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न करें ऐसे चुनावी पोस्ट वरना फेसबुक-ट्विटर लेंगे ऐसे एक्शन

न करें ऐसे चुनावी पोस्ट वरना फेसबुक-ट्विटर लेंगे ऐसे एक्शन

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दुनिया भर के लोकतंत्रों में चुनावों के वक्त सोशल मीडिया के गलत तरह से इस्तेमाल का खतरा बढ़ा है. चुनाव आयोग ने आज फेसबुक. ट्विटर और गूगल आदि कंपनियों के प्रतिनिधियों को मीटिंग के लिए बुलाया है.

    दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में होने वाले चुनावों में मात्र 3 महीने का वक्त बचा हुआ है. इससे पहले निर्वाचन आयोग सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों से मिल रहा है. मंगलवार को होने वाली इस मीटिंग में आचार संहिता लागू होने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आने वाली समस्याओं के बारे में बातें होंगीं.

    दो हफ्ते पहले, इंटरनेट और मोबाइल एसोशिएसन ऑफ इंडिया (IAMAI) निर्वाचन आयोग को समस्या समाधान के तौर-तरीकों में शामिल करने और इन प्लेटफॉर्म (सोशल मीडिया) पर दूसरे चुनाव संबंधी शैक्षणिक कार्यक्रमों को चलाने के लिए राजी हुआ था.

    क्यों हो रहा है ऐसा?
    इस साल जनवरी में उप मुख्य चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के नेतृत्व में निर्वाचन आयोग के 14 प्रतिनिधियों की टीम ने रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट के सेक्शन 126 में बदलाव के सुझाव दिए थे. इस सेक्शन में वोटिंग के दो दिन पहले से चुनाव प्रचार की मनाही की गई है. इस टीम ने 'प्रचार थम जाने के बाद' सोशल मीडिया और न्यू मीडिया के प्रभाव का अध्ययन किया था और आचार संहिता में इसके अनुसार बदलाव के सुझाव दिए थे. वैसे अभी तक सोशल मीडिया और न्यू मीडिया सेक्शन 126 के अंतर्गत नहीं आते हैं.

    दो हफ्ते पहले, द इंटरनेट एंड मोबाइल एसोशिएसन ऑफ इंडिया (IAMAI), जो फेसबुक, ट्विटर, गूगल, वॉट्सऐप और शेयरचैट का भारत में प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है, वह इस मामले में निर्वाचन आयोग के सदस्यों के साथ बातचीत कर रही है. ये मिलकर एक कोड ऑफ एथिक्स बनाने का प्रयास कर रहे हैं. साथ ही यह निर्वाचन आयोग की शिकायतों को अपने समस्या समाधान के सिस्टम में तवज्जो देने के लिए राजी हो गए हैं. साथ ही ये चुनावों से जुड़े शैक्षणिक प्रोग्राम भी चलाएंगे.

    9 मार्च को चुनाव आयोग ने कहा था कि पार्टियां और उम्मीदवार सैनिकों की तस्वीरों का चुनावी प्रचार के लिए प्रयोग नहीं करेंगे. जिसके बाद फेसबुक ने ऐसे सारे चुनावी पोस्टरों को हटाने का आदेश दिया था जिस पर विंग कमांडर अभिनंदन की तस्वीर बनी थी और उसे बीजेपी नेताओं ने शेयर किया था.

    शुक्रवार को निर्वाचन आयोग ने फेसबुक, वॉट्सऐप, ट्विटर, गूगल, शेयरचैट और टिक-टॉक को मंगलवार की मीटिंग के लिए आमंत्रित किया था. इसके जरिए निर्वाचन आयोग शिकायतों पर चर्चा करने के लिए एक प्रक्रिया बनाना चाहता है. इसके अलावा चुनाव आयोग का मकसद सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल को रोकना है. चुनाव आयोग इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ एक नोटिफिकेशन मैकेनिज्म भी बनाना चाहता है ताकि चुनाव आयोग प्रचार थम जाने के तुरंत बाद चुनावों के बारे में जागरुकता फैला सके और आचार संहिता के मामलों पर गौर कर सके.

