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पुण्यतिथि: आखिरी दिनों में ध्यानचंद के पास ना ज्यादा पैसे थे और ना खुशी

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 1:17 PM IST
पुण्यतिथि: आखिरी दिनों में ध्यानचंद के पास ना ज्यादा पैसे थे और ना खुशी
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के आखिरी दिन अच्छे नहीं बीते

हॉकी के जादूगर को बीमारी की हालत में ट्रेन से झांसी से दिल्ली लाया गया. जब उन्हें एम्स में भर्ती करने की कोशिश की गई तो शुरू में वार्ड भी नहीं मिला. उनके बेड को गलियारे में ही लगाया गया. बाद में वार्ड में बेड नसीब हुआ. आखिरी दिनों में वो आमतौर पर उपेक्षित थे. आर्थिक तौर पर बहुत अच्छी स्थिति नहीं थी

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  • Last Updated: December 3, 2019, 1:17 PM IST
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आखिर के दिनों में ध्यानचंद दुखी रहने लगे थे. वजह घरेलू हालत से लेकर खुद की बीमारी भी थी और साथ ही देश में हॉकी का गिरता स्तर भी. वह कहा करते थे, ''हिन्दुस्तान की हॉकी खत्म हो गई. दुख ने उन्हें खोखला करना शुरू कर दिया. इसी दौरान उनके छोटे भाई और प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी रूपसिंह का निधन हो गया. घर की आर्थिक स्थिति भी चिंता में डालने वाली थी. आज ही के दिन 1979 में दिल्ली में उनका निधन हो गया था.

ध्यानचंद को खेलजगत में समकालीन लोग दद्दा के नाम से संबोथित करते थे. घर की आर्थिक स्थिति उन्हें इसलिए चिंता में डाल रही थी, क्योंकि वो रिटायर हो चुके थे. बैंक में महज दस हजार रुपए बचे थे लेकिन जिम्मेदारियां कहीं ज्यादा बड़ी थीं.

दद्दा को अभी एक लड़की और तीन लड़कों की पढ़ाई - लिखाई तो करानी थी, साथ ही उनकी शादियां भी करनी थीं. इन हालात ने उस शख्स को जिंदगी के मैदान में करीब पराजित ही कर दिया, जिसने खेल जीवन के दौरान मैदान में नई ऊंचाइयां छूईं थीं.

वो बीमार पड़ गए

चिंता और सोच के कारण वह बीमार पड़ गए. उन्हें बाद के दिनों में देशवासियों, सरकार और हॉकी फेडरेशन द्वारा भुला दिए जाने पर भी सदमा लगा था. उन्हें महसूस होता था, जिस हॉकी के लिए उन्होंने तन-मन-धन से सेवा की. अपने परिवार को भी बाद में रखा, उसका उन्हें ये सिला मिला.

अंतिम दिनों में वह उदास शख्स में बदल चुके थे. उनके दुख और मानसिक उदासी को इस बात से समझा जा सकता है कि मरने से दो महीने पहले उन्होंने टिप्पणी की, '' जब मैं मरूंगा तो दुनिया मेरे लिए रोयेगी लेकिन भारत के लोग शायद ही मेरे लिए आंसू बहाएं, मैं उन्हें जानता हूं.''

अंतिम दिनों में वह उदास शख्स में बदल चुके थे. उनके दुख और मानसिक उदासी को इस बात से समझा जा सकता है कि मरने से दो महीने पहले उन्होंने टिप्पणी की, '' जब मैं मरूंगा तो दुनिया मेरे लिए रोयेगी लेकिन भारत के लोग शायद ही मेरे लिए आंसू बहाएं, मैं उन्हें जानता हूं.''
आखिरी दिनों में किसी ने सुध नहीं ली
कितनी अजीब बात है कि इतने महान हाकी खिलाड़ी होने के बावजूद न तो उन्हें कभी किसी आर्थिक मदद से नवाजा गया और न ही अंतिम दिनों में उनकी कमाई का कोई स्रोत था. सरकार ने जीवनपर्यंत कभी इस महान खिलाड़ी की सुध नहीं ली. हालांकि इसमें सरकार की जितनी कमी है, उतनी ही भारतीय हाकी फेडरेशन की भी, जिसने बाद के बरसों में उनके साथ लगातार उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया.

