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महाराष्ट्र में बन गई बीजेपी की सरकार या दलबदल कानून फंसा देगा पेंच?

News18Hindi
Updated: November 23, 2019, 10:39 AM IST
महाराष्ट्र में बन गई बीजेपी की सरकार या दलबदल कानून फंसा देगा पेंच?
देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार ने शपथ तो ले ली है लेकिन क्या मामला दल-बदल कानून में फंस सकता है?

बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) ने सीएम पद के तौर पर दोबारा शपथ ले ली है और डिप्टी सीएम बने हैं शरद पवार के भतीजे अजित पवार (Ajit Pawar). बताया जा रहा है कि अजित पवार के पास कुल 20 से 25 विधायकों का समर्थन है. लेकिन दलबदल कानून (Anti Defection Law) के मुताबिक ये संख्या फिट नहीं बैठती.

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  • Last Updated: November 23, 2019, 10:39 AM IST
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मुंबई. महाराष्ट्र की राजनीति (Maharashtra Politics) में बड़ा उलटफेर हुआ है. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के एक धड़े ने मिलकर सरकार बना ली है. बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस ने सीएम पद के तौर पर दोबारा शपथ ले ली है और डिप्टी सीएम बने हैं शरद पवार के भतीजे अजित पवार. बताया जा रहा है कि अजित पवार के पास कुल 20 से 25 विधायकों का समर्थन है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार ने साफ कर दिया है कि ये फैसला उनकी अनभिज्ञता में लिया गया है. कहा जाता है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार की इच्छा के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता लेकिन हालिया केस में स्थिति बिल्कुल उलट है. अब यह भी माना जा रहा है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इसका विरोध भी दर्ज करा सकती है.

एनसीपी का रुख क्या होगा?
अगर राष्ट्रवादी पार्टी के विधायकों के टूटने को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी कोर्ट का रुख करती है तो क्या ये मामला दल-बदल कानून में फंस सकता है? ये सवाल भी सभी तरफ उठने लगे हैं. वर्तमान दल-बदल कानून के मुताबिक अगर एक पार्टी के सदस्य अगर दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहते हैं तो कम से दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ती है. बीते विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की 54 सीटें आई थीं. सीटों की संख्या और मौजूदा कानून के मुताबिक अगर अजित पवार को बीजेपी के साथ मिलना है तो कुल 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. लेकिन मौजूदा दावे तो सिर्फ 20 से 25 विधायकों का ही किया जा रहा है. सदन में बहुमत साबित करने के लिए 30 नवंबर तक का समय दिया गया है.


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क्या है मौजूदा दल-बदल कानून
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची को दल बदल विरोधी कानून कहा जाता है. इसे 1985 में 52वें संशोधन के साथ संविधान में शामिल किया गया था. दल बदल कानून की जरूरत तब महसूस हुई जब राजनीतिक लाभ के लिए लगातार सदस्यों को बगैर सोचे समझे दल की अदला बदली करते हुए देखा जाने लगा. अवसरवादिता और राजनीतिक अस्थिरता बहुत ज्यादा बढ़ गई थी, साथ ही जनादेश की अनदेखी भी होने लगी. इस कानून के तहत-कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करे/ यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से त्यागपत्र दे/ कोई निर्दलीय, चुनाव के बाद किसी दल में चला जाए/ यदि मनोनीत सदस्य कोई दल ज्वाइन कर ले तो उसकी सदस्यता जाएगी.

1985 में कानून बनने के बाद भी जब अदला बदली पर बहुत ज्यादा शिकंजा नहीं कस पाया तब इसमें संशोधन किए गए. इसके तहत 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे असंवैधानिक करार दिया जाएगा. इसके अलावा इसी संशोधन में धारा 3 को भी खत्म कर दिया गया जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. अब ऐसा कुछ करने के लिए दो तिहाई सदस्यों की रज़ामंदी की जरूरत होगी.

मौका देखकर दल बदलने वाले नेताओं पर शिकंजा कसने के लिए बना दल बदल कानून
मौका देखकर दल बदलने वाले नेताओं पर शिकंजा कसने के लिए बना दल बदल कानून


यही अहम प्रावधान महाराष्ट्र की मौजूदा स्थिति पर भी फिट बैठता है, जो सदन में किसी भी पार्टी के दो तिहाई से कम विधायकों को तोड़ने से रोकता है. अब ये निर्भर करता है कि शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इसे लेकर क्या रुख अख्तियार करती है. शरद पवार को लेकर शिवसेना की तरफ से भी भरोसा जताया जा चुका है. शिवसेना के नेता संजय राउत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा है कि उन्हें शरद पवार पर भरोसा है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया है.
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First published: November 23, 2019, 10:18 AM IST
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