जानें पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों पर कोरोना वायरस का जोखिम क्यों रहा कम?

जानें पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों पर कोरोना वायरस का जोखिम क्यों रहा कम?
शोधकर्ताओं का मानना है कि पहाड़ी इलाकों में रहने वालों को कोरोना वायरस से संक्रमित होने का जोखिम निचले इलाकों में रहने वालों के मुकाबले काफी कम है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि समुद्रतल (Sea Level) से 3,000 मीटर या इससे ज्‍यादा ऊंचाई (High Altitude) पर रहने वाले लोगों को कोरोना वायरस (Coronavirus) का खतरा निचले इलाकों में रहने वालों से कम है. आइए जानते हैं कि ऐसा क्‍यों है?

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दुनिया का कोई भी हिस्‍सा कोरोना वायरस (Coronavirus) की मार से अछूता नहीं रह गया है. अब तक पूरी दुनिया में 65,97,348 लोग संक्रमित हो चुके हैं. इनमें 3,88,425 लोगों की गंभीर संक्रमण से मौत हो चुकी है. हालांकि, नए शोध में ये भी पता चला है कि कोरोना वायरस समुद्रतल (Sea Level) से 3,000 मीटर और इससे ज्‍यादा ऊंचाई पर अपनी संक्रमित करने की ताकत खो दे रहा है. शोधकर्ताओं ने तिब्‍बत (Tibet), बोलिविया (Bolivia) और इक्‍वाडोर (Ecuador) पर किए शोध में पाया कि समुद्रतल से ज्‍यादा ऊंचाई पर रहने वाले लोग निचले इलाकों (Lower Areas) में रहने वालों के मुकाबले कोरोना वायरस की चपेट में कम आए हैं. यानी ऊंचे इलाकों में संक्रमितों की संख्‍या काफी कम है.

दिन-रात के तापमान में अंतर और शुष्‍क हवा हैं बड़े कारण
शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्‍तराखंड (Uttarakhand) में अब तक 1,000 से कुछ ज्‍यादा मामले ही हुए हैं. इनमें भी ज्‍यादातर पॉजिटिव केस राज्‍य के निचले इलाकों में सामने आए हैं. वहीं, ऊंचे इलाकों में भी सामने आए मामलों में भी निचले इलाकों से लौटने वाले लोग ज्‍यादा हैं. स्‍थानीय मामलों में भी बाहर से लौटे कोरोना पॉजिटिव लोगों के संपर्क में आए लोग ही हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि पहाड़ी इलाकों में दिन और रात के तापमान (Temperature) में काफी अंतर रहता है. साथ ही हवा भी शुष्‍क (Dry Air) होती है. इससे किसी भी बीमारी के फैलने की आशंका कम रहती है. इसके अलावा सूर्य से आने वाली अल्‍ट्रावायलेट किरणों (UV rays) का स्‍तर भी निचले इलाकों के मुकाबले काफी ज्‍यादा रहता है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऊंचे इलाकों में तेज अल्‍ट्रावायलेट किरणों के कारण वायरस निष्क्रिय होकर संक्रमण नहीं फैला पा रहा है. ऐसे में यूवी रेडिएशन प्राकृतिक सैनेटाइजर का काम करता है.




अल्‍ट्रावायलेट किरणें करती हैं प्राकृतिक सैनेटाइजर का काम


माना जा रहा है कि संक्रमण के पहाड़ी इलाकों में नहीं फैलने का एक कारण अल्‍ट्रावायलेट किरणों की तेजी भी हो सकती है. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऊंचे इलाकों में तेज अल्‍ट्रावायलेट किरणों के कारण वायरस निष्क्रिय होकर संक्रमण नहीं फैला पा रहा है. ऐसे में यूवी रेडिएशन प्राकृतिक सैनेटाइजर (Natural Sanitiser) का काम करता है. साथ ही हवा का कम दबाव भी वायरस के प्रभाव को कम करने में मदद कर रहा है. टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन (China) के 80,000 से ज्‍यादा कोरोना पॉजिटिव मामलों में 100 से कुछ ज्‍यादा मामले तिब्‍बत (Tibet), चिंघाई (Qinghai) और सिचुआन (Sichuan) में पाए गए थे. इन इलाकों में कोरोना मरीजों की संख्‍या ग्‍लोबल ट्रेंड के एकदम उलट नजर आ रही है.

