अपने जेएनयू साथी उमर खालिद की गिरफ्तारी पर क्यों चुप हैं कन्हैया?

उमर खालिद, कन्हैया और अनिर्बान की एक पुरानी तस्वीर.
उमर खालिद, कन्हैया और अनिर्बान की एक पुरानी तस्वीर.

टीवी और इंटरनेट पर कई तरह के शो (Talk Shows) में साथ दिखने वाले और देशद्रोह (Sedation Charges) के मुकदमों तक की स्थिति में एक साथ खड़े होने वाले उमर और कन्हैया (Kanhaiya and Umar) के बीच क्या दूरी बढ़ गई है या यह किसी तरह की सियासत (Politics) है?

  • News18India
  • Last Updated: September 21, 2020, 3:35 PM IST
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में जो स्टूडेंट पॉलिटिक्स के उठान के वक्त साथ रहा, तिहाड़ जेल (Tihar jail) यात्रा जिसके साथ की और कई मंच जिसके साथ साझा किए, वही साथी जब गिरफ्तार हुआ तो कन्हैया कुमार चुप क्यों हैं? दिल्ली दंगों के मामले (Delhi Riots Case) में पूर्व छात्र नेता (Former Student Leader) उमर खालिद की गिरफ्तारी के बाद काफी देर से कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के उभरते चेहरे कन्हैया ने एक फेसबुक पोस्ट (FB Post) तो किया लेकिन असरदार ढंग से उमर के साथ खड़े होने से परहेज़ ही किया, क्यों? क्या कन्हैया और उमर के बीच दूरियां बढ़ गई हैं या फिर कोई और वजह है?

पिछले साल लोकसभा चुनाव में भाजपा के गिरिराज सिंह के हाथों बेगूसराय सीट से हार जाने के बावजूद कन्हैया राजनीति में अपना करियर तलाश रहे हैं. ऐसे में, अपने दोस्त, साथी कामरेड के लिए आवाज़ उठाने में परहेज़ करना और कन्हैया के बर्ताव का बदलना कई तरह के सवालों और चर्चाओं को जन्म दे रहा है. सिलसिलेवार जानिए कि यह पूरा क्या चक्कर है.

कन्हैया की फेसबुक पोस्ट का मतलब?
यूनाइटेड अगेन्स्ट हेट जैसी संस्था के सदस्य और सीएए के खिलाफ आंदोलनकारी रहे उमर खालिद को 14 सितंबर को दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था. 16 सितंबर को कन्हैया ने फेसबुक पर एक लंबा लेखनुमा पोस्ट लिखा. करीब 2000 शब्दों के इस पोस्ट में कन्हैया ने सिर्फ एक जगह पर उमर खालिद का नाम लिया, वह भी देवांगना और नताशा जैसे छात्रों की गिरफ्तारी के संदर्भ में.
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कन्हैया के एफबी पोस्ट का स्क्रीनशॉट




'दिल्ली दंगों की जांच पर सवाल उठना लाजिमी है क्योंकि इस जांच का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना नहीं बल्कि राजनीतिक बदला लेना है.' इस पोस्ट में कन्हैया ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति पर भी निशाना साधा, लेकिन अपने दोस्त 'कामरेड' उमर के पक्ष में बहुत ज़्यादा और सीधे तौर पर बात करने या खुलकर उमर खालिद का साथ देने से कन्हैया बचते ही दिखे.

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क्या दोनों के रास्ते अलग हो गए हैं?
ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा के स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के समय में जिस तरह की राजनीति जनता के बीच पहुंच रही है, उसमें उमर खालिद की राजनीति से दूरी बनाना ही कन्हैया को ठीक लग रहा है. बिहार के विधानसभा चुनाव कुछ ही हफ्तों बाद होने जा रहे हैं, ऐसे में कन्हैया ऐसे किसी मामले में खुद को डालने से बच रहे हैं, जिसके लिए उन्हें वोटरों के सामने सफाई देना पड़े.

तो क्या है कन्हैया की राजनीति?
मार्क्सवादी विचारधारा के खुले समर्थक कन्हैया को यह तो समझ में आ चुका है कि मोदी सरकार के ज़माने में उमर खालिद की दोस्ती से उन्हें राजनीतिक मुनाफा होने वाला नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि इसके बावजूद उनकी राजनीति की दिशा क्या है. क्या कांग्रेस और केजरीवाल की राजनीति के बरक्स कन्हैया से जो उम्मीदें थीं, वो उन पर खरे उतरने में फिलहाल नाकाम दिखते हैं?

इन सवालों के जवाब में द प्रिंट ने लेख में लिखा कि अफसोस की बात है लेकिन कन्हैया शायद सवर्ण राजनीति की तरफ झुकाव रखते हुए हाशिए के लोगों का पक्ष लेने वाली राजनीति से मुंह मोड़ते दिख रहे हैं. उमर के मामले में चुप्पी साधे रखना, कन्हैया की राजनीति का आरएसएस-बीजेपी के हाथों की कठपुतली होना साबित कर रहा है.

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कन्हैया कुमार की राजनीतिक विचारधारा पर सवाल खड़े किए गए हैं.


कन्हैया की चुप्पी पर बवाल क्यों?
उमर खालिद की गिरफ्तारी के बाद पुलिस और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराने के मकसद से बीते 16 सितंबर को एक कॉन्फ्रेंस रखी गई थी, जिसके आमंत्रण पत्र वक्ता के तौर पर कन्हैया के नाम और तस्वीर के साथ बांटे गए. लेकिन उस कार्यक्रम में आधे दर्जन वक्ताओं की मौजूदगी के बावजूद कन्हैया नहीं पहुंचे. ऐसा पहले भी हुआ था, जब सीएए के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को फरवरी में गिरफ्तार किया गया था, और दो महीनों तक कन्हैया ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधी थी. फिर लॉकडाउन को अपनी चुप्पी का कारण बताया था.

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दूसरी तरफ, आईआईएम बेंगलूरु के छात्रों और टीचरों के अलावा, स्वतंत्र विधायक और राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के जिग्नेश मेवाणी और स्वराज इंडिया पार्टी के संस्थापक योगेंद्र यादव जैसी कई शख्सियतों ने फौरन खुलकर लेख लिखे और खालिद की गिरफ्तारी का विरोध मुखर ढंग से दर्ज करवाया. ऐसे में पुराने दोस्त और फिलहाल बाकी विपक्ष में ज़्यादा चर्चित कन्हैया से खुला समर्थन उमर को न मिलना कई सवाल खड़े कर गया.

यह बात सिर्फ राजनीति या आने वाले समीकरणों को साधने के नज़रिये से नहीं देखी जा सकती. उमर के पक्ष में स्पष्ट रूप से कुछ न बोल पाना कन्हैया के सियासी चरित्र पर उंगली खड़ा कर रहा है. देश को एक वैकल्पिक पॉलिटिक्स देने का वादा करने वाले कन्हैया को जवाब देना पड़ेगा कि उनकी राजनीति किस दिशा में जा रही है! या वो यह कहकर ही बचना चाहते हैं कि उमर के मामले में उनसे ही अपेक्षाएं क्यों की जा रही हैं.
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