• Home
  • »
  • News
  • »
  • knowledge
  • »
  • किसका मुंह ताकें! क्यों कुछ देश वैक्सीन के लिए होना चाहते हैं 'आत्मनिर्भर'?

किसका मुंह ताकें! क्यों कुछ देश वैक्सीन के लिए होना चाहते हैं 'आत्मनिर्भर'?

इसी बीच अमेरिका से कोरोना वैक्सीन पर बड़ी खुशखबरी आई है. अमेरिका कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के अंतिम चरण में है. 
संयुक्त राज्य अमेरिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2020 तक ट्रायल के बाद कोविड-19 वैक्सीन के 4 उम्मीदवार हो सकते हैं. अमेरिका के स्वास्थ्य और मानव सेवा उप प्रमुख पॉल मैंगो ने कहा, 'यह पूरी तरह से ट्रैक पर है और अगर सब कुछ सही रहा तो इस साल के अंत तक वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है.

इसी बीच अमेरिका से कोरोना वैक्सीन पर बड़ी खुशखबरी आई है. अमेरिका कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के अंतिम चरण में है. संयुक्त राज्य अमेरिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2020 तक ट्रायल के बाद कोविड-19 वैक्सीन के 4 उम्मीदवार हो सकते हैं. अमेरिका के स्वास्थ्य और मानव सेवा उप प्रमुख पॉल मैंगो ने कहा, 'यह पूरी तरह से ट्रैक पर है और अगर सब कुछ सही रहा तो इस साल के अंत तक वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है.

समय संकट का हो, तो बड़ी तकलीफ होती है कि मदद के लिए इंतज़ार करना पड़ जाए, उस पर ये भी न पता हो कि कितना! कोरोना वायरस (Corona Virus) से जूझ रही दुनिया के जो देश संपन्न और शक्तिशाली नहीं हैं, वो अतीत से सीखकर अंदेशों के चलते अपनी 'तकनीकी संप्रभुता' के लिए जितना संभव है, उतने हाथ पैर तो मार ही रहे हैं.

  • Share this:
    ब्रिटेन (Britain), अमेरिका (US), चीन (China) और रूस जो वैक्सीन बना रहे हैं, उनके बारे में तो आप काफी सुन और पढ़ रहे हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि Covid-19 के खिलाफ कितने देश वैक्सीन तैयार कर रहे हैं. भारत (Corona Vaccine in India), तुर्की, मिस्र और कज़ाकस्तान जैसे कम आय वाले कम से कम 50 देश अपने स्तर पर वैक्सीन विकास (Vaccine Development) में जुटे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मानें तो करीब 170 वैक्सीन दुनिया भर में विकसित हो रही हैं, जबकि यूके बेस्ड फर्म एयरफिनिटी के मुताबिक 280.

    अब सवाल ये खड़ा होता है कि जब अमेरिका, यूरोप और एशिया के सुपरपावर देश वैक्सीन के विकास के लिए एडवांस चरणों में हैं, तब ये कमतर देश अपने स्तर पर क्यों प्रयोग कर रहे हैं? जी हां, आप ठीक समझ रहे हैं... क्योंकि ये देश डरे हुए हैं कि महाशक्तियों द्वारा बनाए जा रहे टीके इन तक या तो पहुंचेंगे नहीं, या पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी. वैक्सीन को लेकर दुनिया के ये कम आय वाले देश किस तरह 'आत्मनिर्भर' बन रहे हैं?

    हम अपने घरों में कैद नहीं रहना चाहते. इस महामारी के दौर में मदद करने के लिए अपने ज्ञान को हम भी इस्तेमाल करना चाहते हैं. हम अगर ताकतवर देशों के भरोसे ही रहे, तो हमें पता नहीं कब तक सप्लाई के लिए इंतज़ार करना होगा!
    जूलियाना कैसैटरो, अर्जेंटीना में वैक्सीन रिसर्चर


    कैसे आत्मनिर्भर बन रहे हैं छोटे देश?
    सुपरपावरों के भरोसे न रहने की इस मजबूरी और निश्चय के चलते कम आय वाले या विकासशील और अविकसित देश अपने लिए अपना इंतज़ाम खुद करने की कोशिश में हैं. उदाहरण के लिए अर्जेंटीना में कैसैटरो ने अपनी 10 महिला और 2 पुरुष रिसर्चरों की टीम के साथ वैक्सीन प्रयोग शुरू किए. इसके लिए अर्जेंटीना सरकार ने 1 लाख डॉलर की रकम शुरूआती स्टडीज़ के लिए मुहैया कराई. अब कहा जा रहा है कि अगले छह महीनों में उनकी वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल शुरू हो जाएंगे.

    ये भी पढ़ें :- महामारी-नस्लीय हिंसा: अमेरिका में 100 साल बाद कैसे दोहराया गया इतिहास?

    corona virus updates, covid 19 updates, corona vaccine update, corona vaccine, corona vaccine in india, कोरोना वायरस अपडेट, कोविड 19 अपडेट, कोरोना वैक्सीन अपडेट, कोरोना कब तक आएगी, वैक्सीन क्या है
    थाईलैंड से लेकर नाइजीरिया तक कई देश अपने स्तर पर वैक्सीन बनाने में जुटे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


    बात सिर्फ अर्जेंटीना की ही नहीं है, थाईलैंड से लेकर नाइजीरिया तक कई देशों की कंपनियां, रिसर्चर और दर्जनों प्रयोगशालाएं अपनी वैक्सीन खुद बना लेने की कोशिश में जुट चुकी हैं.