वह आत्मसम्मानी व्यक्ति थे. लिहाजा उन्होंने कभी किसी के आगे अपनी आर्थिक स्थिति का रोना भी नहीं रोया. कितनी सी अजीब सी बात है कि जिस महान खिलाड़ी ने बगैर किसी स्वार्थ के हॉकी से लगातार देश का ऊंचा किया, उसे भला क्यों यूं बिसरा दिया गया.

मरने से कोई छह महीने पहले उनके एक मित्र पंडित वैद्यनाथ शर्मा ने उनके लिए एक प्रस्ताविक विश्व दौरे की व्यवस्था की. इससे उन्हें लगा कि यूरोप और अमरीका के हॉकी प्रेमी उन्हें अपने बीच पाकर उनकी खेल के सुनहरे लम्हों को फिर याद कर सकेंगे. ये महान खिलाड़ी फिर लोगों के जेहन में अमिट रूप से छाप बना सकेगा. हवाई टिकट खरीदे जा चुके थे लेकिन ध्यानचंद इस स्थिति में नहीं थे कि जा पाएं.

पहले झांसी में इलाज चला
बीमारी के बाद काफी दिनों तक उनका इलाज मेडिकल कॉलेज, जर्मनी अस्पताल, झांसी में चला, परंतु हालत बिगड़ती चली गई. ये वर्ष 1978 की बात है. ध्यानचंद के कई विदेशी दोस्तों ने उन्हें यूरोप आकर इलाज करने की सलाह दी, इलाज का खर्च उठाने को वो सभी तैयार थे, लेकिन वह नहीं गए. उनका कहना था, अब इस दुनिया से उनका मन भर चुका है.

जब झांसी में उनकी हालत बहुत बिगड़ गई तो उन्हें ट्रेन से दिल्ली लाया गया. शुरू में एम्स में उन्हें वार्ड में बेड भी नहीं मिल सका. बाद में इसकी व्यवस्था हुई


बीमारी की हालत में ट्रेन से दिल्ली लाए गए
ये नवंबर 1979 की बात है, उनके बेटे अशोक कुमार देश में कहीं हॉकी खेल रहे थे, उन्हें पिता की गंभीर हालत के बारे में सूचना दी गई. तब उन्हें ट्रेन से झांसी से दिल्ली लाया गया, यहां उन्हें आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया.

उन्हें एम्स में तरीके का बेड भी नहीं मिल सका. शुरू में वार्ड में बेड नहीं मिलने पर उन्हें लॉबी में ही बेड मिला. बाद में वो वार्ड में शिफ्ट किए गए. क्या आप सोच सकते हैं कि राष्ट्रीय खेल के महानतम खिलाड़ी के साथ ये सलूक  मिलना चाहिए था.

एक हफ्ते तक जीवन-मौत के बीच जूझते रहे
23 नवंबर से 30 नवंबर तक वह बीमारी से लड़ते रहे. कभी ठीक हो जाते, कभी हालत बिगड़ जाती. घर वाले आस लगाए बैठे थे कि उनके बाबूजी ठीक हो जाएंगे और वो उन्हें फिर वापस झांसी ले जाएंगे. पूरा घर उनकी तीमारदारी के लिए झांसी से दिल्ली में आ चुका था. एम्स में उनके मेडिकल चेकअप के दौरान पता चला कि उन्हें लीवर कैंसर है.
अपने आखिरी दिनों में भी उन्होंने परिवारवालों को हिदायत दी वो उनके पदकों का ख्याल रखेंगे और ये ध्यान रखेंगे कि कोई उनके कमरे में नहीं जा सके औऱ पदकों को चुरा सके, क्योंकि इससे किसी ने उनके कमरे से कुछ पदकों की चोरी कर ली थी. इसके बावजूद झांसी में एक प्रदर्शनी से उनके ओलंपिक पदक किसी ने चुरा ही लिए, इसे बचाया नहीं जा सका.

