बच्चों पर जिंदगीभर के लिए बुरा असर छोड़ जाएगा लॉकडाउन

इस वीडियो को देखकर कुछ खास टिप्स की मदद से बच्चों को ड्रॉइंग (Drawing) सिखा सकते हैं.
इस वीडियो को देखकर कुछ खास टिप्स की मदद से बच्चों को ड्रॉइंग (Drawing) सिखा सकते हैं.

लॉकडाउन (Lockdown) बच्चों पर पूरी जिंदगी के लिए बुरा प्रभाव छोड़ सकता है. यूनाइटेड नेशंस (United Ntions) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर के बच्चे सबसे ज्यादा पीड़ित हैं

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कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में चल रहे लॉकडाउन का असर सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है. कई रिसर्च में खुलासा हो चुका है कि लॉकडाउन की वजह से लोगों की मेंटल हेल्थ पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. घरेलू हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी की खबरें दुनिया के लगभग हर देश से सामने आई हैं. इस बीच एक नई स्टडी में कहा गया है कि लॉकडाउन बच्चों पर पूरी जिंदगी के लिए बुरा प्रभाव छोड़ सकता है. ब्रिटेन में बड़े स्तर पैरेंट्स से हुई बातचीत में खुलासा हुआ है बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर लॉकडाउन का बुरा असर हुआ है. करीब 10 में से सात पैरेंट्स ने बताया है कि उनके बच्चों की मेंटल कंडीशन पर लॉकडाउन का असर पड़ा है वहीं एक तिहाई का मानना है कि उनके बच्चों का शारीरिक स्वास्थ्य पहले के मुकाबले खराब हुआ है.

यूनाइटेड नेशंस की इस संबंध में जारी की गई एक रिपोर्ट में बच्चों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर के बच्चे सबसे पीड़ित हैं. ये सच है कि कोरोना वायरस का प्रभाव बच्चों में कम देखा गया है लेकिन इस महामारी से उपजे साइड इफेक्ट्स ने बच्चों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है. कहा जा रहा है कि बड़ी संख्या में बच्चों पर इस महामारी के सामाजिक आर्थिक प्रभाव होंगे.

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प्रतीकात्मक तस्वीर




रिपोर्ट में कहा गया है कि इस महामारी का प्रभाव बच्चों पर असमान रूप से पड़ेगा. यानी अमीर देशों में इसका प्रभाव कम पड़ सकता है जबकि मध्यम और कम आय वाले देशों में इसका प्रभाव कहीं ज्यादा हो सकता है. मूल रूप से ऐसे देश जहां पर बच्चों को पहले से ही कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
चाइल्ड सेफ्टी रिस्क
लॉकडाउन के दौरान ऐसे बच्चों के हिंसा का शिकार होने का रिस्क बढ़ गया है जो गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं या फिर शरणार्थी बस्तियों में रहते हैं. पहले से जिंदगी की मुश्किलों से जूझ रहे इन बच्चों के सामने न सिर्फ गरीबी संकट है कि बल्कि हिंसा उनकी जिंदगी पर स्थाई बुरा असर छोड़ सकती है. यूएन की रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान वैसे बच्चों को भी रिस्क है जो इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. इस दौरान उन्हें अनुचित सामग्री देखने को मिल सकती है या फिर ऑनलाइन हैरेसमेंट भी हो सकता है.

बढ़ सकती है गरीबी
यूएन की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े के मुताबिक लॉकडाउन की वजह से बंद हुई आर्थिक गतिविधियों की वजह से दुनियाभर में करीब 4 से 6 करोड़ बच्चे गरीबी की चपेट में आ जाएंगे. इस संकट से पहले दुनियाभर में करीब 40 करोड़ बच्चे बहुत ज्यादा गरीबी में जी रहे हैं. इस संकट से उबरने का अभी कोई हल भी नहीं दिखता क्योंकि लॉकडाउन को कोरोना के खात्मे के लिए प्रमुख उपायों के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन इससे पैदा होने वाले आर्थिक नुकसान का असर न सिर्फ बड़ी उम्र की बच्चों पर हो रहा है बल्कि बच्चे भी इसकी चपेट में निश्चित तौर पर आएंगे.

प्रतीकात्मक तस्वीर


शिक्षा का संकट
लॉकडाउन ने बच्चों की शिक्षा पर भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है. दुनिया के करीब 188 देशों ने अपने यहां स्कूल बंद कर रखे हैं. अनुमान के मुताबिक इसकी वजह से दुनियाभर में करीब 150 करोड़ बच्चों की स्कूली शिक्षा बाधित हुई है. विकसित और विकासशील देशों में तो सरकारों ने इसका उपाय तलाशते हुए बच्चों के डिस्टेंस लर्निंग प्रोग्राम शुरू किए हैं. लेकिन गरीब देशों में ऐसा कर पाना संभव नहीं है. एक आंकड़े के मुताबिक गरीब देशों में सिर्फ 30 प्रतिशत बच्चों तक ही ये सेवाएं पहुंच पा रही हैं. वैसे भी दुनिया के करीब एक तिहाई बच्चे पहले से ही डिजिटल वर्ल्ड से वाकिफ नहीं हैं.

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर
लॉकडाउन की वजह से पैरेंट्स की नौकरी छूटने का असर भी बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर हो रहा है. माना जा रहा है कि इस लॉकडाउन की वजह से इन्फैंट मॉरटैलिटी रेट में भी तेजी आएगी. बीते सालों में किए गए प्रयास शायद इस साल बर्बाद हो जाएंगे. सबसे मुश्किल की बात है कि बड़ी संख्या में शिशु मृत्यु की गिनती भी नहीं की जा सकेगी क्योंकि गरीब देशों में कोरोना की वजह से अन्य मुद्दों पर ध्यान दे पाना मुश्किल हो रहा है.

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