स्वतंत्रता दिवस विरोध : क्यों मणिपुर के विलय पर अब भी है विवाद?

स्वतंत्रता दिवस विरोध : क्यों मणिपुर के विलय पर अब भी है विवाद?
मणिपुर की एकता को तोड़े जाने के आरोप लगाकर 2016 में लोग सड़कों पर उतरे थे.

देश का 74वां स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) नज़दीक है और देश भर में इसके जश्न की तैयारियां अलग ढंग की हैं क्योंकि कोरोना वायरस (Corona Virus) महामारी का कहर जारी है. ऐसे में उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर में देश के जश्ने आज़ादी के ​बहिष्कार की कोशिश है. आरोप के तौर पर बड़ा सवाल है कि मणिपुर को भारत का हिस्सा क्यों माना जाए?

  • News18India
  • Last Updated: August 12, 2020, 10:13 PM IST
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आगामी 15 अगस्त को जब पूरा देश आज़ादी का जश्न (Independence Day Celebration) मना रहा होगा, तब मणिपुर (Manipur) में 16 घंटे की हड़ताल (Strike) के आह्वान के साथ भारत के स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार किए जाने की अपील होगी. क्यों? इस क्यों के जवाब के पीछे 70 सालों का इतिहास है, जो मणिपुर की बड़ी आबादी को भारत के खिलाफ खड़े होने पर मजबूर करता है. 1949 में मणिपुर का विलय भारत में (Manipur Merger in India) हुआ था, लेकिन बाद में यह विवादों में ऐसा घिरा कि आज तक रह रहकर सुर्खियों में आता रहता है.

पिछले साल अक्टूबर में मणिपुर के कई हिस्सों में इसी विलय के विरोध में बंद का आयोजन हुआ था. ​मणिपुर बेस्ड दो संगठनों कॉर्डिनेशन कमेटी और कांगलेपाक के समाजवादी गठबंधन के साथ ही त्रिपुरा बेस्ड नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने आरोप लगाए थे कि 1949 में दोनों राज्यों के विलय 'बलपूर्वक' किए गए थे. इसी वजह से मणिपुर इस विलय को नहीं स्वीकारता. स्वतंत्रता दिवस के पहले जानना चाहिए कि यह पूरा मामला क्या है.

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नक्शे पर मणिपुर




मर्जर से पहले मणिपुर का संविधान रहा
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद देश बना तो मणिपुर को भी ब्रिटिश राज से छुटकारा मिला. 11 अगस्त को मणिपुर के महाराज बोधचंद्र सिंह ने केंद्रीय सरकार के मामले तो भारत को हस्तांतरित किए लेकिन मणिपुर राज्य की संप्रभुता को बनाए रखा. इसका मतलब यह था 'मणिपुर राज्य संविधान एक्ट 1947' के तहत मणिपुर का अपना संविधान था, हालांकि भारत के अन्य इलाकों में किसी को तब यह बात पता नहीं थी.

दूसरी तरफ, भारत सरकार ने इस संविधान को कोई मान्यता नहीं दी और कुछ मणिपुरियों ने भारत के साथ एकीकरण को तवज्जो देते हुए मणिपुर इंडिया कांग्रेस पार्टी बना ली. इसके बाद महाराजा बोधचंद्र पर दबाव बनाकर 21 सितंबर 1949 को भारत के साथ राज्य का विलय कर दिया गया.

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विलय का क्या मतलब था?
भारत और मणिपुर के राजा के बीच हुए समझौते का मतलब यह हुआ कि मणिपुर राज्य भारतीय संघ के अंतर्गत आया और पार्ट सी राज्य की व्यवस्था के तहत यहां भारत के औपनिवेशिक प्रतिनिधि के तौर पर प्रशासन एक चीफ कमिश्नर की निगरानी में गया. भारत की केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त दीवान के हाथ में एक तरह से राज्य का शासन गया और राज्य की प्रतिनिधि सभा खत्म कर दी गई.

