क्या वाकई चीन के बजाय भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकती हैं विदेशी कंपनियां?

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप समेत कई देश चीन को कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्‍मेदार ठहरा रहे हैं.

कोरोना वायरस (Coronavirus) के दुनियाभर में फैलने को लेकर चीन ज्‍यादातर देशों के निशाने पर है. ऐसे में माना रहा है कि कई देशों की कंपनियां चीन (China) को छोड़कर किसी दूसरे देश में जाने का विचार कर रही हैं. कहा जा रहा है कि काफी कंपनियां चीन छोड़कर भारत (India) आ सकती हैं. क्‍या वाकई ऐसा होगा?

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    कोरोना वायरस के फैलने से पूरी दुनिया में हो रही बर्बादी को लेकर अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) लगातार चीन पर हमला कर रहे हैं. उनके अलावा जर्मनी (Germany) और ब्रिटेन (Britain) भी वैश्विक महामारी को लेकर चीन को निशाने पर ले चुके हैं. ऐसे में लग रहा है कि वैश्विक महामारी (Pandemic) से निपटने के बाद सभी देश मिलकर चीन (China) पर इस बर्बादी की जवाबदेही का दवाब बनाएंगे.

    इटली (Italy) और ऑस्‍ट्रेलिया भी ट्रंप, जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल (Angela Merkel) और ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन के सुर में सुर मिला रहे हैं. इसी बीच कुछ देशों ने अपनी कंपनियों को चीन से हटाकर कहीं और में ले जाने की इच्‍छा भी स्‍पष्‍ट कर दी है. इनमें अमेरिका और जापान ने हाल में ही चीन के बजाय किसी दूसरे देश में निवेश करने की बात कही है. कहा जा रहा है कि ऐसे में यूरोपीय देशों और अमेरिका की कंपनियां भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकती हैं.

    साझा निवेश के जरिये भारत लाई जा सकती हैं विदेशी कंपनियां
    कोरोना संकट (Coronavirus in India) के बीच इस हलचल पर भारत की भी पैनी नजर बनी हुई है. हालांकि, किसी भी देश ने अभी तक चीन को छोड़कर भारत में निवेश की औपचारिक घोषणा नहीं की है. फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों से ऑनलाइन मीटिंग में विदेशी निवेश से जुड़ी सहज और सरल नीतियां बनाने को कहा है. वहीं, केंद्र सरकार की व्यापार को बढ़ावा देने वाली कमेटी अमेरिकी निवेश को आकर्षित करने वाली नीति बनाने में लग गई है.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मुख्‍यमंत्रियों से विदेशी निवेश आकर्षित करने वाली नीतियां बनाने को कहा है. वहीं, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि साझा निवेश के जरिये कंपनियों को भारत लाया जा सकता है.


    केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने भी उम्मीद जताई है कि कोरोना वायरस के कारण घटती विश्वसनीयता के कारण चीन छोड़ने वाली अमेरिकी कंपनियों को साझा निवेश के जरिये भारत लाया जा सकता है. इससे सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (Manufacturing Sector) में ही 20-25 लाख करोड़ का निवेश हो सकता है. इससे भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था (Indian Economy) को संभालने में भी काफी मदद मिलेगी.

    भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अच्‍छी खबर हो सकती है साबित
    अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और अमेरिकी कंपनियों के भारतीय प्रतिनिधियों के बीच अमेरिकी चेंबर ऑफ कामर्स की पिछले हफ्ते हुई बैठक में इस पर विस्‍तार से चर्चा हुई. बैठक के दौरान चीन से अपना कारोबार समेटने का पूरा मन चुकी कंपनियों को कुछ खास नसीहतें दी गईं. काफी समय से चीन और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड वार के मद्देनजर पिछले साल से ही ऐसे कदम उठाए जाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. इंडिया अमेरिका स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम ने भी कहा है कि लगभग 200 अमेरिकी कंपनियां चीन से बाहर निकलने का मन बना चुकी हैं. ऐसे में भारत में निवेश उनके लिए एक अच्छा अवसर होगा. आर्थिक व कारोबारी विशेषज्ञों का मानना है कि घटती आर्थिक वृद्धि दर और रेमिटेंस के बीच फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ये अच्छी खबर साबित हो सकती है.

    एक दशक में मजबूत हुए हैं भारत-अमेरिका आर्थिक संबंध
    भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौता इन निवेशों के लिए अच्छा रास्ता बना सकता था. ट्रंप की हाल की भारत यात्रा से पहले एक मसौदे की संभावना भी जताई जा रही थी, लेकिन इस पर विचार-विमर्श जारी है. पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय आर्थिक संबंध मजबूत हुए हैं. आज दोनों देशों के बीच कारोबार 142 अरब डॉलर को पार कर चुका है. हालांकि, चीन और अमेरिका के 660 अरब डॉलर के आंकड़े के मुकाबले यह काफी कम है.

    भारत को विदेशी कंपनियों को वो तमाम सुविधाएं भी देनी होंगी, जो चीन ने उन्‍हें मुहैया कराई थीं.


    इन तमाम बातों के बीच सवाल उठता है कि क्या भारत अमेरिकी कंपनियों को निवेश के लिए लुभा पाएगा? बता दें कि विदेशी निवेश मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में रहा है और मेक इन इंडिया नीति के तहत निवेश के तमाम रास्ते सरकार ने खोले हैं. पिछले छह साल में निवेश भी हुआ है. इनमें हाईवे व रोड ट्रांसपोर्ट, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में काफी अच्‍छा निवेश हुआ है. हालांकि, चीन और वियतनाम के मुकाबले भारत की रफ्तार कम रही है.

    इसलिए भारत में निवेश से कतराती रही हैं विदेशी कंपनियां
    ये सवाल क्‍यों उठा कि भारत विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए लुभा पाएगा या नहीं. दरअसल, भारत में विदेशी निवेशकों के अविश्वास के दर्जनों कारण हैं. इनमें राजनीतिक व व्यक्तिगत हित, गैर-जिम्मेदाराना निवेश, आर्थिक नीतियां, प्रोजेक्टों के आवंटन में दूरदर्शिता की कमी प्रमुख कारण माने जा सकते हैं. ओडिशा में दक्षिण कोरिया का पोस्को निवेश हो या आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावती के विकास में सिंगापुर का निवेश राजनेताओं व नौकरशाही के रवैये ने भारत में विदेशी निवेश की छवि को खराब किया है. यही वजह है कि चाहने के बावजूद आज सिंगापुर और दक्षिण कोरिया भारत में सिर्फ चुनिंदा सेक्टर से बाहर निवेश नहीं करना चाहते हैं. हालांकि, अमेरिकी कंपनियों के साथ सिंगापुर जैसा बर्ताव तो शायद ना हो लेकिन वो भारत में निवेश सुविधाओं की तुलना चीन से करेंगे. अब देखना ये है कि मेादी सरकार की 'ईज ऑफ बिजनेस' की कवायद इसमें कितना काम आती है.

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