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उस घातक फ्लू से दुनिया का हर चौथा शख्स हुआ था बीमार, गई थी 05 करोड़ लोगों की जानें

ये वायरस (virus) इतना खतरनाक था कि लक्षण सामने आने के 24 घंटों के भीतर एकदम स्वस्थ व्यक्ति की भी जान चली जाती थी.
ये वायरस (virus) इतना खतरनाक था कि लक्षण सामने आने के 24 घंटों के भीतर एकदम स्वस्थ व्यक्ति की भी जान चली जाती थी.

ये वायरस (virus) इतना खतरनाक था कि लक्षण सामने आने के 24 घंटों के भीतर एकदम स्वस्थ व्यक्ति की भी जान चली जाती थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 12, 2020, 5:25 PM IST
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स्पेनिश फ्लू (Spanish flu) कई मामलों में कोरोना (corona) से मिलती-जुलती बीमारी (disease) है. लगभग 100 साल पहले फैले फेफड़ों के इस संक्रमण (lung infection) से पूरी दुनिया में 50 करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए और लगभग 5 करोड़ लोग मारे गए. ये आंकड़ा पहले विश्व युद्ध (first world war) में मारे गए सैनिकों और आम लोगों की कुल संख्या से भी ज्यादा था. तब दुनिया की आबादी 180 करोड़ के आसपास थी. यानि दुनियाभर में हर चौथा शख्स इसकी चपेट में आ गया था.

कोरोना वायरस का संक्रमण अब तक 119,235 लोगों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है. मौत का आंकड़ा साढ़े 4 हजार पार कर चुका है. ऐसे में वैज्ञानिक इस बीमारी की तुलना साल 1918 में फैली बीमारी स्पेनिश फ्लू से कर रहे हैं. ये बीमारी कोविड 19 से कई मामलों में समान है, जैसे इसके लक्षण भी फ्लू जैसे होते हैं और इंफेक्शन धीरे-धीरे फेफड़ों तक फैल जाता है और अंततः न्यूमोनिया से मरीज की मौत हो जाती है.

बीमारी का इतिहास
साल 1918 में सबसे पहले मार्च के दूसरे हफ्ते में इस बीमारी का पहला मरीज सामने आया था. Albert Gitchell नाम का ये मरीज यूएम आर्मी में रसोइये का काम करता था. 104 डिग्री बुखार के साथ उसे कंसास के अस्पताल में भर्ती कराया गया. जल्द ही ये बुखार सेना के 54 हजार टुकड़ियों में फैल गया. मार्च के आखिर तक हजारों सैनिक अस्पताल पहुंच गए और 38 सैनिकों की गंभीर न्यूमोनिया से मौत हो गई.
मार्च के दूसरे हफ्ते में इस बीमारी का पहला मरीज सामने आया (सांकेतिक तस्वीर)




क्यों पनपा संक्रमण
दरअसल ये बीमारी सैनिकों में पहले विश्व युद्द के दौरान खंदकों, कैंपों में खराब हालातों में रहने की वजह से आई थी. लड़ाई तो 1918 के अंत तक खत्म हो गई लेकिन लगभग 4 सालों तक साफ-सफाई न मिलने और ठीक खाना न मिलने के कारण स्पेनिश फ्लू पनपा. माना जाता है कि फ्रांस के सीमावर्ती खंदकों में भयंकर गंदगी के कारण वायरस सैनिकों के फेफड़ों तक पहुंचा. लड़ाई के बाद घर लौटे सैनिक अपने साथ ये बीमारी लेकर लौटे. मई तक इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और इटली के सैनिक और आम लोग भी स्पेनिश फ्लू का शिकार हो चुके थे.

लॉक डाउन से परहेज
युद्द के बाद क्वेरेंटाइन का ठीक तरह से लागू न हो पाना भी इस बीमारी के फैलने की वजह बना. युद्द के बाद घर लौटने या लौटाए जाने की हड़बड़ी में खुद स्वास्थ्य अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की. माना जाता है कि उस वक्त कई मेडिकल ऑफिसर्स को अंदाजा हो गया था कि लॉकडाउन जरूरी है लेकिन उन्होंने ये लागू नहीं किया. इसी दौरान अमेरिका में नर्सों की खासी कमी हो गई क्योंकि ज्यादातर नर्सें दुनिया के युद्ध प्रभावित अलग-अलग हिस्सों में थी. उन्हें बुलाने में वक्त लगा. दूसरी तरफ American Red Cross ने अपने रंगभेद की वजह से उन अफ्रीकन नर्सों की सेवाएं लेने से मना कर दिया जो प्रशिक्षित थीं. जब तक उनकी सेवाएं लेनी शुरू हुईं, तब तक काफी देर हो चुकी थी.