यहां से पनपे विरोध के सुर
'द स्टेट ऑफ नेशन' किताब में फाली एस. नरीमन ने लिखा चूंकि मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया और एक दीवानी राज्य बना दिया गया इसलिए यहां विरोधों का सिलसिला शुरू हुआ. हालांकि यह विरोध कुछ देर से शुरू हुआ क्योंकि 'एक भारत के विचार' को समझने में मणिपुर को समय लगा. इन विरोधों के मद्देनज़र मणिपुर को 1956 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया.

इम्फाल फ्री प्रेस के एडिटर रहे प्रदीप फांजोबाम के लेख के मुताबिक इससे भी बात नहीं बनी. स्थानीय नेताओं को प्रशासन में दखल देने के लिए 1963 में 30 सदस्यों वाली क्षेत्रीय परिषद की व्यवस्था की गई लेकिन इसके सिर पर चीफ कमिश्नर को ही बैठाए रखा गया. उसी साल असम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल रहा था तो मणिपुर में विरोध और तेज़ हुआ. आखिरकार मणिपुर को 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा मेघालय और त्रिपुरा के साथ ही मिल सका.

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मणिपुर की पौराणिक संस्कृति में ड्रैगन काफी महत्वपूर्ण रहा है.


विलय को लेकर विरोध कायम रहा
मणिपुर के भारत में विलय को लेकर राज्य में विरोध बना रहा. पूर्ण राज्य बनने के बाद भारत के राज्य के तौर पर सरकारें बनती रहीं लेकिन ​मणिपुर की संप्रभुता और स्वतंत्रता के समर्थकों के कई समूह बने जो समय समय पर इस विलय और व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे. इस विरोध को दबाया जाता रहा लेकिन यह खत्म नहीं हुआ और नतीजा यह है कि आज भी ऐसे संगठन मणिपुर में ज़मीन रखते हैं और अब भी मणिपुर को 'कांगलेपाक' नाम से पुकारते हैं.

कैसे दबाव में हुआ था विलय?
मणिपुर में अब भी भारत में विलय को लेकर बना हुआ गतिरोध सवाल उठाता है कि आखिर इतिहास ने ऐसा क्या ज़ख्म दिया है, जिसे मणिपुरी लोग भूल नहीं सके. फांजोबाम ने लिखा कि प्रिंसली स्टेट मणिपुर ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर दस्तखत किए थे, लेकिन 1949 में जो विलय हुआ, वह भारत ने पूरी तरह बलपूर्वक करवाया था.

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कहानी यूं थी कि महाराजा बोधचंद्र सितंबर 1949 में शिलॉंग गए थे. वहां उन्हें बलपूर्वक नज़रबंद कर लिया गया और मणिपुर लौटने नहीं दिया गया. 21 सितंबर को उन्हें डरा धमकाकर ज़बरदस्ती विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करवाए गए. यह विलय 15 अक्टूबर 1949 से लागू कर दिया गया.

क्या है मणिपुरियों का दावा?
मणिपुर में अब एक अतिवादी संगठन कहे जाने वाले UPRFM के दावों की मानें तो कांगलेपाक को ब्रिटिशों से आज़ादी 14 अगस्त 1947 को ही मिल गई थी. 1947 में मणिपुर के पास अपना संविधान था और संविधान एक्ट भी. जून और जुलाई 1948 में यहां पहली बार चुनाव हुए थे और अक्टूबर 1948 में पहली बार असेंबली सत्र. UPRFM के मुताबिक तब तक न तो भारत का संविधान बना था और न ही 1949 में विलय के लिए भारत ने मणिपुर की रज़ामंदी ली.

अब इस संगठन का दावा है कि कांगलेपाक के 2000 सालों के इतिहास और संस्कृति में भारत का स्वतंत्रता दिवस उनके लिए कोई मायने नहीं रखता. मणिपुर बेस्ड पोर्टल की ताज़ा खबर में इस संगठन के हवाले से लिखा गया कि मणिपुर की आज़ादी को रौंदने वाले भारत की आज़ादी का जश्न यहां कोई मायने नहीं रखता. इसलिए भारत के स्वतंत्रता दिवस पर UPRFM ने सामूहिक निषेध की अपील की है.
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