    किन मसलों हो रही है बात?
    निर्वाचन आयोग ने हर राजनीतिक विज्ञापन इन प्लेटफॉर्म पर पोस्ट किए जाने से पहले, मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (MCMCs) से अनुमति लेने की बात कही थी. हालांकि IAMAI ने इसके लिए मना कर दिया था. उसका कहना था कि यह जिम्मेदारी प्रचारकर्ता की होनी चाहिए न कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की. IAMAI ने इस बाबत 2004 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि पार्टियों और उम्मीदवारों को टीवी पर चुनाव प्रचार करने से पहले उसे चुनाव आयोग को दिखाना जरूरी है. और ऐसा करने के लिए उन्हें अपने लीगल सेफ हार्बल के नियमों को भी त्यागना होगा जिसके जरिए जब तक इन प्लेटफॉर्म्स के ध्यान में न लाया गया हो, वे खुद पर उपलब्ध कंटेंट के लिए जिम्मेदार नहीं होतीं.

    अपनी रिपोर्ट में IAMAI ने कहा था कि चुनावों के पहले 48 घंटे के वक्त में चुनाव प्रचार से संबंधित सामग्री को निर्वाचन आयोग की शिकायत के बाद 3 घंटों के अंदर हटाना होगा. और अगर तय समय में ऐसा नहीं होता तो उन्हें इसका जवाब देना होगा.

    'राजनीतिक प्रचारक' किसे माना जाए. इस मसले पर भी बात हो सकती है. IAMAI के निर्वाचन आयोग को दिए जवाब में यह मसला भी नहीं सुलझा है कि 'राजनीतिक प्रचारक' किसे माना जाएगा? क्या उसे भी एक राजनीतिक प्रचारक माना जाएगा जो दूसरे के पोस्ट को बूस्ट या प्रमोट यानि शेयर करेगा?

    निर्वाचन आयोग को इन कंपनियों से भी साझा करनी होगी कानूनी समस्या. पिछले हफ्ते जब निर्वाचन आयोग ने फेसबुक से कुछ कंटेट हटाने को कहा था तो फेसबुक ने जवाब दिया था कि जरूरी कानूनी जानकारियां आयोग की तरफ से उसे नहीं दी गई हैं कि इस कंटेंट में क्या कानूनी समस्या है?

    2019 के लोक सभा चुनावों में सोशल मीडिया क्यों इतना मायने रखता है?
    2013 में निर्वाचन आयोग ने सोशल मीडिया के बारे में बात करना शुरू किया था. लेकिन तबसे सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों की संख्या में बहुत बढ़ोत्तरी हो चुकी है. IAMAI के अनुसार भारत में इंटरनेट प्रयोग करने वालों की संख्या पिछली बार के मुकाबले बिल्कुल दोगुनी होकर भारत में अब करीब 50 करोड़ लोगों तक पहुंच चुकी है.

    राजनीतिक दलों ने भी ऑनलाइन प्रचार में बहुत बढ़ोत्तरी कर दी है. फेसबुक एडवरटीजमेंट पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार यहां पर राजनीतिक प्रचार के लिए दलों ने 24 फरवरी और 9 मार्च के बीच करीब 10 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही इस दौरान अपने सोशल मीडिया वालंटियर और एकाउंट्स में बहुत बढ़ोत्तरी कर ली है.

    इसके अलावा फेसबुक के मामले में कैम्ब्रिज एनलिटिका जैसी कंपनियों ने चुनावी प्रचार में सोशल मीडिया की भूमिका को और संदिग्ध बना दिया है. ऐसे में सोशल मीडिया के प्रतिनिधियों को जब अमेरिकी और यूरोपीय सरकारें पूछताछ के लिए बुला चुकी हैं, भारत सरकार भी इन कंपनियों से सवाल पूछना शुरू कर चुकी है. इसी साल की शुरुआत में ट्विटर भी दक्षिणपंथ विरोधी गतिविधियों के आरोपों का निशाना बन चुका है.

    यह भी पढ़ें: दिल्ली से ज्यादा है यूपी और बिहार के वोटों की कीमत, जानें क्यों?

    Tags: Election commission, Facebook, General Election 2019, Google, Lok Sabha Election 2019, Twitter

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