बिहार चुनाव : क्यों 'नाम-मात्र' की रह जाती है महिलाओं की भागीदारी?

पिछले साल के लोकसभा चुनाव में 57.33 प्रतिशत मतदान हुआ था. (सांकेतिक फोटो)
पिछले साल के लोकसभा चुनाव में 57.33 प्रतिशत मतदान हुआ था. (सांकेतिक फोटो)

Bihar Election Result 2020 : उम्मीद की जा रही थी कि इस बार स्थिति बेहतर होगी, लेकिन महिलाओं के हिस्से में उसी गिनती के टिकट (Women Candidates) आए. वो भी ज़्यादातर उन्हीं महिलाओं के हिस्से, जिनके पॉलिटिकल या बाहुबली कनेक्शन हैं.

  • News18India
  • Last Updated: November 10, 2020, 7:32 AM IST
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एक रिपोर्ट कहती है कि साल 2006 से 2016 के बीच बिहार में जितने चुनाव (लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय) हुए (Elections in Bihar), उनमें कुल 8163 उम्मीदवारों ने किस्मत आज़माई, जिनमें से सिर्फ 610 यानी 7% महिलाएं रहीं. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Polls) में मतगणना के दिन से पहले वोटिंग के बाद महिलाओं की भागीदारी संबंधी जो आंकड़े आए, वो भी इतिहास जैसे ही हैं. विश्लेषक मान रहे हैं कि बिहार चुनाव (Bihar Election 2020) में महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी अब भी एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे पाया नहीं जा सका है.

क्यों नहीं पाया जा सका है? इसके साथ ही, एक बिंदु और विचारणीय है कि जो महिलाएं बिहार चुनाव में उम्मीदवारी कर रही हैं, उनका आधार क्या है? इन बातों को तमाम आंकड़ों की ज़ुबानी जानने के बाद समझ सकेंगे कि महिलाओं की उपस्थिति बिहार चुनाव में चिंता का विषय क्यों है.

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क्या है महिला भागीदारी की स्थिति?
इस बार विधानसभा चुनाव में तकरीबन सभी पार्टियों ने महिलाओं को टिकट दिए हैं, लेकिन लैंगिक असमानता और महिलाओं की ज़्यादातर 'डमी उम्मीदवारी' चिंता की बात दिख रही है. सत्तारूढ़ जेडीयू ने कुल 115 सीटों में से 22 पर महिलाओं को टिकट दिया है. ये महिलाएं कौन हैं? आरजेडी से जेडीयू में शामिल हुए कद्दावर नेता इलियास हुसैन की बेटी शगुफ्ता अज़ीम, अंजुम आरा और मुज़फ्फरपुर शेल्टर होम उत्पीड़न केस में आरोपों में घिरीं मंजू वर्मा इनमें प्रमुख नाम हैं.

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दूसरी तरफ, भाजपा ने 110 में से 13 पर महिलाओं को खड़ा किया है. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. दिग्विजय सिंह की बेटी श्रेयसी सिंह इनमें से एक नाम है. वहीं, आरजेडी ने 16 महिला उम्मीदवार खड़े किए हैं, कांग्रेस ने 7 और लेफ्ट पार्टियों ने एक यानी महागठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 24 महिलाओं को टिकट दिया. इनमें बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद, शरद यादव की बेटी सुभाषिनी जैसे नाम शामिल हैं.

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एनडीए से अलग हुई लोक जनशक्ति पार्टी ने 18 महिलाओं को टिकट दिए, जिनमें उषा विद्यार्थी और वरिष्ठ एक्टिविस्ट कंचनबाला के नाम शामिल हैं. बिहार चुनाव में महिलाओं की स्थिति को लेकर कंचनबाला के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा गया :

ज़्यादा महिला कैंडिडेट वो हैं, या तो अशिक्षित हैं या फिर बाहुबलियों या अपराधियों की पत्नी या विधवा हैं. ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है, काबिल हैं और राजनीति में अंतर लाने की संभावना रखती हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अशिक्षित या बाहुबलियों के घराने की महिलाओं को ही तरजीह देती हैं.


क्या कहता है इतिहास?
बिहार चुनावों में महिलाओं की भूमिका की कहानी बड़ी अफसोसनाक रही है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक रिपोर्ट में 2006 से 2016 तक हुए चुनावों के आंकड़े बताए गए कि दस सालों में 7% महिला उम्मीदवारी रही. इनमें से भी 20% महिला उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस थे और 18% के खिलाफ गंभीर क्रिमिनल केस. यानी बाहुबली घरानों से ताल्लुक साफ समझा जा सकता है. इस रिपोर्ट से चौंकाने वाले और फैक्ट्स देखें.

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* 2019 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 9% महिला कैंडिडेट थीं और कुल 40 विजेताओं में से सिर्फ 3, जबकि वोटरों में महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों से ज़्यादा 59.92% था.
* इन 3 महिला सांसदों में से एक सिर्फ दसवीं पास थीं, जबकि तीनों स्थापित राजनीतिकों की पत्नी होने के साथ ही करोड़पति पाई गईं और तीनों के खिलाफ क्रिमिनल केस थे.
* एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया कि 16वीं लोकसभा में 75% महिला सांसदों के राजनीतिक कनेक्शन रहे.
* 2010 में बिहार विधानसभा में 34 महिला विधायक थीं, लेकिन 2015 में 28. इन 28 में से सिर्फ 24% शिक्षित थीं.

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अपने बेटे तेजस्वी यादव के साथ राबड़ी देवी, जो 8वीं कक्षा तक शिक्षित महिला मुख्यमंत्री रहीं.


इस कमज़ोर तस्वीर की वजहें क्या हैं?
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली की 2011 की रिपोर्ट भी इस विषय पर चिंता जता चुकी थी. इसमें कहा गया था कि भारतीय राजनीति का पुरुषवादी होना, संसद व विधानसभा में महिलाओं के लिए सीटें निश्चित न होना, फैमिली सपोर्ट का अभाव और पार्टियों का महिलाओं की काबिलियत को कम आंकना, राजनीति में महिलाओं की कमज़ोर स्थिति के प्रमुख कारण रहे हैं.

इसी तरह, एएन सिन्हा रिसर्च इंस्टिट्यूट के पूर्व डायरेक्टर डीएम दिवाकर का मानना है कि महिलाएं जब आधी आबादी हैं तो आधी सीटें उन्हें मिलना चाहिए, लेकिन राजनीति में ऐसा अब तक क्यों नहीं होता, इसे वो सिरदर्द वाला सवाल कहते हैं. वहीं, पटना यूनिवर्सिटी में वीमन स्टडी के प्रमुख पीके पोद्दार ने एचटी से कहा कि पार्टियां लैंगिक समानता के दावे करती हैं, लेकिन टिकट दिए जाने की प्रक्रिया में यह नज़र नहीं आता.

बिहार को लेने होंगे सबक
पिछले आम चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने महिलाओं को टिकट देने में 41% की हिस्सेदारी रखी तो ओडिशा में बीजेडी ने 33% की. बिहार की पार्टियों को भी कम से कम महिला हिस्सेदारी तय करना होगी, जो अभी 9 से 10% तक सिमटकर रह जाती है. साथ ही, शिक्षित, प्रतिभावान और आत्मनिर्भर महिलाओं को राजनीति में लाने की कवायद करना होगी. विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि इस तरह महिलाओं की भागीदारी हो, तो बिहार की राजनीति और समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है.
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