ऑक्‍सीजन की कमी के कारण ACE2 रिसेप्‍टर्स पर असर
बोलिविया भी हाई एल्‍टीट्यूट वाला क्षेत्र है. यहां भी कोरोना वायरस का असर काफी कम रहा है. बोलिविया में निचले इलाकों से एक तिहाई दर से संक्रमण फैला है. नेपाल की मीडिया ने भी कुछ समय पहले ऐसी ही जानकारियां दी थीं. नेपाल (Nepal) के भी ऊंचे इलाकों में संक्रमण फैलने की रफ्तार बहुत कम रही है. यहां ज्‍यादातर मामले उदयपुर और नेपालगंज जैसे निचले इलाकों में ही सामने आए हैं. नेपाल में तराई इलाकों में पूरे देश के 90 फीसदी पॉजिटिव मामले सामने आए हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि किसी भी आनुवांशिक कारक से ज्‍यादा भौगोलिक स्थिति के कारण पहाड़ों में कोविड-19 के मामले सामने आए हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये भी हो सकता है कि ऊंचे इलाकों में ऑक्सीजन की कमी शरीर में ACE2 रिसेप्टर्स पर असर डाल रही हो. बता दें कि कोरोनो वायरस इन रिसेप्‍टर्स के जरिये ही शरीर में घुसकर कोशिकाओं पर हमला करता है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऊंचे इलाकों में ऑक्सीजन की कमी शरीर में ACE2 रिसेप्टर्स पर असर डाल रही है. कोरोनो वायरस इन रिसेप्‍टर्स के जरिये ही शरीर में घुसकर कोशिकाओं पर हमला करता है.


एक्‍यूट रेस्पिरेटरी डिस्‍ट्रेस सिंड्रोम से बचे रहते हैं पहाड़ाें पर रहने वाले
शोधकर्ताओं और स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों के मुताबिक, ऊंची जगहों पर रहने वाले लोगों में ऑक्‍सीजन की कमी के कारण हाइपॉक्सिया या रक्‍त में ऑक्‍सीजन की कमी से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है. हाई एल्‍टीट्यूड पर रहने के कारण लोग एक्‍यूट रेस्पिरेटरी डिस्‍ट्रेस सिंड्रोम से बचे रहते हैं. हालांकि, विशेषज्ञ अभी ये भी पता करने की कोशिशों में जुटे हैं कि इन सभी कारणों के अलावा पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के कोरोना वायरस से कम प्रभावित होने की और क्‍या वजह हो सकती हैं. पेरू में क्‍युस्‍को (Cusco) भी हाई एल्‍टीट्यूड पर बसा एक शहर है. इसकी आबादी 4.2 लाख है. इस शहर में अब तक मेक्सिको, चीन और ब्रिटेन से आए एक-एक पर्यटक की मौत कोरोना वायरस के कारण हुई है. इसके बाद वहां संक्रमण से एक भी व्‍यक्ति की मौत नहीं हुई है. वहीं, शेष पेरू में 4,000 लोगों की मौत हो चुकी है.

हाई एल्‍टीट्यूट एरिया में मृत्‍युदर भी रही है काफी कम
लैटिन अमेरिकी देशों में कोरोना वायरस का सबसे बुरा असर इक्‍वाडोर पर पड़ा. इक्‍वाडोर में अब तक 38,000 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इनमें 3,300 लोगों की गंभीर संक्रमण के कारण मौत हो चुकी है. हालांकि, इनमें से ज्‍यादा मामले समुद्र तटीय गुयाक्विल में सामने आए हैं. बोलिविया के 8,387 पॉजिटिव केस सैंटा क्रूज में पाए गए हैं. ये इलाका समुद्रतल से कुछ सौ फीट की ऊंचाई पर बसा है. वहीं, दुनिया की सबसे ऊंची राजधानी लापाज में महज 410 कोरोना पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं. शोधकर्ताओं ने अध्‍ययन में पाया कि पहले तो हाई एल्‍टीट्यूड पर बसे इलाकों में संक्रमण फैलने की रफ्तार बहुत कम है. वहीं, मृत्‍यु दर भी निचले इलाकों से बहुत ही कम है.

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