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बापू की हत्या पर ऐसे हुई थी कोर्ट में सुनवाई, नाथूराम गोडसे ने खुद लड़ा था केस

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: January 30, 2020, 10:57 AM IST
बापू की हत्या पर ऐसे हुई थी कोर्ट में सुनवाई, नाथूराम गोडसे ने खुद लड़ा था केस
30 जनवरी 1948 को बापू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के हत्यारों के खिलाफ कोर्ट (Court) में सुनवाई चली. हत्यारों के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई अपील में शामिल रहे जज जीडी खोसला ने इस पूरे मामले की सुनवाई को लेकर बाद में एक किताब लिखी, इसमें सुनवाई का पूरा ब्यौरा मौजूद है...

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  • Last Updated: January 30, 2020, 10:57 AM IST
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भारतीय जनमानस को 30 जनवरी 1948 का काला दिन हमेशा याद रहेगा, जब नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) ने महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की गोली मारकर हत्या कर दी थी. 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में बापू रोज की तरह शाम के 5 बजे प्रार्थना के लिए निकले थे. प्रार्थना के लिए जाने के दौरान ही नाथूराम गोडसे ने पहले आगे बढ़कर  बापू के पैर छुए और उसके बाद अपने सेमी ऑटोमेटिक पिस्टल से एक के बाद एक तीन गोलियां उनके सीने में दाग दी.

अचानक हुई इस घटना से भीड़ में मौजूद लोग सन्न रह गए. भीड़ ने नाथूराम गोडसे को पकड़ लिया और उसे पीटना शुरू कर दिया. एक पुलिसवाले ने उसे भीड़ से बचाया और उसे कस्टडी में ले लिया गया. इसके बाद बापू की हत्या के जुर्म में 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी दे दी गई.

कैसे चली बापू की हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई
महात्मा गांधी के हत्यारों के खिलाफ कोर्ट में सुनवाई चली. हत्यारों के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई अपील में शामिल रहे जज जीडी खोसला ने इस पूरे मामले की सुनवाई को लेकर बाद में एक किताब लिखी. 1965 में लिखी उस किताब में बापू की हत्या और उसके बाद हत्यारों के खिलाफ चली सुनवाई का पूरा ब्यौरा मौजूद है.

जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी किताब में लिखा है कि नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी को हिंदू विरोधी मानता था. उसका मानना था कि बापू ने मुसलमानों का तुष्टिकरण करके हिंदुओं के साथ विश्वासघात किया है. बदले की कार्रवाई में ही नाथूराम गोडसे ने बापू की गोली मारकर हत्या कर दी.

नाथूराम गोडसे ने कैसे बनाई थी बापू की हत्या की योजना
जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी किताब में लिखा है कि बापू की हत्या की योजना 13 जनवरी को ही बना ली गई थी. बंटवारे के बाद भारत को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने थे. भारत सरकार ने वो 55 करोड़ रुपए रोक लिए थे. भारत सरकार के इस फैसले के खिलाफ बापू अनशन पर बैठ गए थे. बापू के इस निर्णय ने उनकी हत्या की साजिश में लगे लोगों के दिलों की नफरत और बढ़ा दी.
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प्रार्थना के लिए जाते वक्त बापू पर बरसाई गई थी गोलियां


जीडी खोसला ने लिखा है कि बापू की हत्या की फूलप्रूफ प्लानिंग की गई थी. गोडसे ने 2 हजार और 3 हजार रुपए के दो लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रखी थी. 13 जनवरी को उसने अपनी पहली पॉलिसी के नॉमिनी के तौर पर अपने साथी नारायण आप्टे की पत्नी का नाम दर्ज करवाया. दूसरे दिन उसने अपनी दूसरी पॉलिसी भी नारायण आप्टे के पत्नी के नाम कर दी.

बापू की हत्या की केस फाइल के मुताबिक 30 जनवरी 1948 के 10 दिन पहले भी हत्यारों ने उनकी हत्या की कोशिश की थी. लेकिन वो नाकाम रहे थे. इसके बाद गोडसे और उसके साथी नारायण आप्टे ने 30 जनवरी का दिन चुना था. नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के हौसले का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 200 लोगों की भीड़ में बापू को उन्होंने गोली मारी.

पुलिस ने हत्या की जांच में लगाए 5 महीने
बापू की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. नाथूराम गोडसे को दिल्ली के तुगलक रोड पुलिस स्टेशल ले जाया गया. एक पत्रकार को पुलिस स्टेशन की सेल में बंद नाथूराम गोडसे से बात करने का मौका मिला. उसने पूछा कि क्या आपको कुछ कहना है? नाथूराम गोडसे ने जवाब दिया- ‘फिलहाल मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि मुझे अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है. बाकी बातें मैं कोर्ट में कहूंगा.’

