ये वायरस फिलहाल कहीं नहीं जा रहा है. ये हमारे साथ ही रहेगा. साथ ही कॉन्‍टैक्‍ट ट्रेसिंग के आधार पर सुपर स्प्रेडर, फ्रंटलाइन वॉरियर्स, डिलिवरी बॉयज और जरूरी सेवाओं में लगे लोगों के संपर्क में आने वालों की टेस्टिंग करनी होगी. अगर इनमें कोई पॉजिटिव निकलता है तो उसके इलाज के साथ ही उसके कॉन्‍टेक्‍ट में आए लोगों को ढूंढकर क्‍वारंटीन करना होगा.

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