लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के दिनों में कैसे और क्यों बदल जाएगी भाषा, शोध ने बताया

लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के दिनों में कैसे और क्यों बदल जाएगी भाषा, शोध ने बताया
शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में जब दूसरे ग्रह या अंतरिक्ष में ही लोग लंबी यात्रा पर होंगे तब भाषा सहित बहुत सी समस्याओं का सामना करना होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

भाषाविदों की टीम ने बताया है कि भविष्य में जब लंबी अंतरिक्ष यात्राएं (Interstellar Travls) होंगी तब भाषा (Language) को लेकर कई तरह की समस्याएं आना तय है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 11, 2020, 12:57 PM IST
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एक समय यह केवल विज्ञान की फंतासी कथाओं (Science fiction) का हिस्सा ही था कि लोग एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर यात्रा (Interstellar travel) कर रहे हों. ये आज भी है, लेकिन अंतर यह है कि आज यह न केवल मुमकिन लग रहा है कि बल्कि इसे हकीकत में बदलने के लिए अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. ऐसे में जब लोग दूसरे ग्रहों में कॉलोनी बनाकर रहेंगे या फिर एक दो पीढ़ियों से एक अंतरिक्ष के किसी विशाल जहाज (Interstellar Ark) पर जीवन गुजारेंगे इस तक अनुसंधान हो रहा है. हाल ही में एक अध्ययन में भाषाविदों (linguistics) ने यह अध्ययन किया कि अलग-अलग जगहों पर रहने वाले लोगों को आपस में संवाद करते समय भाषा को लेकर  बहुत गंभीर समस्या आएगी.

क्या अध्ययन किया है
नए शोध में भाषाविद प्रोफेसरों की एक टीम ने यह अध्ययन किया कि जब समुदाय एक दूसरे से  समय के साथ भाषा का कैसे विकास होता है. Phy.org में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक अंतरिक्ष में विचरण करने वाले विशाल जहाजों का विचार आकर्षक तो है लेकिन उसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं. इन विशाल जहाजों के बारे में सोचा जा रहा है कि इनमें इंसान के साथ जानवर और पेड़ पौधे भी होंगे एक पूरा का पूरा जैवमंडल तक होगा. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसमें जब कई पीढ़ियां एक बंद पर्यावरण में पैदा होकर पनपेंगी तो उसकी वजह से कई जैविक समस्याएं और म्यूटेशन की सामना करना पड़ेगा.

भाषा पर दिया खास ध्यान
कांसस यूनिवर्सिटी में भाषाविज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रयू मैकेंजी और जेफ्री पुन्सके ने अंतरिक्ष में तारों के बीच होने वाली यात्राओं के दौरान भाषा पर पड़ने वाले प्रभाव पर प्रकाश डाल रहे हैं. लैंग्वेज डेवलपमेंट ड्यूरिंग इंटर्सटेलर ट्रैवल शीर्षक से उनका यह अध्ययन यूरोपीय स्पेस एजेंसी की एजवांस कॉन्सेप्ट टीम के जर्नल एक्टा फ्यूचरा में प्रकाशित हुआ है.



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फिलहला चांद और मंगल पर रहने लायक परिस्थितियां बनाने की तैयारी चल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


क्या हालात होंगे तब
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस बात की चर्चा की है कि अंतरिक्ष में अलग-अलग ग्रहों पर कॉलोनी बसने और तारों के बीच जब लंबी यात्राएं होंगी तब भाषा का विकास कैसे होगा. उनके मुताबिक यह संभव है कि इन कॉलोनी में रहने वालों की भाषा धरती पर रहने वाले लोगों को समझ में न आए, जब कभी वे मिलें.

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इतिहास से दी मिसाल
इस अध्ययन के दौरान मैकेंजी और पुन्सके ने पृथ्वी की अलग भाषा परिवारों कि मिसाल दी और बताया कि कैसे दूरी और समय के साथ नई भाषा का विकास हुआ. उन्होंने तीन से एक हजार ईसापूर्व के समय के दक्षिण  प्रशांत द्वीपों के पॉलीनेसियन समुद्री यात्रियों का उदाहरण दिया. इन समुद्री यात्रियों की जड़ें ताइवान से संबंध रखती हैं. विस्तार के काल में इसा पूर्व के एक हजार साल तक आते आते अलग ही संस्कृतियां विकसित हो गईं और जो भाषा विकसित हुई वह उनके पूर्वजों से पूरी तरह से अलग थी.

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नासा तो चंद्रमा पर बेस कैम्प बनाने की तैयारी कर रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


क्या किया जाना चाहिए
कांसस यूनिवर्सिटी के बयान के अनुसार, वैज्ञानिकों का करना है कि भविष्य के इंटरस्टेलर मिशन में भाषाविदों को शामिल किया जाना चाहिए जिन्हें प्रशिक्षिण मिला हो जिससे वे बता सकें कि संवाद में क्या अपेक्षा की जानी जाहिए. उन्होंने ऐसे माहौल में भाषा में होने वाले बदलावों के अध्ययन की भी अनुशंसा की जिससे लोग पहले से समझ सकें कि क्या उम्मीद की जानी चाहिए.

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ऐसी समस्याएं आना तय
शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि उनका अध्ययन से स्पष्ट है कि इस तरह की समस्याओं का आना तय है और ऐसे में क्रू सदस्यों का बहुभाषा प्रशिक्षिण बहुत जरूरी होगा. उनका मानना है कि ऐसे समय में भाषा के लिए विशिष्ट नीति की जरूरत होगी जिसके लिए पृथ्वी को नियमों को देखने की जरूरत न हो.
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