    कैसे पैदा हो गया डर?
    अमेरिका और अन्य कई अमीर देशों ने दावे कर डाले कि कोविड के खिलाफ वैक्सीन के अरबों डोज़ तैयार होने के करीब हैं. इससे दुनिया की करीब 8 अरब की आबादी में सुपरपावरों से पीछे के लोगों को यह चिंता हुई कि उन तक ये डोज़ कैसे और कब तक पहुंच सकेंगे? WHO, महामारी के खिलाफ तैयारी की नॉर्वे बेस्ड संस्था और वैक्सीन अलायंस गावी जैसे कई संस्थानों ने यह तय करने की कोशिश की है कि वैक्सीन बने तो सिर्फ अमीर देशों के कब्ज़े में न रह जाए.

    हालांकि इस तरह की कोशिशें की गई हैं कि संवेदनशील और कोरोना वायरस संक्रमण के ज़्यादा जोखिम में आने वाली गरीब आबादी तक वैक्सीन पहुंच सके, लेकिन 2009 में स्वाइन फ्लू के समय की यादें गवाह हैं कि किस तरह वैक्सीन अमीर देशों की सरहदों तक ही सिमटकर रह गई थी. इसी तरह, 2006 में रोटा वायरस के खिलाफ वैक्सीन अफ्रीकी देशों के लिए एक याद नहीं बल्कि सबक है.


    नाइजीरियाई रिसर्चर ओलाडिपो कोलावोल की मानें तो उस समय अफ्रीका पहुंचाई गई वैक्सीन उतनी असरदार नहीं थी, जितनी अमीर देशों में रही थी. वैक्सीन दिए जाने के बाद भी पॉज़िटिव रिपोर्ट्स आने के मामले देखे गए थे.

    एक नज़र ताज़ा हालात पर
    अर्जेंटीना में कोरोना संक्रमण के कुल मामले साढ़े तीन लाख से ज़्यादा हो चुके हैं. इसी तरह, भारत में करीब 34 लाख, ब्राज़ील में करीब 38 लाख केस सामने आ चुके हैं. दूसरी तरफ 6 लाख से ज़्यादा संक्रमण केसों वाला दक्षिण अफ्रीका वैक्सीन के लिए ग्राउंड ट्रायलों का मैदान बन चुका है. गावी के सीईओ सेथ बर्कले भी यही कह​ रहे हैं कि पूरा माहौल एक डर तो पैदा कर ही रहा है.

    corona virus updates, covid 19 updates, corona vaccine update, corona vaccine, corona vaccine in india, कोरोना वायरस अपडेट, कोविड 19 अपडेट, कोरोना वैक्सीन अपडेट, कोरोना कब तक आएगी, वैक्सीन क्या है
    करीब आधा दर्जन वैक्सीनों के लिए ट्रायल अंतिम दौर में हैं. (File Photo)


    पूरे अफ्रीका की बात करें तो 11 लाख से ज़्यादा केस सामने आ चुके हैं. नाइजीरियाई रिसर्चर कह रहे हैं कि उनकी वैक्सीन के पशुओं पर ट्रायल शुरू होने वाले हैं. ये भी कह रहे हैं कि इस वैक्सीन का लाभ सिर्फ नाइजीरिया नहीं, पूरे अफ्रीका और दुनिया को मिलेगा.

    कैसे पहुंचेगी विकासशील देशों तक वैक्सीन?
    एक और सवाल यह इसलिए है क्योंकि विकासशील देश अपनी वैक्सीन के लिए खुद कोशिश भी करेंगे तो कामयाब कब तक हो सकेंगे? मसलन थाईलैंड के रिसर्चर कह रहे हैं कि दिसंबर तक उन्हें ह्यूमन ट्रायल मजबूरन टालना पड़ा है यानी सफल हुई तो उनकी वैक्सीन 2021 के आधे गुज़र जाने के बाद ही आ सकेगी. ऐसे देश अब सुपरपावरों के साथ गठजोड़ भी करना चाह रहे हैं.

    ये भी पढ़ें :-

    '70 साल-70 इवेंट', जानिए कैसे मनेगा पीएम मोदी 70वां जन्मदिन

    सोनिया गांधी बनाम राहुल गांधी लीडरशिप : क्या हैं सवाल और आगे के रास्ते?

    अर्जेंटीना और मेक्सिको को उस वक्त कुछ राहत महसूस हुई जब अरबपति कार्लोस स्लिम की फाउंडेशन ने ब्रिटेन की एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के 25 करोड़ शुरूआती डोज़ सुरक्षित कर लिये. वहीं, चीन ने लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों को वैक्सीन डोज़ खरीदने के लिए 1 अरब डॉलर का कर्ज़ देने का प्रस्ताव रखा.

    दूसरी तरफ, विशेषज्ञों के मुताबिक कम आय वाले देशों के सामने यह संकट भी है कि वहां की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक ढांचा इतना बेहतर नहीं है कि वैक्सीन का उत्पादन जल्दी, बड़ी मात्रा में और बढ़िया क्वालिटी के साथ हो सके. इस पूरे विषय पर एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट का आशय साफ है कि वैक्सीन विकास और उत्पादन आसान और सस्ता कारोबार नहीं है.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज