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कोरोना को दुश्मन नंबर 1 बताकर WHO ने कहा, 'हर्ड इम्यूनिटी बेहद खतरनाक आ​इडिया'

एमपी में लॉकडाउन ४ के दौरान लागू हो सकता है ऑड-ईवन फॉर्मूला

एमपी में लॉकडाउन ४ के दौरान लागू हो सकता है ऑड-ईवन फॉर्मूला

भारत (India) सहित कुछ देशों के वैज्ञानिक हर्ड इम्यूनिटी (Herd Immunity) को लेकर चर्चा कर रहे हैं और ऐसे में विश्व स्वास ...अधिक पढ़ें

    'कुछ देशों ने कोरोना वायरस (Corona Virus) के चलते लॉकडाउन (Lockdown) में ढील देना शुरू किया है लेकिन इस लॉकडाउन के दौरान कोई खास तैयारी नहीं की है. अब ये देश यह उम्मीद लगा रहे हैं कि अचानक कोई जादू हो जाएगा और हर्ड इम्यूनिटी पैदा हो जाएगी! इसमें कितने लोगों की जान जाएगी? यह बहुत बहुत खतरनाक (Danger) आइडिया है.' हर्ड इम्यूनिटी पर चल रही बहस में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) शामिल हुआ और इस गणित से बचने की चेतावनी दी.

    हालांकि भारत सहित कुछ देशों के वैज्ञानिकों का एक वर्ग पुरज़ोर तर्कों के साथ मान रहा है कि Covid 19 संक्रमण पर काबू पाने के लिए हर्ड इम्यूनिटी यानी कि सामूहिक प्रतिरोधी क्षमता ज़रूरी होगी. इससे जुड़े नॉलेज बेस्ड तमाम तथ्य न्यूज़ 18 ने आप तक पहुंचाए हैं. डब्ल्यूएचओ ने इस कॉंसेप्ट को खतरनाक क्यों बताया? यह भी जानिए कि ताज़ा हालात में ​हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के लिए क्या कीमत चुकानी पड़ेगी.

    पढ़ें : हर्ड इम्यूनिटी पर ​नई रिसर्च : कोविड 19 थमने में दो साल तो लगेंगे

    बड़ी आबादी संक्रमण के जोखिम में
    दुनिया भर में हुए अध्ययनों में पाया गया है कि एंटीबॉडीज़ विकसित होने के सबूत काफी कम अनुपात में मिले हैं यानी सिर्फ 1 से 10 फीसदी तक. WHO की टेक्निकल लीड मारिया वैन ने साफ कहा हालांकि ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं लेकिन अब भी अध्ययनों का संकेत यही है कि बहुत बड़ी आबादी अब भी संक्रमण के लिहाज़ जोखिम की स्थिति में ही है.

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    हर्ड इम्यूनिटी को लेकर डब्ल्यूएचओ ने कई तरह की चेतावनियां दीं.


    हर्ड इम्यूनिटी नहीं, सावधानी ही बचाव
    हर्ड का मतलब जानवरों के झुंड से होता है और इम्यूनिटी का मतलब प्रतिरक्षा तंत्र के मज़बूत होने से है. वैक्सीनोलॉजी में इस कॉंसेप्ट का इस्तेमाल वैक्सीन दिए जाने के मामलों में होता है. मारिया के मुताबिक कोविड 19 एंटीबॉडीज़ की मौजूदा स्थिति को लेकर अभी तस्वीर कतई साफ नहीं है कि किस स्तर पर इम्यूनिटी ज़रूरी होगी. और कैसे? मतलब वायरस संक्रमण के ज़रिये या वैक्सीन के ज़रिये? मारिया का साफ कहना है कि फिलहाल क्वारंटीन और टेस्टिंग ही वायरस से लड़ने के कारगर उपाय हैं.

    WHO के स्वास्थ्य इमरजेंसी विभाग के निदेशक माइक रेयान ने और कड़े शब्दों में हर्ड इम्यूनिटी की आलोचना करते हुए कहा है कि यह पशु चिकित्सा विज्ञान का शब्द है, जहां जानवरों के झुंड में इम्यूनिटी विकसित करने के लिए कुछ जानवरों की जानों को दांव पर लगा दिया जाता है, लेकिन इंसान जानवर नहीं हैं. उनकी जान की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? इस तरह का गणित लोगों की जान के साथ खिलवाड़ तक साबित हो सकता है. इनसे सतर्क रहना चाहिए.


    ये हैं हर्ड इम्यूनिटी पर WHO के 'वॉर्निंग कैप्सूल'
    1. जो देश WHO के सदस्य हैं और ज़िम्मेदार हैं, उन्हें लोगों की जानों को महत्व देना चाहिए. कोरोना संक्रमण बेहद गंभीर है. यह पूरी मानवता के लिए नंबर एक दुश्मन है. इसे मज़ाक में नहीं लेना चाहिए.
    2. हर्ड इम्यूनिटी का कॉंसेप्ट तब चर्चा में आता है, जब यह देखना होता है कि किसी आबादी में कितनों को वैक्सीन की ज़रूरत है. यानी बगैर वैक्सीन के इस आइडिया का कोई मतलब नहीं है.
    3. कुछ देशों की सरकारें लॉकडाउन में अतार्किक ढीलें देकर या सिर्फ हल्के प्रतिबंध लगाकर समझ रही हैं कि कोई जादू होगा और लोग हर्ड इम्यूनिटी पा लेंगे, यह खतरनाक है.
    4. हम बार बार कह रहे हैं कि यह खतरनाक संक्रमण है इसलिए अब भी पूरी निगरानी और टेस्टिंग बेहद ज़रूरी उपाय हैं.

    कोविड 19 में हर्ड इम्यूनिटी किस कीमत पर?
    हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के दो ही तरीके हैं, एक तो बड़ी आबादी को वैक्सीन दी जाए या फिर बहुसंख्या संक्रमित हो. विशेषज्ञों की मानें तो संक्रमण के हालात के मद्देनज़र अनुमान यही है कि दुनिया की 70 फीसदी आबादी संक्रमित होगी, तभी हर्ड इम्यूनिटी संभव है. सबसे खराब स्थिति के मुताबिक यह हो सकता है :

    * इसे पाने के लिए कल्पना कीजिए कि सभी फिज़िकल डिस्टेंसिंग जैसी सभी सावधानियां छोड़ दें तो क्या होगा? कुछ ही महीनों में एक बड़ा हुजूम संक्रमित होगा और अस्पतालों व स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी बोझ पड़ेगा.
    * मौतों का आंकड़ा और प्रतिशत बेतहाशा बढ़ेगा.
    * चूंकि वैक्सीन या कोई प्रामाणिक इलाज नहीं है, इसलिए कोविड 19 संक्रमण जब बड़ी आबादी में फैलेगा, तो व्यक्ति व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के मद्देनज़र नई समस्याएं और चुनौतियां सामने आएंगी.

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    सोशल मीडिया पर भी हर्ड इम्यूनिटी को लेकर बंटे हुए विचार हैं और कुछ इसके पक्ष में कतई नहीं हैं.


    तो क्या है सही रास्ता?
    अब अगर सबसे अच्छी स्थिति सोची जाए तो यही है कि सोशल डिस्टेंसिंग, लॉकडाउन जैसे सख्त नियमों का पालन कम से कम एक साल तक किया जाता रहे. लेकिन यह देशों और आम जनजीवन के लिए संभव विकल्प नहीं है. ऐसे में बीच का रास्ता अपनाए जाने का भी आइडिया विशेषज्ञ सुझा रहे हैं. इसके मुताबिक जब संक्रमण में गिरावट दिखे, तब ​सख्त नियमों में ढील दी जाए और जब फिर संक्रमण बढ़ने लगे तब फिर सख्त नियम लागू किए जाएं.

    इस तरह की प्रैक्टिस​ किसी तय समय के लिए नहीं बल्कि तब तक ज़रूरी होगी, जब तक कोरोना वायरस के खिलाफ कोई कारगर वैक्सीन सामने न आ जाए. उसके बाद हर्ड इम्यूनिटी को लेकर सोचने के विकल्प भी होंगे.

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