इसके बाद साजिश में शामिल दूसरे आरोपियों की तलाश शुरू हुई. पुलिस ने हत्या की जांच में 5 महीने लगा दिए. इसके बाद लाल किले में बने ट्रायल कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई. जज आत्मा चरण की कोर्ट में नाथूराम गोडसे पर मामला चला.

एक साल बाद ट्रायल कोर्ट ने सुनाया फैसला
ट्रायल कोर्ट ने बापू की हत्या मामले पर 10 फरवरी 1949 को अपना फैसला सुनाया. जज आत्मा चरण ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सजा सुनाई. बापू की हत्या की साजिश में शामिल बाकी 5 दोषियों को उम्रकैद की सजा दी गई.

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नाथूराम गोडसे


इसके बाद दोषियों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में अपील की. जस्टिस जीडी खोसला तीन जजों की बेंच में शामिल थे. नाथूराम गोडसे ने सजा के खिलाफ अपील नहीं की थी और न ही उसने अपने ऊपर लगे हत्या के इल्जाम को चुनौती दी थी. गोडसे की अपील सिर्फ इस बात का पता लगाने की थी कि ये एक साजिश थी.

अपील में नाथूराम गोडसे ने खुद लड़ा अपना केस
जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी किताब में लिखा है कि 'आमतौर पर हाईकोर्ट के नियम कायदों के मुताबिक हत्या के मामलों में दो जजों की बेंच सुनवाई करती थी. लेकिन ये इतना बड़ा मामला था, मामले की संवेदनशीलता इतनी अधिक थी, गवाह और सबूत इतने थे और पूरे देश के लिए ये इतना अहम मामला था कि उस वक्त चीफ जस्टिस ने तीन जजों की बेंच गठित की. इस बेंच में जस्टिस भंडारी, जस्टिस अछरूराम और मैं (जस्टिस जीडी खोसला) शामिल थे. हमने तय किया मामले की अहमियत को देखते हुए पुरानी परंपराओं का पालन नहीं करेंगे. हमने जजों द्वारा पहने जाने वाला विग नहीं पहना. बाकी तामझाम से भी परहेज किया.'

जस्टिस खोसला ने लिखा है कि 2 मई 1949 को अपील पर पहली सुनवाई हुई. इसमें नाथूराम गोडसे ने वकील लेने से इनकार कर दिया और उसने अपना केस खुद लड़ा. खोसला लिखते हैं कि नाथूराम गोडसे अपनी चमकीली आंखों, छोटे कटे बाल और छोटी काया में आकर्षित करने वाला था. वो अपने साथियों का पक्ष रखने वाले वकीलों के साथ खड़ा था. जिस गरीबी की दलील पर नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में व्यक्तिगत तौर पर मौजूद रहने की अपील की थी, वो सिर्फ एक बहाना थी. इसके पीछे उसका मकसद खुद को निर्भीक दिखाना और हिंदूवादी विचारधारा के नायक के तौर पर खुद को देश के सामने रखना था. वो अपने अपराध को लेकर बेपरवाह था. उसे अपने किए पर पछतावा नहीं था. सिर्फ एक बार औपचारिक तौर पर उसने सार्वजनिक रूप से लोगों से माफी मांगी और गुमनामी में खत्म होने के बजाए अपनी प्रतिभा प्रदर्शित किए जाने का अवसर देने की अपील की.

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अपील में नाथूराम गोडसे ने खुद की थी अपनी पैरवी


कोर्ट में काम नहीं आई नाथूराम गोडसे की दलील
कोर्ट में नाथूराम गोडसे की दलीलें काम नहीं आई. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 21 जून 1949 को 315 पन्ने के अपने जजमेंट में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे की फांसी की सजा बरकरार रखी. इसके बाद गोडसे और उसके परिवार ने प्रिवी काउंसिल में अपील की. प्रिवी काउंसिल ब्रिटिश पार्लियामेंट का हिस्सा हुआ करती थी. इसमें किसी अपील के आने पर ज्यूडिशियल कमिशन का गठन होता था. 26 अक्टूबर 1949 को प्रिवी काउंसिल ने गोडसे की अपील खारिज कर दी. प्रिवी काउंसिल से अपील खारिज होते ही फांसी की तारीख 15 नवंबर 1949 तय हो गई.

इसके बाद गोडसे के परिवार ने तत्कालीन गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी के सामने दया याचिका लगाई. हालांकि इस बारे में कहा जाता है कि दया याचिका की जानकारी गोडसे को नहीं थी. परिवार वालों ने उसे अंधेरे में रखकर दया याचिका लगाई थी. 5 नवंबर 1949 को गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी के सामने दया याचिका आई. दो दिन बाद 7 नवंबर को उन्होंने दया याचिका खारिज कर दी. इसके बाद 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को अंबाला जेल में फांसी पर लटका दिया गया.

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First published: January 30, 2020, 10:57 AM IST
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