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दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में क्यों लगी है भगवान शिव की मूर्ति

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Updated: February 21, 2020, 12:05 PM IST
दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में क्यों लगी है भगवान शिव की मूर्ति
सर्न में लगी नटराज की मूर्ति

स्विटजरलैंड स्थित दुनिया के सबसे बड़े फीजिक्स लैब ने अपने परिसर में नटराज की मूर्ति लगा रखी है. नटराज भगवान शिव (Lord Shiva) का ही एक रूप हैं.

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  • Last Updated: February 21, 2020, 12:05 PM IST
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भगवान शिव (Lord Shiva) हिंदुओं के देवता हैं. उन्हें ब्रह्मांड (Universe) में जीवन (Life) का आधार माना गया है. जीवन के अस्तित्व (creation) से लेकर अंत (destruction) तक सबमें शिव की अवधारणा समाई है. जीवन की सबसे बड़ी उर्जा हैं शिव. इस बात की वैज्ञानिक भी अपने तरीके से व्याख्या करते हैं. हिंदू पुराणों में शिव की अवधारणा को लेकर कुछ वैज्ञानिकों ने अपने स्पष्ट दृष्टिकोण दिए हैं. शायद इसलिए किसी को हैरानी नहीं होती कि दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला ने अपने यहां भगवान शिव की मूर्ति लगा रखी है.स्विटजरलैंड में दुनिया की सबसे मशहूर फिजिक्स लैब सर्न (CERN) के परिसर में भगवान शिव की मूर्ति है. वैज्ञानिक इस मूर्ति को लगाने के पीछे कई तरह के तर्क देते हैं. ये आस्था और विज्ञान के मेल सरीखा दिखता है.

सर्न में कहां से आई भगवान शिव की मूर्ति
सर्न परिसर में लगी नटराज की मूर्ति 2 मीटर लंबी है. 2004 में भारत सरकार ने फीजिक्स लैब सर्न को तोहफे में ये मूर्ति दी थी. 18 जून 2004 को इस मूर्ति का अनावरण किया गया. एक प्रयोगशाला में भगवान की मूर्ति का क्या काम? इस सवाल का वैज्ञानिक तार्किक जवाब देते हैं.

इस मूर्ति के नीचे लगी पट्टी पर फ्रिटजॉफ कैप्रा की कुछ पंक्तिया लिखी हैं. फ्रिटजॉफ कैप्रा ने भगवान शिव की अवधारणा की व्याख्या करते हुए लिखा है- हजारों साल पहले भारतीय कलाकारों ने नाचते हुए शिव के चित्र बनाए. कांसे के बने डांसिंग शिवा की सीरीज में मूर्तियां हैं. हमारे वक्त में हम फीजिक्स की एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की मदद से कॉस्मिक डांस को चित्रित करते हैं. कॉस्मिक डांस का रूपक पौराणिक कथाओं से मेल खाता है. ये धार्मिक कलाकारी और मॉर्डन फिजिक्स का मिश्रण है.



भगवान शिव को लेकर क्या कहते हैं वैज्ञानिक


फ्रिटजॉफ कैप्रा मशहूर भौतिकविज्ञानी हैं. वो द ताओ ऑफ फिजिक्स में शिव की अवधारणा के साथ विज्ञान के मेल को लेकर लिखते हैं- शिव का नाचता हुआ रूप ब्रह्मांड के अस्तित्व को रेखांकित करता है. शिव हमें याद दिलाते हैं कि दुनिया में कुछ भी मौलिक नहीं है. सबकुछ भ्रम सरीखा और लगातार बदलने वाला है. मॉर्डन फिजिक्स भी इस बात की याद दिलाता है कि सभी सजीव प्राणियों में निर्माण और अंत, जन्म और मरण की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है. ये इनऑर्गेनिक मैटर्स पर भी लागू होता है.

भौतिक विज्ञानी फ्रिटजॉफ कैप्रा आगे लिखते हैं- क्वॉन्टम फिल्ड थ्योरी के मुताबिक किसी भी पदार्थ का अस्तित्व ही निर्माण और अंत के नृत्य पर आधारित है. मॉर्डन फीजिक्स इस बात को उजागर करता है कि सभी सबएटॉमिक पार्टिकल ना सिर्फ एनर्जी डांस करते हैं, बल्कि ये एनर्जी डांस ही निर्माण और संहार को संचालित करता है. मॉर्डन फिजिक्स के लिए शिव का डांस सबएटॉमिक मैटर का डांस है. ये सभी तरह के अस्तित्व की कुदरती अवधारणा है.

सर्न के वैज्ञानिक भगवान शिव से लेते हैं प्रेरणा
दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला में लगी भगवान शिव की मूर्ति से वैज्ञानिक प्रेरणा ग्रहण करते हैं. एक बार इस प्रयोगशाला में काम करने वाले रिसर्च स्कॉलर ने कहा था कि शिव की मूर्ति उन्हें प्रेरणा देती है. दिन के उजाले में जब सर्न जीवन के साथ ताल से ताल मिलाता है तो शिव इसके साथ खेलते हुए दिखते हैं. शिव हमें याद दिलाते हैं कि ब्रह्मांड में लगातार चीजें बदल रही हैं. कोई भी चीज स्थिर नहीं है. वहीं रात के अंधियारे में जब हम इसपर गहराई से विचार करते हैं तो शिव हमारे काम से उजागर हुई चीजों की परछाइयों से रूबरू करवाते हैं.

शिव की मूर्ति पर जताई गई थी आपत्ति
कुछ लोगों ने एक प्रयोगशाला में शिव की मूर्ति लगाने पर आपत्ति भी दर्ज करवाई थी. कुछ संकीर्ण विचारधारा वाले ईसाइयों ने सर्न से पूछा था कि उन्होंने अपने इंस्टीट्यूट में हिंदू देवता की मूर्ति क्यों लगा रखी है. ये सवाल उस वक्त और ज्यादा उठने लगे जब 2013 में प्रयोगशाला में हीग्स बॉसन की खोज हुई थी, जिसे गॉड पार्टिकल का नाम दिया गया था.

हालांकि सर्न ने इन सवालों के जवाब भी दिए थे. सर्न की तरफ से कहा गया था कि भारत इस प्रयोगशाला का एक ऑब्जर्वर देश है. ये सर्न की बहुसंस्कृतिवाद को रेखांकित करता है. दुनियाभर के वैज्ञानिक इसे अपनेआप से जोड़ सकते हैं.

दुनिया का सबसे मशहूर फीजिक्स लैब सर्न कई देशों के सहयोग से चलाया जा रहा है. इसमें भारत का सहयोग भी शामिल है.

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First published: February 21, 2020, 12:05 PM IST
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