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क्‍या कोरोना वायरस संकट के बीच अर्थव्‍यवस्‍था को संभालने के लिए नए करेंसी नोट छापेगा आरबीआई?

सरकार वित्‍तीय घाटे की भरपाई और खर्च के लिए आरबीआई को नए करेंसी नोट छापने के लिए कह सकती है.

सरकार वित्‍तीय घाटे की भरपाई और खर्च के लिए आरबीआई को नए करेंसी नोट छापने के लिए कह सकती है.

लॉकडाउन के कारण देश की अर्थव्‍यवयस्‍था (Economy) ठप हो गई है. सरकार के कर्ज लेने के लिए बाजार में पर्याप्‍त पैसे नहीं ह ...अधिक पढ़ें

    भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था कुछ समय से सुस्‍त (Economic Slowdown) चल रही है, जो कोरोना वायरस (Coronavirus) फैलने के बाद करीब-करीब ठप हो गई है. ज्‍यादातर अनुमानों के मुताबिक, चालू वित्‍त वर्ष में भारत की जीडीपी नाम की ही वृद्धि हासिल कर पाएगी. सकल घरेलू उत्‍पाद (GDP) में इस गिरावट का क्‍या कारण है? दरअसल, संक्रमण के फैलने की रफ्तार को काबू में रखने के लिए लगाए गए लॉकडाउन (Lockdown) के कारण देश की बड़ी आबादी की आमदनी बुरी तरह निचले स्‍तर पर चली गई है. ऐसे में खपत (Consumption) का स्‍तर भी घट गया है. आसान शब्‍दों में समझें तो वस्‍तु व सेवा (Goods and Services) मांग नीचे की ओर जा रही है. अब सवाल ये उठता है कि मांग में इजाफे के लिए क्‍या किया जा सकता है? लोगों के पास चीजें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं. अगर उन्‍हें पैसे मिल जाएं तो मांग (Demand) में वृद्धि हो सकती है. सवाल ये है कि उन्‍हें पैसे देगा कौन?

    वित्‍तीय घाटा 15 फीसदी रहने का है अनुमान
    लॉकडाउन के कारण अच्‍छे से अच्‍छे पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों से लेकर सामान्‍य मजदूर तक की आय पर जबरदस्‍त असर हुआ है. अगर उनके पास पैसे पूरी तरह खत्‍म नहीं भी हुए हैं तो भी इमरजेंसी के लिए ही बचे हैं. अब ऐसे हालात में कौन क्‍या कर सकता है? आरबीआई (RBI) फाइनेंशियल सिस्‍टम में तरलता (Liquidity) बढाने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए केंद्रीय बैंक ने सरकारी बॉन्‍ड्स की खरीदारी करके फाइनेंशियल सिस्‍टम में पैसे झोंके हैं. वहीं, ज्‍यादातर बैंक मौजूदा माहौल में ज्‍यादा जोखिम के कारण नए लोन देने के इच्‍छुक नहीं हैं. सबसे बड़ी बात इन तरीकों से देश की अर्थव्‍यवस्‍था में तरलता बढाने में वक्‍त ज्‍यादा लगता है. वहीं, सरकार संकट को देखते हुए पहले ही भारी-भरकम पैकेजेज की घोषणा कर चुकी है. ऐसे में वित्‍तीय घाटा (Deficit) सीमा के पार जा चुका है. एक अनुमान के मुताबिक, इस बार वित्‍तीय घाटा 15 फीसदी के आसपास रहेगा, जो निर्धारित अधिकतम सीमा 6 फीसदी से बहुत ज्‍यादा है.

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    पहले से ही सुस्‍त वचल रही भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था कोरोना वायरस संकट के कारण ठप हो गई है.


    सरकार के कर्ज के लिए बाजार में पैसा नहीं
    केंद्र सरकार अगर राहत पैकेज (Relief Packages) की घोषणा करती है तो उसे इसके लिए भारी-भरकम कर्ज (Debt) लेना होगा. इससे वित्‍तीय घाटा आसामान पर पहुंच जाएगा. सबसे बड़ी बात सरकार के कर्ज लेने के लिए बाजार में पर्याप्‍त बचत होनी जरूरी होती है. मौजूदा संकट के हालात में अधिकतर लोगों की बचत नाम की भी नहीं रह गई है. जो बची हैं उनसे सरकार की जरूरत पूरी नहीं हो पाएगी. वहीं, विदेशी निवेशक भी इस समय अपना पैसा वापस खींच रहे हैं. वे अमेरिका (US) जैसी सुरक्षित अर्थव्‍यवस्‍था की ओर भाग रहे हैं. दरअसल, वे भी अनिश्चितता के इस दौर में अनिश्‍चतताओं से घिरी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में अपनी पूंजी झोंककर ज्‍यादा जोखिम लेने के इच्‍छुक नहीं हैं. कुल मिलाकर बाजार में इतना पैसा मौजूद नहीं है कि सरकार उधारी ले सके. वहीं, अगर सरकार ज्‍यादा पैसा उधार लेती है तो कर्ज की ब्‍याज दरों (Interest Rates) में इजाफा हो जाता है.

