कई मामलों में पहली महिला रहीं मुथुलक्ष्मी क्यों याद आती हैं?

कई मामलों में पहली महिला रहीं मुथुलक्ष्मी क्यों याद आती हैं?
मुथुलक्ष्मी रेड्डी स्केच. (News18 File Photo)

देवदासी की बेटी होकर इस कुप्रथा को खत्म करने वाली मुथुलक्ष्मी का जीवन मिसाल है. जबकि भारत सरकार (Government of India) लड़कियों के लिए शादी की उम्र पर विचार कर रही है, उस महिला को याद​ किया जाना चाहिए, जिसने शादी के लिए लड़कियों की उम्र (Girls' Minimum Age for Marriage) पहली बार कानूनन बढ़वाई थी और भारतीय महिलाओं के लिए क्या क्या नहीं किया!

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  • Last Updated: August 20, 2020, 7:11 PM IST
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जो बचपन से ही कई मामलों में पहली महिला (First Woman) रहीं, जिन्होंने समाज की कई पाबंदियों को तोड़ा, लैंगिक समानता (Gender Equality) को स्थापित करने का बीड़ा उठाया और भारतीय महिलाओं (Indian Women) के लिए एक बेहतर समाज बनाया. चिकित्सा (Medicine), शिक्षा, कानून (Law) और कई क्षेत्रों में महान भारतीय डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी. कम ही लोग जानते हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति के सुधार (Women Welfare) की दिशा में ठोस कदमों की शुरूआत इस नाम से होती है.

वास्तव में मुथुलक्ष्मी 19वीं सदी के एक ऐसे अपाहिज समाज से ताल्लुक रखती थीं, जहां लड़कियों का जन्म सिर्फ शादी के लिए होता था. ऐसे समाज में कदम कदम पर उन्होंने एक के बाद एक चुनौतियों का सामना किया, बल्कि पूरे समाज से सीधे भिड़कर भारतीय महिलाओं का जीवन सुधारने के लिए कई ठोस कोशिशें कीं. मुथुलक्ष्मी को 'अनेक प्रकार की पहल' करने वाली फेमिनिस्ट (Feminist of India) के तौर पर याद करना चाहिए.

19वीं सदी जहां खत्म हो रही थी, वहां से अपने सामाजिक जीवन की यात्रा शुरू करने वाली समाज सुधारक मुथुलक्ष्मी ने बाल विवाह (Child Marriage), मंदिरों में देवदासी, वेश्यालय और महिलाओं व बच्चों की ट्रैफिकिंग जैसी कुप्रथाओं और मुद्दों पर समाज से खुलकर लोहा लेते हुए अहम कानून बनवाए थे. मुथुलक्ष्मी के जीवन को याद करने के लिए किसी वजह की ज़रूरत क्यों होनी चाहिए.



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मुथुलक्ष्मी रेड्डी विशेष.

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एक लड़की का संघर्ष
बचपन में पढ़ने लिखने में रुचि रखने वाली मुथुलक्ष्मी का स्कूल में दाखिला मुश्किल था क्योंकि तमिलनाडु के जिस पुडुकोट्टई कस्बे में उनका जन्म हुआ था, वहां स्कूल जाने का अधिकार सिर्फ पुरुषों के पास ही था. लड़की होने के कारण उन्हें स्कूल जाने का नसीब नहीं मिला. लेकिन, पिता नारायण स्वामी अय्यर चूंकि महाराजा कॉलेज में प्राध्यापक थे इसलिए मैट्रिक तक की पढ़ाई मुथुलक्ष्मी ने घर पर ही की.

मैट्रिक की परीक्षा में जब मुथुलक्ष्मी टॉपर रहीं तो पूरे कस्बे में सनसनी के तौर पर यह खबर फैल गई. उन्होंने जब महाराजा कॉलेज में दाखिले के लिए आवेदन भेजा, तो प्रिंसिपल और प्रोफेसर सभी हैरान थे क्योंकि इस कॉलेज के इतिहास में कभी कोई लड़की दाखिल नहीं हुई थी. दूसरी तरफ, हिंदू समाज के ठेकेदारों ने भी मुथुलक्ष्मी के कॉलेज जाने पर हंगामा किया.

पुडुकोट्टई गैजेट में दर्ज है कि मुथुलक्ष्मी की प्रतिभा को देखकर पुडुकोट्टई के राजा मार्तंड भैरव थोंडामन ने उन्हें तमाम हंगामे को दरकिनार कर न केवल मुथुलक्ष्मी को एडमिशन लेने की इजाज़त दी बल्कि उनके लिए वजीफ़े की व्यवस्था भी करवाई. फिर 1912 में एक और इतिहास मुथुलक्ष्मी ने रचा, जब वो मद्रास यूनिवर्सिटी से मेडिकल ग्रैजुएट होने वाली पहली महिला बनीं.


एक औरत का संघर्ष
मेडिकल की पढ़ाई के दौरान सर्जरी में टॉप करने वाली और गोल्ड मेडल जीतने वाली मुथुलक्ष्मी कॉलेज के समय में ही सरोजिनी नायडू के संपर्क में आईं. उनके प्रभाव से उन्होंने महिलाओं संबंधी बैठकों में हिस्सा लेना शुरू किया. फिर महात्मा गांधी और एनी बेसेंट से प्रभावित होने के बाद उनके मशवरे से ही मुथुलक्ष्मी महिलाओं के विकास की दिशा में एक एक्टिविस्ट और नीति निर्माता के तौर पर आगे बढ़ीं.

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अभूतपूर्व योगदान के लिए 1958 में मुथुलक्ष्मी को पद्म​भूषण से नवाज़ा गया था.


