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क्या महाराष्ट्र में भी चलेगा 14 साल पुराना बिहार वाला राजनीतिक दांव

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: November 15, 2019, 9:35 AM IST
क्या महाराष्ट्र में भी चलेगा 14 साल पुराना बिहार वाला राजनीतिक दांव
2005 में बिहार में महाराष्ट्र जैसा राजनीतिक संकट पैदा हुआ था

14 साल पहले बिहार (Bihar) में आज के महाराष्ट्र (Maharashtra) जैसे राजनीतिक हालात थे. 2005 के विधानसभा चुनाव (assembly election) नतीजों में किसी को बहुमत नहीं मिला था...

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  • Last Updated: November 15, 2019, 9:35 AM IST
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महाराष्ट्र (Maharashtra) में सरकार बनाने के लिए शिवसेना (Shiv Sena), एनसीपी (NCP) और कांग्रेस (Congress) संभावनाएं तलाश रही है. तीनों पार्टियां सरकार बनाने के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (common minimum programme) का खाका खींचने की कोशिश में लगी हैं. उधर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक याचिका दायर कर शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के बीच चुनाव बाद गठबंधन को सत्ता हासिल करने के लिए वोटर्स से की गई धोखेबाजी घोषित करने की मांग की गई है.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद वहां की राजनीति पल-पल बदल रही है. 2005 में बिहार में कुछ वैसे ही राजनीतिक हालात बन गए थे जैसे आज महाराष्ट्र में हैं. फरवरी 2005 में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए थे. चुनाव नतीजों में किसी को बहुमत हासिल नहीं हुआ था.

2005 में बिहार में थे महाराष्ट्र वाले राजनीतिक हालात

जेडीयू-बीजेपी मिलकर चुनाव लड़ी थी और दोनों को कुल 92 सीटें हासिल हुई थीं. जेडीयू ने 55 और बीजेपी ने 37 सीटों पर जीत हासिल की थी. आरजेडी को 75 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. बिहार विधानसभा में बहुमत साबित करने का आंकड़ा 122 सीटों का था.

महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को बहुमत हासिल है. हालांकि नतीजों के ऐलान के बाद सीएम की कुर्सी की मांग को लेकर शिवसेना गठबंधन से बाहर हो चुकी है. लेकिन 2005 में बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं था. 27 फरवरी 2005 को बिहार विधानसभा के नतीजे घोषित हुए थे. किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं था. रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को 29 सीटें हासिल हुई थीं. सत्ता की चाबी उनके पास थी.

maharashtra government formation 14 years ago bihar had same political crisis
2005 के चुनाव में जेडीयू को 55 सीटें मिली थी.


बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह पर लगे थे आरोप
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वो चाहते तो एनडीए या यूपीए में से किसी एक की सरकार बन सकती थी. लेकिन रामविलास पासवान केंद्र की यूपीए सरकार का हिस्सा होते हुए भी भ्रष्टाचार के सवाल पर लालू विरोधी थे. इसलिए यूपीए की सरकार नहीं बन पा रही थी. उसी तरह से जेडीयू के साथ बीजेपी का गठबंधन होने की वजह से रामविलास पासवान, नीतीश कुमार का भी समर्थन नहीं कर रहे थे.

उस वक्त बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह थे. उन्होंने 7 दिनों तक इंतजार किया. उसके बाद केंद्र से राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी. अप्रैल मध्य में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया. गठबंधन ने अपने साथ 115 विधायकों के समर्थन का दावा पेश किया. लेकिन बूटा सिंह ने उन्हें सरकार बनाने का न्यौता नहीं दिया.

बूटा सिंह ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर कहा कि जेडीयू-बीजेपी गठबंधन रामविलास पासवान की एलजेपी के विधायकों को खरीदने की कोशिश कर रही है. बूटा सिंह पर उस वक्त यूपीए सरकार में शामिल रहे लालू प्रसाद यादव के इशारे पर काम करने का आरोप लगा.

बूटा सिंह ने की थी विधानसभा भंग करने की सिफारिश

इसके एक महीने बाद बूटा सिंह ने केंद्र से बिहार विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी. 21 मई 2005 को बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की और दिल्ली में तुरत-फुरत उस पर कार्रवाई शुरू हो गई. 22 मई 2005 को दिल्ली में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के सीनियर नेताओं की बैठक हुई.

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बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह पर केंद्र सरकार के इशारों पर काम करने का आरोप लगा था


मनमोहन सरकार ने बूटा सिंह की सिफारिश को इतनी गंभीरता से लिया था कि आधी रात को कैबिनेट की बैठक हुई. बैठक में बूटा सिंह की सिफारिश को मानते हुए बिहार में विधानसभा भंग करने का फैसला हुआ. रातोंरात तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को विधानसभा भंग करने के कैबिनेट के फैसले का फैक्स भेजा गया. एपीजे अब्दुल कलाम उन दिनों रूस की यात्रा पर थे. मॉस्को में ठहरे एपीजे अब्दुल कलाम ने फैक्स मिलने के महज 2 घंटे के भीतर बिहार विधानसभा भंग करने की सिफारिश मान ली और अपनी सहमति दे दी.

सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा भंग करने के फैसले को गैरसंवैधानिक माना था

बिहार विधानसभा भंग करने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई. एनडीए केंद्र सरकार के फैसले का विरोध कर रही थी. याचिका पर अक्टूबर 2005 में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा भंग करने को गैरसंवैधानिक माना. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

चुनाव आयोग ने नए चुनाव का ऐलान कर दिया था. अक्टूबर 2005 में बिहार विधानसभा का नए सिरे से चुनाव हुआ. इस बार जनता ने जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को पूरा बहुमत दिया. इस पूरे घटनाक्रम में बूटा सिंह की बड़ी फजीहत हुई. आरोप लगे कि यूपीए सरकार के इशारे पर बूटा सिंह ने जानबूझकर बिहार में एनडीए की सरकार नहीं बनने दी थी.

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First published: November 15, 2019, 9:35 AM IST
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