    आरबीआई प्रत्‍यक्ष मुद्रीकरण से करे भरपाई
    सामान्‍य आर्थिक रूपरेखा के हिसाब से फैसले लेने पर हालात बेहतर होने से पहले बहुत बुरे हो सकते हैं. वहीं, अर्थव्‍यवस्‍था के सुधरने की रफ्तार बहुत धीमी और मुश्किल हो सकती है. बच्‍चों को शिक्षा नहीं मिल पाएगी. लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ सकता है. जिन्‍हें खाना मिलेगा भी तो पौष्टिक भोजन मिलना मुश्किल हो सकता है. अब इसका एक ही हल समझ आता है कि सरकार के घाटे की भरपाई आरबीआई प्रत्‍यक्ष मुद्रीकरण (Direct Monetising) के जरिये करे. सोचिए कि सरकार अर्थव्‍यवस्‍था में नकदी बढाने के लिए फाइनेंशियल सिस्‍टम को नजरअंदाज कर सीधे आरबीआई से नए बॉन्‍ड्स के बदले नए करेंसी नोट छापने को कहता है. अब सरकार के पास खर्च करने के लिए नकदी होगी. तब सरकार अर्थव्‍यवस्‍था को संभालने के लिए डायरेक्‍ट बेनिफिट योजनाओं के जरिये गरीबों के खाते में पैसे ट्रांसफर करेगी या अस्‍पताल बनाएगी या छोटे व मझोले उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों को वेज सब्सिडी देगी.

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    आरबीआई नए करेंसी नोट छापकर सरकारी घाटे की भरपाई कर सकता है, लेकिन इसके कई नुकसान भी हैं.


    बैंक ऑफ इंग्‍लैंड ने 9 अप्रैल को छापे नोट
    नए करेंसी नोट (New Money) छापने के एवज में आरबीआई को सरकारी बॉन्‍ड्स (Government Bonds) मिलेंगे. ये बॉन्‍ड्स तब तक आरबीआई के पास रहेंगे, जब तक सरकार इनका भुगतान केंद्रीय बैंक को नहीं कर देती है. जब तक सरकार की ओर से डिफॉल्‍ट की उम्‍मीद नहीं होगी, तब तक आरबीआई अपनी बैलेंस शीट को संभाले रहेगा ताकि सरकार अर्थव्‍यवस्‍था को फिर से मजबूत कर सके. ये आरबीआई के ओपन मार्केट ऑपरेशंस या सेकेंडरी मार्केट से बॉन्‍ड्स खरीदकर अप्रत्‍यक्ष मुद्रीकरण से काफी अलग होता है. अब सवाल ये भी है कि क्‍या COVID-19 के कारण पैदा हुए संकट से निपटने के लिए कोई दूसरा देश भी ऐसा कर रहा है तो जवाब है हां. ब्रिटेन (Britain) के बैंक ऑफ इंग्‍लैंड ने ब्रिटिश सरकार के लिए 9 अप्रैल को प्रत्‍यक्ष मुद्रीकरण सुविधा उपलब्‍ध कराई. हालांकि, बैंक ऑफ इंग्‍लैंड के गवर्नर एंड्रयू बैली आखिरी समय तक इसका विरोध करते रहे.

