Dandi March: गांधी जी ने और क्या-क्या कहा था इस ‘तीर्थ यात्रा’ के बारे में

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने दांडी यात्रा के दौरान खुद को एक तीर्थ यात्री बताया था. (तस्वीर: Wikimedia commons)

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने दांडी यात्रा के दौरान खुद को एक तीर्थ यात्री बताया था. (तस्वीर: Wikimedia commons)

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने 12 मार्च को 25 दिन के दांडी मार्च (Dandi March) को एक तीर्थ यात्रा (Pilgrimage) करार दिया था इसके अलावा उन्होंने इसके दौरान अपने संकल्प को कई तरह से दोहराया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 12, 2021, 11:22 AM IST
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दांडी मार्च (Dandi Marh) की सालगिरह पर देश अपनी आजादी के 75 साल पूरे होने के उत्सवों की शुरुआत कर रहा है. साल1930 को अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने दांडी यात्रा की शुरुआत की थी. यह यात्रा अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नमक सत्याग्रह (Namak Satyagraha) की शुरुआत थी जिसे सविनय अवज्ञा आंदोलन भी कहा जाता है. दांडी मार्च के शुरु होने से पहले और उसके बाद गांधी जी ने अपने आंदोलन के बारे में चर्चा करती रहे.

वायसराय की बेरुखी पर

इससे पहले दो मार्च 1930 को बापू ने वायसराय को वह ऐतिहासिक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने नमक कानून वापस ना लेने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ने की बात कही ती. उनके विचार में यह पूरी तरह से गरीबों का शोषण के लिए बनाया गया कानून था. इस खत पर वायसराय के रूखेपन के बारे में बात करते हुए बापू ने कहा था कि उन्होंने झुक कर रोटी मांगी थी जिसके बदले में पत्थर मिला.

दांडी मार्च शुरू होने से पहले
दांडी मार्च से पहले का समय काफी तनावपूर्ण था. सरदार वल्लभ भाई पटेल गिरफ्तार हो चुके थे. सत्याग्रहियों ने बापू के साथ साबरमती के तट पर अपने कार्यक्रम को जारी रखने की शपथ ली. दांडी मार्च की पूर्व संध्या पर प्रार्थना सभा में दस हजार लोग जमा हुए जहां बापू ने अपना भाषण दिया. उन्होंने साबरमती के लोगों से कहा था कि यह उनका साबरमती में आखिरी  भाषण है. अगर सरकार उन्हें दांडी मार्च की अनुमति देती भी है तो भी साबरमती में उनके जीवन का यह उनका आखिरी भाषण होगा.

यात्रा के पहले का वे दृश्य

यात्रा के दौरान बापू का एक बयान नवजीवन में 16 मार्च को प्रस्थान शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. इसमें उनका बयान था, “अहमदाबाद के हाजारों नागरिक, दोनों स्त्री और पुरुष, ने 11 तारीख की रात को निगरानी रखी थी. हजारों लोग आश्रम में जमा हुए थे. .. हम चंदोला झील तक चले. मैं उस दृश्य को नहीं भूल सकता.



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गांधी जी (Gandhiji) दांडी पहुंच कर नमक कानून तोड़ते हुए. (तस्वीर: Wikimedia commons)


यात्रा का पहला दिन

यात्रा का पहला दिन अहमदाबाद से 13 मील दूर असलाली पर खत्म हुआ गांधीजी ने तब वहां जमा हुए लोगों से कहा, “यात्रा शुरू होते ही पहले जत्थे के सैनिकों ने अपनी नावें जला दी थीं” उन्होंने कहा कि जब तक नमक कानून वापस नहीं लिया जाएगा और स्वराज की विजय नहीं होगी वे वापस नहीं लौटेंगे. बाद में दांडी मार्च पर बोलते हुए गांधीजी ने कहा, “मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अमरनाथ या बद्री केदार की तीर्थ यात्री हूं. मेरे लिए यह किसी पवित्र तीर्थ यात्रा से कम नहीं है.”

जब शुरू हुई थी ऐतिहासिक दांडी यात्रा की शुरुआत

एक पवित्र तीर्थयात्रा

61 साल की उम्र में दांडी यात्रा कर रहे गांधीजी की ऊर्जा बहुत शानदार थी. रोज वे 10 मील से ज्यादा चलते थे. इसके अलावा आश्रम की दैनिक प्रार्थना, चरखा कातना और दैनिनदिनी लिखना भी नहीं छोड़ते थे. उन्होंने कहा था, “हमारी एक पवित्र तीर्थ यात्रा है और इसके लिए हमें अपने हर मिनट का सदुपयोग करना होगा.”

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दांडी मार्च और महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) को भारी जनसमर्थन मिला था. (तस्वीर: Wikimedia commons)


धार्मिक आंदोलन क्यों था

27 मार्च को यंग इंडिया के अंक में गांधीजी ने ‘अनिष्ठा का कर्तव्य’ शीर्षक से छपे लेख में कहा कि सक्रिय निष्ठा और और सक्रिय अनिष्ठा के बीच का की रास्ता नहीं है. बेशक इतने भ्रष्ट राज्य के प्रति निष्ठा एक पाप है. यह सब उन्होंने 18 मार्च के अपने बोरसाद के भाषण के संदर्भ में कहा था जहां उन्होंने दांडी मार्च को एक धार्मिक आंदोलन कहा था.

जब महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर की हुई मुलाकात

नमक कानून तोड़ते समय बापू ने घोषणा करते हुए कहा, “अब तकनीकी रूप से नमक कानून टूट गया  है. अब यह कानून सभी लोग नमक बना कर तोड़ सकते हैं. लोग अब जहां चाहें और जब चाहें नमक बना सकते हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि 1920 को आधी तैयारी थी, लेकिन इस बार यह अंतिम युद्ध है. अब भारत के स्वाभिमान जैसे सत्याग्रहियों के हाथ में है.
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