एक तरफ, वो सार्वजनिक जीवन में औरतों की बेहतरी के लिए संघर्ष कर रही थीं, तो दूसरी तरफ निजी जीवन में भी. मुथुलक्ष्मी ने बालिका वधू बनने से बचपन में ही इनकार कर दिया था. 1914 में जब उन्होंने डॉ. टी सुंदर रेड्डी से शादी करने का फैसला किया भी तो इस शर्त पर कि उनके पति उनके मेडिकल और जीवन और सामाजिक सेवाओं के काम में कोई दखलंदाज़ी नहीं करेंगे. गौरतलब है कि उस समय के हिसाब से अपने लिए 28 साल की उम्र शादी के लिए तय कर पाना मुथुलक्ष्मी के लिए आसान नहीं था.

एक संघर्ष उन्हें अपने समाज सेवा जीवन के लिए भी करना पड़ा, जब इंग्लैंड में महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य प्रशिक्षण के लिए उन्हें चुना गया तो उनके माता और पिता ने उन्हें इंग्लैंड जाने की इजाज़त नहीं दी. लेकिन मुथुलक्ष्मी जो ठान लेती थीं, तो वो पूरा करके ही रहती थीं. उन्होंने कोशिशें कीं और तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री पानागल राजा ने उन्हें एक साल के लिए सरकारी वित्तीय सहायता दिलवाई.


एक महिला कानून निर्माता का संघर्ष
एनी बेसेंट के निर्देशन में महिला कल्याण आंदोलनों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के बाद 1926 में महिला भारतीय संघ द्वारा नामांकित किए जाने के बाद वो 1930 तक मद्रास विधान परिषद में रहीं. 'महिलाओं में एक घर के निर्माण की क्षमता होती है, तो इस क्षमता को उन्हें राष्ट्र निर्माण में लगाना चाहिए.' यह विश्वास करने वाली मुथुलक्ष्मी ने बाल विवाह रोकथाम के लिए कानून बनवाया, देवदासी प्रथा और वेश्यालयों को खत्म करने और महिलाओं व बच्चों की तस्करी रोकने के कानून बनवाने में अहम रोल अदा किया.

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लेकिन ये सब उनके लिए आसान नहीं था. एक तो ये प्रथाएं समाज में गहरे पैठी हुई थीं और इन्हें एक महिला खत्म करवा रही थी इसलिए उस समय के धार्मिक, सामाजिक और पुरुष प्रधान समाज ने खुलकर हमला बोला. प्रैस और यूनिवर्सिटी के छात्रों के ज़रिये मुथुलक्ष्मी को घेरने की पुरज़ोर कोशिश की गई. लेकिन, मुथुलक्ष्मी अडिग रहीं.

लड़कियों के लिए शादी की उम्र बढ़ाकर 16 साल और लड़कों के लिए 21 साल किए जाने वाले बाल विवाह रोकथाम कानून के समय उन्होंने कहा था :

सती प्रथा की वजह से कुछ ही देर की तकलीफ एक स्त्री को होती है, लेकिन एक लड़की को बचपन में ही विवाह की प्रथा में धकेल देने से वो जीवन भर पीड़ी भोगती रहती है, एक बाल पत्नी, बाल मां और बाल विधवा के तौर पर वह आखिरी सांस तक घुटती रहती है.
मुथुलक्ष्मी की किताब 'माय एक्सपीरिएंस एज़ लेजिस्लेटर' से


ऐसे अमर हो जाती हैं मुथुलक्ष्मी...
मुथुलक्ष्मी का जीवन इंदिरा गांधी के शब्दों में इतना कीमती रहा कि 'अगर वो न होतीं तो भारत में महिलाएं जिस स्थिति में हैं, न होतीं.' मुथुलक्ष्मी की और उप​लब्धियों व योगदानों को इन बिंदुओं में देखें :

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डूडल के ज़रिये मुथुलक्ष्मी को गूगल ने ऐसे याद किया था.


* उनकी सेवाओं को तवज्जो देते हुए तत्कालीन नेताओं ने 1947 में लाल किले से फहराए गए पहले राष्ट्रीय ध्वज पर मुथुलक्ष्मी का नाम शामिल किया.
* भारत में महिलाओं को वोटिंग का अधिकार और शासन व प्रशासन में पद लेने के अधिकार के लिए जो आंदोलन चले, उनमें मुथुलक्ष्मी प्रमुख रहीं.
* बच्चों के लिए अव्वई घर और अडयार कैंसर इंस्टिट्यूट मुथुलक्ष्मी की भारत को यादगार देन रहे हैं.
* हरिजन और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे हों, या बस्तियों में साफ सफाई के या स्वास्थ्य के... हर क्षेत्र में महिला एवं बाल विकास के लिए काम करती रहीं मुथुलक्ष्मी लेखक और एडिटर भी रहीं.

कैंसर के क्षेत्र में योगदान देने वाली महिलाओं को मुथुलक्ष्मी के नाम पर पर एक प्रतिष्ठित अवॉर्ड दिया जाता है. तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत में मुथुलक्ष्मी को बेहद सम्मान के ​साथ याद किया जाता है. यह भी उल्लेखनीय है कि 2019 में गूगल ने डूडल के ज़रिये उन्हें याद किया था.

(यह लेख वी शांता लिखित पुस्तक, वीआर देविका के लेख, मुथुलक्ष्मी पर विकिपीडिया पेज, पद्मा मीनाक्षी के लेख और अडयार कैंसर इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट से जुटाए गए तथ्यों पर आधारित है.)
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