मर्दों की तुलना में आखिर क्यों और कैसे बेहतर साबित हुईं महिला लीडर्स?

मर्दों की तुलना में आखिर क्यों और कैसे बेहतर साबित हुईं महिला लीडर्स?
कोविड 19 के खिलाफ नीतियों के लिए महिला राष्ट्र प्रमुखों की तारीफ हो रही है.

दुनिया में सिर्फ 19 देश हैं, जहां शासन व प्रशासन की कमान महिला के हाथ में है. कोरोना वायरस (Corona Virus) के महामारी बनने के कुछ महीनों बाद ही यह साबित हुआ कि ऐसे देश उन देशों से बेहतर स्थिति में रहे, जहां पुरुष सत्ता में हैं. महिला नेताओं के कामयाब होने का मतलब समझने के साथ ही जानें कि इस कामयाबी का साइन्स क्या रहा.

  • News18India
  • Last Updated: August 25, 2020, 5:41 PM IST
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Covid-19 के खिलाफ लड़ाई में जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल (Angela Merkel), न्यूज़ीलैंड पीएम जैसिंडा आर्डर्न (Jacinda Ardern), डेनमार्क की मेट फ्रेड्रेक्सन, ताईवान की राष्ट्रपति त्साई इंग वेन और फिनलैंड की पीएम सना मरीन की सफलताओं ने जिस तरह सुर्खियां पाईं, उससे चर्चा छिड़ी कि महिला नेता पुरुषों से बेहतर साबित हुईं. इस चर्चा के बाद कई तरह के अध्ययन (Study) भी हुए और पाया गया कि यह वाकई सच है कि पुरुष नेता इन महिलाओं (Male Leaders vs Female Leaders) के आगे फीके साबित हुए.

कोरोना वायरस संक्रमण की वैश्विक महामारी के मामले में अमेरिका, ब्राज़ील और भारत सबसे ज़्यादा केसों के साथ टॉप लिस्ट में शुमार रहे ​जबकि यहां दुनिया के चर्चित पुरुष नेता राष्ट्र प्रमुख हैं. दूसरी तरफ, इस महामारी के दौरान सटीक, समयानुकूल और बेहतर कदम उठाने से गैर चर्चित ये महिलाएं शायद पहली बार दुनिया की नज़रों में आईं. इनकी क्या भूमिका रही? इसके साथ ही हम आपको ये भी बताएंगे कि कोविड 19 के खिलाफ लड़ाई में महिला नेताओं की कामयाबी के पीछे क्या साइन्स रहा.

कोविड-19 में महिला नेताओं का रोल?
कोरोना काल में 194 देशों के नेताओं ने किस तरह कदम उठाए, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के मकसद से वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और सेंटर फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी रिसर्च में जो रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं, उनमें साफ कहा गया कि महिला नेताओं ने 'प्रोएक्टिव और संतुलित व समन्वित नीतियां' अपनाईं, जिससे एक साफ अंतर पैदा हुआ.
इन रिपोर्ट्स की लेखक लिवरपूल यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्री सुप्रिया गरिकिपति और रीडिंग यूनिवर्सिटी की उमा कंभमपति ने द गार्जियन के साथ बातचीत करते हुए ये भी कहा कि महामारी से मौतों को लेकर जो चुनौती खड़ी हुई, उसका सामना करने के लिए महिला नेताओं ने जल्दी और निर्णायक कदम उठाने का साहस दिखाया.



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महिला नेतृत्व वाले देशों के तुलनात्मक अध्ययन को गार्जियन की रिपोर्ट में इस तरह दर्शाया गया.


बीते 19 मई तक के आंकड़ों को आधार बनाकर की गई स्टडी के आधार पर उमा और सुप्रिया ने लिखा कि तमाम मामलों में महिला राष्ट्रप्रमुखों ने समय रहते लॉकडाउन जैसे मुश्किल कदम उठाए. हालांकि ऐसे कदमों से अर्थव्यवस्था के लिए खतरे ज़्यादा थे, लेकिन महिला नेताओं ने अपने देश के लोगों की जानें बचाने को तरजीह दी. और यह दिखा भी कि इन देशों में कई जानें बचा ली गईं.

क्यों बेहतर साबित हुईं महिला नेता?
अपने देश की जनता के हित में बेहतर कदम उठाने वाली इन नेताओं संबंधी चर्चा में कारण खोजने की कोशिश की जा रही है. वरिष्ठ पत्रकार असद मिर्ज़ा ने अपने लेख में लिखा है कि तथ्यात्मकता और तर्क को तरजीह देना महिला नेताओं को बेहतर बनाने का प्रमुख कारण रहा. अन्य कारणों में 'वूमन टच' और मर्दों की दुनिया में खुद को साबित करने के इरादे को भी शुमार किया जा सकता है. अब महिला नेताओं की इस कामयाबी का साइन्स भी समझना चाहिए.

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लीडरशिप : क्या रिस्क उठाने में आगे हैं महिलाएं?
इस स्टडी की शुरूआती परिकल्पना यही थी कि निर्णय लेने के मामले में महिला नेता जोखिम उठाने से कतराती ज़्यादा हैं. कोविड 19 के हालात में देखा गया कि जब बात लोगों की जान की थी और अपने पुरुष राष्ट्रप्रमुखों की तुलना में जल्दी लॉकडाउन जैसे कदम उठाने की थी, तब ये महिला नेता कम प्रो—रिस्क दिखीं लेकिन जब अर्थव्यवस्था के जोखिम की बात आई तो ये महिलाएं कम हिचकिचाईं.

यह समय है कि अब पुरुषों को महिला नेताओं से हमदर्दी और सही कम्युनिकेशन जैसे कुछ गुण सीखने चाहिए... यह तय है कि कुछ मामलों में पुरुष नेता बेहतर साबित होंगे लेकिन बाकी में वो बेहतर नहीं हैं. अब ज़रूरत है कि अलग अप्रोच रखने वाले नेताओं की वैरायटी के सिस्टम को देश अपनाएं.
सुप्रिया और उमा


कैसे किया गया यह अध्ययन?
सुप्रिया और उमा की चर्चित रिसर्च में महिला और पुरुष राष्ट्र प्रमुखों की तुलना करने के लिए एक मॉडल अपनाया गया. इसके मुताबिक दो पड़ोसी देशों की तुलना की गई, जो आबादी, उम्र, जीडीपी आदि स्तरों पर लगभग समान थे और एक देश के प्रमुख पुरुष हैं और दूसरे की महिला. जैसे जर्मनी की तुलना यूके, न्यूज़ीलैंड की आयरलैंड और बांग्लादेश की तुलना पाकिस्तान के साथ की गई. नतीजे साफ दिखे कि महिला राष्ट्र प्रमुखों वाले देशों ने तुलना किए जाने वाले देशों से बेहतर आंकड़े दर्शाए.
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