    'नए करेंसी नोट छापे बिना खर्च संभव नहीं'
    भारत में भी 1997 तक आरबीआई सरकारी घाटे की भरपाई नए करेंसी नोट छापकर करता रहा है. हालांकि, इस तरह से सरकारी घाटे की भरपाई करने के काफी नुकसान भी होते हैं. इसीलिए 1994 में तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री डॉ. मनमेाहन सिंह और तत्‍कालीन आरबीआई गवर्नर सी. रंगराजन ने 1997 से इस सुविधा को बंद करने का फैसला लिया. लेकिन, मौजूदा हालात में रंगराजन का भी मानना है कि सरकार को वित्‍तीय घाटे की भरपाई के लिए नए करेंसी नोट छपवाने ही होंगे. उनका कहना है कि सरकारी घाटे का मुद्रीकरण इस समय बहुत ही जरूरी है. सरकारी कर्ज के मुद्रीकरण के बिना खर्च में इतनी बड़ी वृद्धि का प्रबंधन नहीं किया जा सकता है. फिर ऐसा क्‍यों है कि सरकार ने अब तक आरबीआई से नए करेंसी नोट छापने के लिए नहीं कहा है.

    नए करेंसी नोट छापने में क्‍यों है परेशानी
    आर्थिक विशेषज्ञों के मताबिक, घाटे का प्रत्यक्ष मुद्रीकरण बहुत ही विवादास्‍पद और जटिल मुद्दा है. आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी. सुब्‍बाराव ने हाल में कहा था कि सरकार को इससे बचना चाहिए. उन्‍होंने कहा था, 'निश्चित तौर पर संकट के इस दौर में सरकार को कर्ज लेकर ज्‍यादा से ज्‍यादा खर्च चाहिए. ये सरकार की नैतिक और राजनीतिक जिम्‍मेदारी है. लेकिन, नई दिल्ली को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1991 में भुगतान संकट का भयावह संतुलन और 2013 में नजदीकी वित्‍तीय संकट वित्तीय लापरवाही का ही परिणाम था.' अब सवाल ये उठता है कि आखिर सरकारी घाटे की भरपाई नए करेंसी नोट छापकर करने में दिक्‍कत क्‍या है? द इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसका जवाब करेंसी नोट की छपाई से नहीं बल्कि इसकी वापसी से जुड़ा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार को मांग बढाने के लिए ये सुविधा दी जाती है. लेकिन अगर सरकार जल्‍द से जल्‍द इसका भुगतान नहीं कर पाती है तो दूसरे आर्थिक संकट की समस्‍या खड़ी जाती है.

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    नए करेंसी नोट और पुराने नोट एकसाथ चलन में आने पर महंगाई आसमान छूने लगती है.


    कैसे बनेंगे दूसरे आर्थिक संकट के हालात
    अब समझते हैं कि दूसरे आर्थिक संकट के हालात कैसे बनते हैं. सरकार नए पैसे का इस्‍तेमाल लोगों की आय और निजी मांग बढाने में करती है. इससे महंगाई बढ जाती है. महंगाई में हल्‍की-फल्‍की वृद्धि अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अच्‍छी मानी जाती है, लेकिन अगर सरकार इसे समय पर नहीं थाम पाती तो पुराने और नए करेंसी के चलन में आने से बाजार में पैसे की बाढ सी आ जाती है. इससे महंगाई आसमान छूने लगती है. अमूमन जब तक सरकार इस उच्‍च मुद्रास्‍फीति से निपट पाती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. सरकारा को ये समझने में देरी हो चुकी होती है कि उन्‍होंने जरूरत से ज्‍यादा कर्ज ले लिया. उच्‍च मुद्रास्‍फीति और बड़ा सरकारी कर्ज मैक्रोइकोनॉमी में अस्थिरता की जमीन तैयार कर देता है.

    जीडीपी के 80 फीसदी से ज्‍यादा कर्ज नुकसानदायक
    ज्‍यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं को जीडीपी के 80 फीसदी से ज्‍यादा कर्ज नहीं लेना चाहिए. मौजूदा समय में यह अभी से जीडीपी का 70 फीसदी है. सुब्‍बाराव कहते हैं कि सरकार को प्रतिबद्धता के साथ अतिरिक्‍त कर्ज को संकट से उबरने के तत्‍काल बाद लौटाने की तैयारी रखनी होगी. अगर सरकार ऐसा कर पाती है तो ही वित्‍तीय तनाव और संकट को रोका जा सकता है. साथ ही अर्थव्‍यवस्‍था में बाजार का भरोसा भी इसी तरह लौटाया जा सकता है. इसके अलावा प्रत्‍यक्ष मुद्रीकरण के विरोध में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि ज्‍यादातर सरकारें खर्च करने के विकल्‍पों को चुनने में नाकाबिल और भ्रष्‍ट होती हैं. ज्‍यादातर सरकारें सही से ये तय नहीं कर पाती हैं कि किसे कितनी राहत दी जानी चाहिए.

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