आसान नहीं था लाल बहादुर शास्त्री के लिए भारत का प्रधानमंत्री बनना

पंडित नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) सभी की पसंद नहीं थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

पंडित नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) सभी की पसंद नहीं थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

9 जून को 1964 को लाल बहादुर शास्त्री (Lal bahadur Shastri) के रूप भारत (India) की जनता को देश का दूसरा प्रधानमंत्री मिला था. लेकिन उनका नेहरू (Jawahar Lal Nehru) का उत्तराधिकारी बनने आसान नहीं था.

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साल 1964 में जब 27 मई को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) का निधन हुआ तब उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था. देश की नई व्यवस्था में उत्तराधिकारी पहले से तय करने की कोई परंपरा या सिद्धांत नहीं था. ऐसे में नेहरू के निधन के बाद देश का दूसरा प्रधानमंत्री (Second Prime Minister of India) बनने के कई दावेदार या उम्मीदवार थे. ऐसे में लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) का प्रधानमंत्री बन जाना पहले से तय नहीं था और ना ही वे कोई बहुत ज्यादा ताकतवर दावेदार थे.

शास्त्री की स्थिति

शास्त्री का प्रधानमंत्री बनना संयोग भले ही नहीं कहा जाए. लेकिन उनका नेहरू का उत्तराधिकारी बनना स्वाभाविक भी नहीं था. वे एक गांधीवादी नेता थे. लेकिन उनका पार्टी में शीर्ष नेताओं के बीच प्रमुखता से छा जाना अचानक नहीं हुआ. कहा जाता है कि नेहरू ने अपने अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री रहते हुए शास्त्री को काफी जिम्मेदारियां सौंपनी शुरू कर दीं थीं, जिससे पार्टी में ये संदेश गया कि वो उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में तैयार कर रहे हैं.

और कौन थे दावेदार
उस समय प्रधानमंत्री पद की दौड़ में  गुलजारी लाल नंदा, जय प्रकाश नारायाण और मोरारजी देसाई शामिल थे जो शास्त्री की दावेदारी को कड़ी टक्कर दे रहे थे. गुलजारी लाल नंदा थे तब गृह मंत्री थे और इस लिहाज से मंत्रिमंडल में दूसरे स्थान पर थे. मोरारजी देसाई भी थे जिनका मंत्रिमंडल के बाहर बहुत गहरा प्रभाव था. जय प्रकाश नारायण का भी अपना करिश्माई व्यक्तित्व था.

शास्त्री या मोरारजी

शास्त्री के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह थी कि वे नेहरू के विश्वासपात्र थे. जब 1964 की शुरुआत में नेहरू जी बीमारी के कारण काम नहीं देख पा रहे थे तब उनका सारा काम शास्त्री जी ही देखा करते थे. नेहरू के बाद वैसे तो बहुत से नाम उछले लेकिन धीरे धीरे बात मोरारजी देसाई और शास्त्री  पर आकर टिक गई है.  उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष कामराज की सबसे बड़ी चिंता पार्टी की एकता को कायम रखना भी था.



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उस समय के बहुत से लोग यह मानते हैं कि शास्त्री को नेहरू ने अपना उत्तराधिकारी पहले से ही बनाने के संकेत दे दिए थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

शास्त्री कैसे पड़े भारी

शास्त्री और मोरारजी की दावेदारी के बीच शास्त्री का पलड़ा भारी होने की दो वजह बताई जाती हैं. एक खुद कामराज मोरारजी देसाई के पक्ष में नहीं थे, बल्कि खिलाफ ही थे. इसके अलावा मीडिया में एक खबर आई जिसके मुताबिक कहा गया कि मोरारजी देसाई को पक्ष में उनके समर्थक दावेदारी कर रहे हैं. इससे पार्टी में यह संदेश गया कि मोरारजी महत्वाकांक्षी नेता है. बताया जाता है कि यह खबर ही मोररजी के खिलाफ गई और अंततः शास्त्री के नाम पर मुहर लग गई.

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क्या वाकई बहुत असरदार थी वह खबर

मोरारजी देसाई की यह खबर मशहूर दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने प्रकाशित की थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘बियांड द लाइंस-एन आटोबॉयोग्राफी’ में भी अपनी इस खबर और उसके प्रभाव का जिक्र किया था. कहा यह भी जाता है कि इस खबर ने मोरराजी देसाई की छवि को बहुत प्रभावित किया था.  लेकिन कई लोग नहीं मानते की केवल इस खबर के आधार पर मोरारजी शास्त्री से पिछड़ गए थे.

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कई लोग यह भी बताते हैं शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं मानते थे. (फाइल फोटो)

शास्त्री का बड़ा कद

शास्त्री के पक्ष में नेहरू का नाम होना एक बहुत बड़ी वजह था जो उन्हें एक अलग ही कद दे गया था. दूसरा कामराज मोरारजी के पक्ष में तो नहीं थे, लेकिन उनका मानना था कि वे मोरारजी को चुनकर पार्टी की एकता को खतरे में डाल देंगे. खुद कामराज ने शास्त्री के चुने जाने पर बहुत खुशी जाहिर की थी.

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तमाम चर्चाओं के बाद मोरारजी देसाई को मनाया गया कि वे अपनी दावेदारी वापस ले लें. 31 मई 1964 को कांग्रेस कार्यसमिति ने लालबहादुर शास्त्री को नेहरू का उत्तराधिकारी यानि देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में चुन लिया. दिलचस्प बात यह है कि खुद शास्त्री अपने आप को दावेदार नहीं मानते थे उनका मानना था कि नेहरू का उत्तराधिकारी इंदिरा या जेपी नारायण हो सकते हैं. लेकिन इतिहास को कुछ और मंजूर था.

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