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Madan Lal Dhingra Death anniversary: क्या किया था मदन लाल ढींगरा ने देश के लिए?

Madan Lal Dhingra Death anniversary: क्या किया था मदन लाल ढींगरा ने देश के लिए?

मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) ने देश के लिए फांसी पर चढ़ कर जान दी थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) ने देश के लिए फांसी पर चढ़ कर जान दी थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) देश के उन चुनिंदा क्रांतिकारियों (Revolutionary) में से एक थे जिन्होंने देश के लिए जान देते देते लाखों देशवासियों के दिल में देश प्रेम का जज्बा जगाते हुए एक मिसाल कायम की. 1909 में उन्होंने लंदन में ब्रिटिश अधिकारी विलियम हट कर्जन वायली (William Hutt Curzon Wyllie) को मारा जिसके बाद गिरफतार होने पर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. इस पर दिए गए उनके बयान ने ना केवल भारतवासी बल्कि आयरिश स्वतंत्रता आंदोलनकर्ताओं को भी प्रेरित करने का काम किया.

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन (Indian Freedom Movement) के दौरान क्रांतिकारियों का अपना योगदान हुआ करता था. एक क्रांतिकारी जब किसी जालिम अंग्रेज अफसर की जान लेता था तो उससे देश के कई नौजवानों में देशभक्ति कि भावना जागती थी और लोग अंग्रेजों के जुल्म से खिलाफ खड़े होने लगते थे. चाहे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू के द्वारा किया गया लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के प्रयास में सांडर्स हत्याकांड हो या फिर क्रांतिकारी ऊधम सिंह द्वारा माइकल ओ डायर की हत्या. इन घटनाओं ने युवाओं में एक संकल्पशक्ति का संचार किया था. ऐसा ही कुछ क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) ने भी किया था. उन्होंने इंग्लैंड में जाकर ब्रिटिश अधिकारी विलियम हट कर्जन वायली (William Hutt Curzon Wyllie) की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

कॉलेज में राष्ट्रवाद की भावना
मदनलाल ढींगरा का जन्म 18 फरवरी 1883 को पंजाब के अमृतसर में, हिंदू पंजाबी खत्री परिवार में हुआ था. उनके पिता डॉ दित्तामल ढींगरा एक सिविल सर्जन थे और मदल लाल आठ भाई-बहन थे. सभी भाइयों की शिक्षा देश के बाहर हुई थी. लेकिन उससे पहले मदनलाल ने अमृतसर के एमबी इंटरमीडिएट कॉलेज और उसके बाद लाहौर के गर्वनमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी, जहां वे राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हुए जो उस समय होम रूल की मांग कर रहा था.

स्वराज और स्वदेशी आंदोलन की भावना
ढींगरा के मन पर पर देश की गरीबी को देख कर बहुत असर हुआ. उन्होंने देश में गरीबी और सूखे के व्यापक हालात को समझने के लिए साहित्य का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि इस समस्या का एक ही समाधान है और वह है स्वराज और स्वदेशी आंदोलन. उन्हें स्वदेशी आंदोलन को अपनाने का फैसला किया जिसका लक्ष्य भारतीय उद्योगों की आत्मनिर्भरता बढ़ाना और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार करना था.

अंग्रेजों के विरोध की शुरुआत
ढींगरा ने पाया कि देश में औपनिवेशिक सरकार की औद्योगिक और वित्तीय नीतियों को इस तरह से तैयार किया गया है जिससे स्थानीय उद्योग का दमन हो सके और ब्रिटिश आयात को लाभ मिल सके. उन्होंने पाया कि भारत के विकास की कमी सबसे बड़ा कारण भी यही है. साल 1904 में ढींगरा ने एमए की पढ़ाई के दौरान प्रिंसिपल के उस आदेश के खिलाफ छात्रों की अगुआई की जिसमे उन्होंने कॉलेज के छात्रों को ब्रिटेन से आयातित कपड़े का ब्लेजर पहनने का आदेश दिया था. इसके लिए उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था.

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मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) ने लंदन में विलियम हट कर्जन वायली की हत्या की थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

पिता से अलगाव
ढींगरा के पिता एक सरकारी पद पर थे और इस तरह के विरोध के खिलाफ थे. उन्होंने मदनलाल से माफी मांगने को कहा जिससे उन्हें कॉलेज में वापस दाखिला मिल सके, लेकिन मदनलाल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया यहां तक कि वे इस मामले में पिता से चर्चा करने घर तक नहीं लौटे और अपने अनुसार ही जीवन जीने के लिए शिमला के पास कालका में कलर्क की नौकरी करने लगे. इसके  बाद वे एक फैक्ट्री में मजदूर की तरह काम करने लगे जहां उन्होंने मजदूरों की यूनियन बनाने का प्रयास किया और उससे पहले ही नौकरी से निकाल दिए गए. यहां से निकलने के बाद वे बंबई चले गए जहां कुछ समय के लिए छोटे मोटे काम करते रहे.

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लंदन में क्रांतिकारियों से मुलाकात
इसी दौरान उनके बड़े भाई डॉ बिहारी लाल ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाने के लिए मना लिया और 1906 में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लिया जिसका खर्चा उनके भाई ने उठाया था. लंदन में ही ढींगराकी मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा से हुई जो उनकी देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए. उस समय खुदीराम बो, कन्हाई लाल दत्त, सतिंदर पाल और काशीराम जैसे क्रांतिकारियों को मृत्युदण्ड की सजा से इन लोगों में बहुत रोष पैदा हुआ और ढींगरा ने इसका बदला लेने का फैसला कर लिया.

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मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) का अदालत में फांसी की सजा सुनाए जाते समय दिया गया बयान आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

विलियम हट कर्जन वायली की हत्या
ढींगरा को मौका एक जुलाई 1909 की शाम को मिला जब इंडियन नेशनल एसोसिएशन के सालाना जलसे में भाग लेने के लिए बहुत से भारतीय और अंग्रेज जमा हुए जिनमें भारतीय सचिव के राजनैतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली भी थी. ढींगरा ने इस मौके का फायदा उठाया और उनके चेहरे पर पांच गोलियां दागीं जिसमें से चार निशाने पर लगीं. इसके बाद ढींगरा ने खुद को गोली मारने का प्रयास भी किया लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया.

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ढींगरा पर हत्या का मुकदमा चलाया. उन्होंने खुद की पैरवी की और अदालत की वैधता को ही मानने से इनकार कर दिया. अदालत ने उन्होंने मृत्युदण्ड की सजा सुनाई जिसके बाद 17 अगस्त 1909 को लंदन के पेंटविले जेल में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया और मदनलाल ढींगरा अमर हो गए. अदालत में ढींगरा के दिए गए बयान ने ना केवल भारत के बल्कि आयरिश स्वतंत्रता आंदोलन के लोगों  में प्रेरणा भरने का काम किया.

Tags: Freedom Movement, History, India, Research, Revolutionary Freedom Fighter

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