राफेल फाइटर जेट तो मिले लेकिन तकनीक नहीं मिलने से भारत को क्या करना होगा

राफेल फाइटर जेट तो मिले लेकिन तकनीक नहीं मिलने से भारत को क्या करना होगा
राफेल विमान के लिए फाइल फोटो.

रक्षा क्षेत्र (Defense) में भारत के आत्मनिर्भर होने का सुनहरा मौका था, अगर भारत सरकार फ्रांस के साथ राफेल विमान सौदे (Rafale Deal) में तकनीक ट्रांसफर की शर्त रख पाती. इससे न केवल भारत को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान (Financial Loss) हुआ बल्कि तकनीक ट्रांसफर न होने से भारत को कई मोर्चों पर खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

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फ्रांस की कंपनी दासॉल्ट (Dassault) निर्मित लड़ाकू जेट विमान राफेल का पहला बैच भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) के अंबाला एयरबेस पर आज बुधवार को लैंड (Rafale Landing) हो चुके हैं. लेकिन ये भी जानना जरूरी है कि इन फाइटर जेट की तकनीक फ्रांस ने भारत को नहीं दी है. क्योंकि इस डील में तकनीक ट्रांसफर (Technology Transfer) का क्लॉज़ नहीं था, जिससे भारत को हमेशा इन विमानों की मरम्मत को गड़बड़ियों के लिए जेट की निर्माता कंपनी दसों एविएशन पर निर्भर रहना होगा.

जब यूपीए सरकार में 2011 में राफेल को फ्रांस के साथ डील पर बात चल रही थी, तब उसमें तकनीक ट्रांसफर का क्लॉज़ शामिल था. तकनीक के ट्रांसफर का मतलब क्या होता है? इसके साथ ही ये भी जानिए कि इस क्लॉज़ के नहीं होने से किस तरह दिक्कतें हो सकती है.

तकनीक ट्रांसफर क्या है और क्यों ज़रूरी?
फाइटर जेट की दुनिया में तकनीक बहुत महत्व रखती है. एविएशन के जानकारों के मुताबिक तकनीक ट्रांसफर के ज़रिये निर्माता कंपनी या देश खरीदार देश को मूल तकनीक मुहैया करवाता है, जिससे खरीदार देश अपने स्तर पर खुद इस तरह के जेट भविष्य में बना सकता है. साथ ही खरीदे गए जेट्स के सिस्टम में ज़रूरत के हिसाब से बदलाव कर सकता है.
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तकनीक ट्रांसफर इसलिए ज़रूरी होता है क्योंकि फाइटर जेट में कौन सा देश किस तरह के सिस्टम या अपग्रेडेशन का इस्तेमाल करता है, यह उसका निजी मामला होता है. तकनीक हाथ में आने से देश अपने हिसाब से विमानों के फीचर्स में बदलाव कर सकता है . यह गोपनीय रह सकता है. लेकिन तकनीक न मिलने से उस देश से ही ये बदलाव या अपग्रेडेन करवाने होते हैं, जहां से विमान खरीदे जाते हैं.

राफेल सौदे में क्या है तकनीक का मुद्दा?
भारत ने फ्रांस की दासॉल्ट से 36 राफेल विमानों का सौदा किया है, जिसमें तकनीक ट्रांसफर शामिल नहीं है. ऐसे में भारत को जो विशेष या अतिरिक्त या मोडिफाइड फीचर विमानों में चाहिए थे, उसे दासॉल्ट से ही करवाने पड़े. ऐसे 13 मोडिफिकेशन्स के लिए भारत ने जहां अतिरिक्त कीमत भी अदा की. वहीं उसे विमानों को अपने मुताबिक बनवाने के लिए फ्रांस के साथ गोपनीय रक्षा जानकारियां साझा करना पड़ी.

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इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी तकनीक ट्रांसफर का न होना संवेदनशील मुद्दा हो जाता है. अब इस मुद्दे से जुड़कर राफेल विमानों की कीमत कैसे प्रभावित हुई, ये भी देखिए.

क्यों नहीं मिली भारत को तकनीक?
मोदी सरकार ने 2016 में जो राफेल डील की, वह पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के प्रस्तावित सौदे से बहुत अलग थी. इसमें केवल 36 राफेल विमानों का सौदा किया गया जबकि यूपीए 126 विमानों के लिए सौदा करने की योजना बना रही थी. 126 विमानों के सौदे पर फ्रांस इन विमानों की तकनीक साझा कर सकता था. तकनीक ट्रांसफर के लिए बड़ी डील की जाती है यानी विमानों के हिसाब से 100 या दो सौ विमानों की खरीद पर यह संभव होता है.

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न्यूज़18 ग्राफिक्स


क्या होता अगर भारत तकनीक हासिल करके इसको खुद बनाता
राफेल सौदे के बारे में जांच पड़ताल और खोजबीन पर आधारित द हिंदू के एन. राम की रिपोर्ट जनवरी 2019 में प्रकाशित हुई थी, जो बेहद चर्चित रही थी. इस रिपोर्ट में यूपीए सरकार में प्रस्तावित और एनडीए सरकार के समय में राफेल डील के तुलनात्मक अध्ययन में बताया गया था कि कैसे यूपीए की डील बहुत बेहतर और सस्ती होती और क्यों एनडीए की डील पर कई सवालों की गुंजाइश पैदा हुई.

एन. राम के विश्लेषण को संक्षेप में समझें तो 2007 में यूपीए 1 सरकार के समय में 126 राफेल विमानों के लिए 9 करोड़ यूरो की डील प्रस्तावित थी. 2011 में यह कीमत करीब 10 करोड़ यूरो की हो गई थी. इन 126 विमानों में 18 फ्लाइअवे विमान होते जबकि 108 फाइटर जेट भारत में एचएएल बनाती जो कि फ्रांस से तकनीक ट्रांसफर के बाद लाइसेंस के तहत बनते यानी मेड इन इंडिया.


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HAL बना चुकी है सुखोई विमान
रक्षा क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने दावा किया था कि तकनीक के ट्रांसफर का क्लॉज़ न होना HAL को बड़ा झटका था. जब HAL 25 टन के सुखाई विमान बना चुकी थी, तो राफेल के निर्माण में कहीं कोई दिक्कत का सवाल ही नहीं था.
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