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आखिरी बार 1964 में कोई पीएम पहुंचे थे एएमयू, तब क्या संदेश गूंजा था?

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री.

देश के ऐतिहासिक और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में शुमार रही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दरो-दीवार नेहरू (Jawaharlal Nehru) ही नहीं, लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri Speech) के शब्दों के भी गवाह रहे हैं. पीएम मोदी के एएमयू में भाषण (PM Modi Speech at AMU) के मौके पर जानिए शास्त्री जी ने क्या कहा था?

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 22, 2020, 5:21 PM IST
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह (AMU Celebration) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बतौर मुख्य अतिथि पहुंचने से 56 साल पहले ऐसा मौका आया था, जब देश का प्रधानमंत्री (Indian Prime Minister) एएमयू के सालाना समारोह में चीफ गेस्ट के तौर पर पहुंचा था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एएमयू के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जो भाषण दिया था, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. लेकिन जब आप उस भाषण को पढ़ेंगे, समझेंगे तो जानेंगे कि वो तमाम बातें अब भी पुरानी नहीं लगतीं, लगता है कि आज के समय में भी यह भाषण महत्वपूर्ण है.

शास्त्री जी के इस भाषण को हिंदी में यहां पढ़ने के दौरान आपको याद रखना चाहिए कि यह भाषण उस समय दिया गया था, जब भारत और चीन युद्ध (India-China War) समाप्त हुआ ही था. देश प्रेम की एक लहर दौड़ रही थी तो दूसरी तरफ, पहले प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हुआ था. देश के सामने नवनिर्माण की चुनौती सामने थी तो दुनिया के लिहाज़ से विकास की मुख्यधारा में आने की भी.





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लालबहादुर शास्त्री ने 19 दिसंबर 1964 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भाषण दिया था, उसके अंश :
"भविष्य में आपका मुकाम जो भी हो, आप सबको खुद को सबसे पहले देश का नागरिक मानना चाहिए. इससे आपको संविधान के मुताबिक निश्चित अधिकार मिलेंगे, लेकिन अधिकारों के साथ जो कर्तव्य भी आपके हिस्से आएंगे, उन्हें भी ठीक से समझ लेना चाहिए.

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नेटवर्क18 क्रिएटिव


हमारे लोकतंत्र में आज़ादी की शर्त समाज के हित में कुछ कर्तव्यों के साथ जुड़ी है. एक अच्छा नागरिक वह है, जो कानून का पालन करे, तब भी जब कोई पुलिसकर्मी मौजूद न हो. पहले के ज़माने में आत्मसंयम और अनुशासन परिवार व शिक्षकों से मिलता था, लेकिन वर्तमान के आर्थिक तंगी वाले जीवन में अब यह मुमकिन नही रहा. चूंकि शैक्षणिक संस्थानों में भी संख्या बढ़ती जा रही है इ​सलिए शिक्षक और शिष्य के बीच व्यक्तिगत संपर्क की गुंजाइश कम हो गई है.

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होता यह है कि नौजवान छात्र अपने हिसाब से सीखने की स्थिति में आ जाते हैं और हम जानते हैं कि समस्याएं यहीं शुरू होती हैं. हमारी ज़िम्मेदारी जो भी हो, काम जो भी हो, हम उसे पूरी ईमानदारी और काबिलियत से करने का नज़रिया अपनाएं, यह युवा नागरिकों की महती भूमिका है. किसी और की आलोचना से पहले हमें देखना होगा कि क्या हमने अपना काम ठीक से पूरा किया!

आप ये कभी न भूलें कि देश के लिए वफादारी आपकी किसी भी वफादारी से पहले है. हमेशा याद रखिए कि पूरा देश एक है और जो भी बांटने या अलगाव की बात करे, वो हमारा सच्चा दोस्त नहीं है. एक लोकतांत्रिक देश किसी एक के नहीं बल्कि सहयोग के आधार पर सभी के प्रयासों से महान बन सकता है. देश का भविष्य आपके हाथों में है. अगर आप नागरिक के तौर पर सही होंगे तो देश का भविष्य भी सुनहरा होगा.


धर्मनिरपेक्षता को लेकर हमारा नज़रिया काफी साफ रहा है, जिसे दोहराने की ज़रूरत नहीं है. यह हमारे संविधान का हिस्सा है... विविधता के बावजूद भारत बुनियादी रूप से एक है, जिसे हम सभी स्वीकारते रहे हैं और आगे भी और मज़बूती से इस एकता को बरकरार रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. देश तभी तरक्की कर सकता है जब विभाजनकारी और अलगाववादी प्रवृत्तियों से पूरी तरह दूर रहा जाए. और शिक्षा के दौरान ही धर्मनिरपेक्षता के बीज बोने से सुफल मिल सकते हैं.

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दुनिया इस वक्त बहुत कठिन दौर में है. सच मानिए यह कहना गलत नहीं है कि मानवता के इतिहास में समस्याएं इतनी जटिल कभी नहीं रहीं, जितनी अब हैं. अगर हमने देर किए बगैर अब भी समाधान की तरफ सही कदम नहीं उठाए तो बात हाथ से निकल जाएगी. देशों ही नहीं, लोगों के समूहों के बीच से भी आपसी नफरत, अविश्वास और दुर्भावनाओं को मिटाना हर कीमत पर ज़रूरी हो गया है, लेकिन यह काम ताकत के ज़ोर से नहीं किया जा सकता.

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नेटवर्क18 क्रिएटिव


युद्ध और संघर्षों से किसी कीमत पर कोई हल नहीं निकलता, बल्कि समस्या और बढ़ती ही है. न्यूक्लियर और थर्मोन्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, अब हमें सोचना है कि हम इनका इस्तेमाल रचनात्मक ढंग से करें या विध्वंस के लिए.

भारत में, हमारी अपनी अलग समस्याएं हैं. हमारा लक्ष्य हर भारतीय की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना और आज़ादी से जीवन जीने का अवसर देना है. एक ऐसा लोकतांत्रिक समाज जहां सबके लिए एक समान स्थान हो, समान सम्मान हो और सेवा व तरक्की के लिए समान अवसर हों. हम भेदभाव व छुआछूत मिटा सकें.


आर्थिक असमानता की गहरी खाई को पाटना हमारा लक्ष्य होना चाहिए. हम नहीं चाहते ​कि सारी पूंजी कुछ हाथों में केंद्रित हो जाए. सदियों की हमारी महान सांस्कृतिक धरोहर किसी एक समुदाय की नहीं है, बल्कि इतिहास में जितने महान लोग यहां रहे हैं, उन सबके साझा योगदान का नाम हमारी संस्कृति है. मैंने यहां जितने लक्ष्य बताए हैं, उन्हें हासिल करना मामूली बात नहीं है. मुझे पता है कि इनमें से अभी हम कुछ ही हासिल कर सके हैं, लेकिन जब तक पूरी सफलता न मिले, तब तक दृढ़ संकल्पित रहना है.

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याद रखना चाहिए कि भारत की ज़्यादातर आबादी गरीब है और अल्पसंख्यक वही हैं, जो आराम और तमाम सुविधाओं की ज़िंदगी गुज़ार पाते हैं. हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और बाकी सभी समुदायो को भारतीय होकर, एकजुट होकर गरीबी से लड़ना चाहिए, बीमारियों से निपटना चाहिए और अशिक्षा से मुक्त होना चाहिए."
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