स्पेन के पत्रकारों ने लिखी खबर
अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिक में सबसे पहले नजर आई इस बीमारी का नाम स्पेनिश फ्लू क्यों पड़ा, इसका इतिहास दिलचस्प है. पहले वर्ल्ड वार के दौरान स्पेन युद्द में न के बराबर जुड़ा हुआ था. फ्रांस, इंग्लैंड और अमेरिका की तरह यहां के अखबार भी सेंसरशिप से आजाद थे. ऐसे में सबसे पहले स्पेनिश अखबारों ने ही वायरस की खबर छापी, इसी वजह से इस बीमारी को स्पेनिश फ्लू नाम मिला.

सबसे पहले स्पेनिश अखबारों ने ही वायरस की खबर छापी (सांकेतिक तस्वीर)


फ्लू रुक-रुककर फैला
इसकी वजह ये रही कि उस दौरान हवाई यात्रा की बस शुरुआत ही हुई थी. ज्यादातर संक्रमित सैनिक पानी वाले जहाज, बस, रेलों के जरिए धीरे-धीरे घर लौट रहे थे या फिर घूम रहे थे. यही कारण है कि मार्च-अप्रैल के एकदम से बीमारी के मरीजों की संख्या में कमी आई. माना जाने लगा कि बीमारी खत्म हो रही है लेकिन अगस्त में इसका दूसरा दौर शुरू हुआ. तब ये फ्रांस, बोस्टन, यूएम और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तेजी से फैला. ये सारे प्रांत वही थे, जहां सैनिक लौटे थे.

Ohio State University के इतिहासकार James Harris ने पहले विश्व युद्द के दौरान फैली बीमारियों का अध्ययन किया है. वे कहते हैं- सैनिकों का यहां से वहां आना-जाना इस जानलेवा बीमारी के फैलने की वजह रहा. बीमारी की भयावहता इतनी ज्यादा थी कि अकेले अक्टूबर के महीने में 195,000 से ज्यादा अमेरिकनों की जान गई. दूसरी किसी भी बीमारी से अलग इस बीमारी में बच्चे-बूढ़े-जवानों और पूरी तरह से स्वस्थ लोगों की धड़ाधड़ जान जाने लगी. चिकित्सा जगत सकते में था कि कैसे 25 से 40 साल के लोग भी अस्पताल आने के 24 घंटों के भीतर मर रहे हैं. मरीजों के फेफड़ों में पानी भर जाता, तेज बुखार और नाक से रक्तस्त्राव के साथ उनकी मौत हो जाती.

स्पेनिश फ्लू जितनी खतरनाक और जानलेवा कोई भी बीमारी नहीं दिखी (सांकेतिक तस्वीर)


कैसे है कोरोना से अलग
COVID-19 की तरह ही स्पेनिश फ्लू भी सीधे फेफड़ों पर हमला करता था. हालांकि कोरोना और इसमें एक बड़ा फर्क रहा. कोरोना वायरस जहां कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को संक्रमित करता है, वहीं स्पेनिश फ्लू इतना खतरनाक था कि लक्षण सामने आने के 24 घंटों के भीतर ये एकदम स्वस्थ व्यक्ति की भी जान ले सकता था. दुनिया में इसके बाद भी कई महामारियां फैलीं लेकिन स्पेनिश फ्लू जितनी खतरनाक और जानलेवा कोई भी बीमारी नहीं दिखी.

नहीं था माइक्रोस्कोप
माना जाता है कि इस बीमारी ने 5 करोड़ से भी ज्यादा लोगों की जान ले ली. मेडिकल स्टाफ भी इसके लिए टीका तैयार नहीं कर सका क्योंकि किसी वायरस को देखा जा सके, ऐसा माइक्रोस्कोप तक उस दौर में नहीं था, साल 1930 में पहली बार इतने सूक्ष्म वायरस को देख सके, ऐसा माइक्रोस्कोप तैयार हुआ. तब उस दौर के टॉप डॉक्टरों का मानना था कि ये बीमारी Pfeiffer’s bacillus नामक बैक्टीरिया से फैलती है, जबकि असल में ये बीमारी Influenza A virus subtype H1N1 नामक वायरस से फैलती है जो इंफ्लुएंजा वायरस की एक श्रेणी है. बैक्टीरिया जन्य बीमारी मानते हु्ए वैज्ञानिकों ने इलाज में करोड़ों रुपए बहाए लेकिन चूंकि बीमारी वायरसजन्य थी इसलिए इसका इलाज नहीं हो सका और जानें जाती रहीं.

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