अटल सरकार में वित्त, विदेश, रक्षा मंत्री रहे जसवंत सिंह क्यों आएंगे याद?

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह का 82 वर्ष की आयु में निधन हुआ.
पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह का 82 वर्ष की आयु में निधन हुआ.

पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के 82 साल की उम्र में​ निधन (Jaswant Singh Dies) पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने कहा कि उन्हें अलग तरह की राजनीति के लिए याद किया जाता रहेगा. जानिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कितने महत्वपूर्ण नेता थे सिंह.

  • News18India
  • Last Updated: September 27, 2020, 10:23 AM IST
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भारतीय आर्मी (Indian Army) से रिटायर हुए अफसर और बाद में एनडीए सरकार (NDA Government) में कैबिनेट मंत्री रहे जसवंत सिंह का पूरा नाम जसवंत सिंह जासोल (Jaswant Singh Jasol) था. भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक जसवंत सिंह देश के उन नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने सबसे लंबा समय संसद (Parliament) में गुज़ारा है. 1980 से लेकर 2014 तक या तो लोकसभा (Lok Sabha) या राज्यसभा (Rajya Sabha) में सांसद रहने वाले जसवंत सिंह को कई प्रसंगों और कई नीतियों के संदर्भ में याद किया जाता रहेगा.

न्यूक्लियर पॉलिसी में अहम रोल
1998 में जब परमाणु परीक्षण में भारत ने सफलता हासिल की थी, तब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के अहम मंत्री जसवंत सिंह ने ही अमेरिका के साथ काफी अरसे से विचाराधीन चल रही न्यूक्लियर पॉलिसी और रणनीति को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी. नतीजा यह रहा था कि यह नीति दोनों ही देशों के लिए काफी सकारात्मक मानी गई थी.

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जसवंत सिंह ने मोहम्मद अली जिन्ना पर एक किताब लिखी थी.




कंधार के प्लेन हाईजैक कांड में अहम रोल
24 दिसंबर 1999 को इंडियन एयरलाइंस की एक उड़ान IC-814 को हाईजैक कर लिया गया था. आंतकियों ने विमान यात्रियों को छोड़ने के एवज़ मुश्ताक अहमद जरगर, अहमद उमर सईद शेख और मौलाना मसूद अज़हर जैसे आतंकियों को छोड़ने की मांग रखी थी. यात्रियों को सुरक्षित वापस लाने की ज़िम्मेदारी लेकर इन आतंकियों को लेकर जसवंत सिंह ही कंधार गए थे. यही नहीं, 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भी सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.

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संसद का सफर
भाजपा के टिकट पर जसवंत पांच बार राज्यसभा के लिए चुने गए. महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने के साथ ही सिंह प्लानिंग कमीशन के उप प्रमुख भी रहे थे. 2004 में जब भाजपा आम चुनावों में हार गई थी, तब राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष की ज़िम्मेदारी सिंह के खाते में ही आई थी और वह 2009 तक इसे निभाते रहे थे.

पार्टी से नाराज़गी का दौर
साल 2009 में जब भाजपा लगातार दूसरी बार आम चुनाव हारी थी, तब सिंह ने अपने पार्टी साथियों से नाराज़गी ज़ाहिर की थी. सिंह ने पार्टी के भीतर गंभीर विमर्श की ज़रूरत बताने वाली चिट्ठी लिख दी थी. इसका दूरगामी अंजाम यह हुआ कि जसवंत सिंह पार्टी में दरकिनार कर दिए गए. 2014 में तो स्थिति यह हुई कि सिंह को किसी भी सीट से चुनाव लड़ाने पर पार्टी राज़ी नहीं थी.



पार्टी की इस बेरुखी के चलते राजस्थान के बाड़मेर से सिंह ने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा. इसका मतलब यह था कि उन्हें भाजपा के उम्मीदवार से ही मुकाबला करना था. यह विवाद बढ़ा तो सिंह ने भाजपा का दामन छोड़ दिया था. और तो और, सिंह 2014 में वो चुनाव भी नहीं जीत सके.

जिन्ना विवाद संग रहा
2012 में भाजपा ने उन्हें उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था लेकिन यूपीए के हामिद अंसारी वह चुनाव जीत गए थे. अपनी किताब में जिन्ना की तारीफ को लेकर भी जसवंत चर्चा में रहे और पार्टी की नाराज़गी के शिकार भी. भाजपा ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था लेकिन 2010 में उनकी वापसी हो गई थी. 2014 में बाथरूम में फिसलने की दुर्घटना के कारण वह कोमा में चले गए थे. और तबसे कोमा में ही थे.

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'पीएमओ में जासूस' विवाद में उलझे सिंह
जसवंत सिंह की किताब जारी हुई तो वह तुरंत एक और विवाद में फंस गए थे. सिंह ने यह आरोपनुमा संकेत किया था कि जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, तब प्रधानमंत्री कार्यालय में एक गुप्तचर था, जिसने अमेरिकी सूत्रों को गुप्त सूचनाएं पहुंचाई थीं. जैस ही, इस मामले में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जसवंत सिंह से इस गुप्तचर के बारे में जानकारी मांगी थी, तब सिंह ने पीएम को पत्र लिखा था.

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यूपीए समर्थित हामिद अंसारी के खिलाफ उप राष्ट्रपति का चुनाव हारे थे जसवंत सिंह.


उस पत्र के बारे में मनमोहन सिंह ने कहा था कि उसमें किसी के हस्ताक्षर नहीं थे और न ही गुप्तचर के नाम तक का ज़िक्र था. बाद में जसवंत सिंह ने इस विवाद से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि उनका यह संकेत कुछ भ्रामक सूचनाओं पर आधारित था.

और ऐसी है जसवंत सिंह की विरासत
3 जनवरी 1938 को बाड़मेर ज़िले के जासोल गांव में ठाकुर सरदार सिंह राठौर और कुंवर बाईसा के घर जन्मे जसवंत सिंह की की शादी शीतल कंवर से हुई थी. उनके दो बेटे हैं, जिनमें से मानवेंद्र सिंह बाड़मेर से सांसद रह चुके हैं. जसवंत सिंह की तीसरी पीढ़ी के रूप में हर्षिनी कुमारी राठौर और हमीर सिंह राठौर हैं. 1960 के दशक में आर्मी अफसर रहे सिंह ने खड़कवासला स्थित एनडीए और मेयो कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी.
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