ध्यानचंद को हॉकी फेडरेशन ने हाशिए पर डाल दिया था, जबकि उनका उपयोग बेहतर तरीके से किया जा सकता था


डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया था कि वह ठीक हो रहे हैं। उनकी सबसे छोटी बहू मीना उमेश ने अपनी किताब मेजर ध्यानचंद में लिखा, डॉक्टरों ने आश्वस्त किया हुआ था कि वह ठीक हो रहे हैं परंतु वह ठीक नहीं हो रहे थे, वह मौत से भी आंख-मिचौली खेल रहे थे.

मौत से जूझते समय भी हॉकी की बातें करते थे
26 नवंबर के बाद वह अर्द्ध बेहोशी की हालत में पहुंच गए थे.  मौत से जूझते समय भी वह हॉकी की ही बात किया करते थे, उनके प्रमुख चिकित्सक डॉक्टर वीएन टंडन के अनुसार, 26 नवंबर से वह अर्द्धबेहोशी की हालत में पहुंच गए थे और बहकी-बहकी बातें किया करते थे.
कोमा में जाने से पहले डॉक्टर से उनकी हॉकी को लेकर ही बात हुई थी. डॉक्टर ने पूछा, ''मेजर साहब, भारतीय हॉकी का भविष्य क्या है?'' , तो उन्होंने झुंझलाकर जवाब दिया, ''भारत में हॉकी खत्म हो चुकी है.''
''ऐसा क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?'', डॉक्टर ने हैरानी जाहिर की.

ध्यानचंद का जवाब था, हमारे खिलाड़ी अब खाना चाहते हैं, वो मेहनत नहीं करना चाहते. जवाब देते समय उनकी आंखें शून्य में कहीं निहार रही थीं, मानो आजाद भारत के खिलाडिय़ों में त्याग, कड़ी मेहनत, लगन और दृढइच्छाशक्ति ढूंढ रही थीं.

आखिर निकल पड़े ना आने वाली लंबी यात्रा पर 
मौत से जूझते हुए आखिरकार तीन दिसंबर की सुबह वह एक ऐसी लंबी यात्रा पर निकल गए, जहां से उन्हें कभी वापस नहीं आना था. ये खबर जब दिल्ली में फैली तो एम्स के बाहर भीड़ लगनी शुरू हो गई. ये भी विडंबना की बात है कि जब उन्हें दिल्ली इलाज के लिए लाया गया, तब उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि उन्हें ट्रेन से लाया जाए. हालांकि उनके पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए जरूर हेलीकॉप्टर की व्यवस्था तुरत फुरत कर दी गई.

अगले दिन यानि चार दिसंबर को सुबह ग्यारह बजे उनकी अंतिम यात्रा झांसी में शुरू हुई. इसमें न कोई राष्ट्रीय नेता था और न मंत्री. पंजाब रेजीमेंट में ध्यानचंद ने अपना अधिकांश समय बिताया था, संयोग से पंजाब रेजीमेंट उन दिनों झांसी में ही थी. इस रेजीमेंट ने उनके लिए सर्वोच्च सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की पूर्ण तैयारी की थी. सलामी गारद ने हथियार उल्टे किए. मातमी धुन बजी, और बंदूक दागकर गार्ड आफ आनर दिया गया. अंतिम सम्मान उस हीरोज ग्राउंड में किया गया, जहां वह हॉकी खेलते थे.

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First published: December 3, 2019, 1:17 PM IST
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