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शुरू से ही जिद्दी और जुझारू रही हैं ममता, इस नेता की कार पर चढ़कर पाई थी सुर्खियां

शुरू से ही जिद्दी और जुझारू रही हैं ममता, इस नेता की कार पर चढ़कर पाई थी सुर्खियां

ममता बनर्जी (News18)

ममता बनर्जी (News18)

ममता के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डालें तो साफ़ हो जाता है कि पहले भी कभी वो बड़े से बड़े नेता से टकराने में कभी नहीं घबराई...

    पश्चिम बंगाल में पुलिस और सीबीआई के बीच जारी हाईप्रोफाइल ड्रामे के बीच संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा होती नज़र आ रही है. सीएम ममता बनर्जी केंद्र सरकार और सीबीआई के रवैये के खिलाफ धरने पर बैठ गई हैं और देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि केंद्रीय जांच एजेंसी के पांच अधिकारियों को किसी राज्य की पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. ममता बनर्जी ने पूरे मामले में सीधे बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा किया है. ममता के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डालें तो साफ़ हो जाता है कि पहले भी कभी वो बड़े से बड़े नेता से टकराने में कभी नहीं घबराई.

    कार पर चढ़ गईं थीं ममता
    ममता ने भले ही अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी, लेकिन बाद में उन्होंने बंगाल से कांग्रेस को ख़त्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ममता को जब कोई नहीं जानता था और वे बंगाल कांग्रेस की युवा नेता थीं, तभी उन्होंने समाजवादी आंदोलन के मुखिया जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर विरोध किया था और राष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गई थीं.



    बता दें कि ममता बनर्जी अपने स्कूली दिनों से ही राजनीति से जुड़ी हुई हैं. सत्तर के दशक में उन्हें राज्य महिला कांग्रेस का महासचिव बनाया गया. इस समय में वे कॉलेज में पढ़ ही रही थीं. ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वह बहुत छोटी थीं, तभी उनकी मृत्यु हो गई थी. बताया जाता है कि गरीबी से संघर्ष करते हुए उन्‍हें दूध बेचने का काम भी करना पड़ा. उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में, अपनी मां की मदद करने का यही अकेला तरीका था.

    दक्षिण कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से ममता बनर्जी ने इतिहास में ऑनर्स की डिग्री हासिल की है. बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इस्लामिक इतिहास में मास्टर डिग्री ली. श्रीशिक्षायतन कॉलेज से उन्होंने बीएड की डिग्री ली, जबकि कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्‍होंने कानून की पढ़ाई की.

    सोमनाथ चटर्जी की हार और ममता का उदय
    ममता का सक्रिय राजनीतिक सफर साल 1970 में शुरू हुआ, जब वे कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता बनीं. 1976 से 1980 तक वे महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं. 1984 में ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराकर सबको चौंका दिया. सोमनाथ उस दौरान सीपीएम की पहली पंक्ति के नेताओं में से एक थे और इस जीत के साथ ममता देश की सबसे युवा सांसद भी बन गई थीं.



    ममता की हार
    सोमनाथ चटर्जी को हारने के बाद ममता बनर्जी को अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया. लेकिन 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर के कारण जादवपुर लोकसभा सीट पर ममता को मालिनी भट्टाचार्य के खिलाफ वो हार गईं. इसके बाद 1991 के चुनाव में उन्होंने कोलकाता दक्षिण संसदीय सीट से जीत हासिल की. दक्षिणी कलकत्ता (कोलकाता) लोकसभा सीट से सीपीएम के बिप्लव दासगुप्ता को हराकर वह लगातार 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में इसी सीट से लोकसभा सदस्य चुनी गईं.

    कांग्रेस से अलगाव और तृणमूल कांग्रेस
    साल 1991 में कोलकाता से लोकसभा के लिए चुनी गईं ममता को केंद्रीय मंत्रीमंडल में भी मौका मिला. वह नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्य मंत्री बनीं. वह नरसिम्हा राव सरकार में खेल मंत्री भी बनाई गईं. खेल मंत्री के तौर पर उन्होंने देश में खेलों की दशा सुधारने को लेकर सरकार से मतभेद होने पर इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी.



    इस वजह से 1993 में उन्हें इस मंत्रालय से छुट्‍टी दे दी गई. अप्रैल 1996-97 में उन्होंने कांग्रेस पर बंगाल में सीपीएम की कठपुतली होने का आरोप लगाया और 1997 में कांग्रेस से अलग हो गईं. इसके अगले ही साल 1 जनवरी 1998 को उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस बनाई. वह पार्टी की अध्यक्ष बनीं. 1998 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने 8 सीटों पर कब्‍जा कर कांग्रेस और सीपीएम के लिए चुनौती पेश की.

    ऐसे शुरू हुआ बीजेपी विरोध
    साल 2001 की शुरुआत में बीजेपी के खिलाफ हुए एक स्टिंग के खुलासों के बाद ममता नाराज़ हो गईं और उन्होंने अपनी पार्टी को एनडीए से अलग कर लिया. लेकिन जनवरी 2004 में वे बिना कोई स्पष्ट कारण बताए सरकार में शामिल हो गईं. 20 मई 2004 को आम चुनावों के बाद पार्टी की ओर से केवल वे ही चुनाव जीत सकीं. अब की बार उन्हें कोयला और खान मंत्री बनाया गया. 20 अक्टूबर 2005 को उन्होंने राज्य की बुद्धदेव भट्‍टाचार्य सरकार द्वारा औद्योगिक विकास के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीनें हासिल किए जाने का विरोध किया.



    ममता को लगा झटका
    साल 2005 में ममता को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा. उनकी पार्टी ने कोलकाता नगर निगम पर से नियंत्रण खो दिया और उनकी मेयर ने अपनी पार्टी छोड़ दी. 2006 में विधानसभा चुनावों में भी तृणमूल कांग्रेस के आधे से अधिक विधायक चुनाव हार गए. नवंबर 2006 में ममता को सिंगूर में टाटा मोटर्स की प्रस्तावित कार परियोजना स्थल पर जाने से जबरन रोका गया. इसके विरोध में उनकी पार्टी ने धरना, प्रदर्शन और हड़ताल भी किया.

    साल 2009 के आम चुनावों से पहले ममता ने फिर एक बार यूपीए से नाता जोड़ लिया. इस गठबंधन को 26 सीटें मिलीं और ममता फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गईं. उन्हें दूसरी बार रेल मंत्री बना दिया गया. रेल मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल लोकलुभावन घोषणाओं और कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है. 2010 के नगरीय चुनावों में तृणमूल ने फिर एक बार कोलकाता नगर निगम पर कब्जा कर लिया.

    ममता की जीत और यूपीए से किनारा
    साल 2011 में टीएमसी ने 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की. ममता राज्य की मुख्यमंत्री बनीं और 34 वर्षों तक राज्‍य की सत्ता पर काबि‍ज वामपंथी मोर्चे का सफाया हो गया. ममता की पार्टी ने राज्‍य विधानसभा की 294 सीटों में से 184 पर कब्‍जा किया. केंद्र और राज्य दोनों ही जगहों पर अपनी पैठ जमाने के बाद ममता ने 18 सितंबर 2012 को यूपीए से अपना समर्थन वापस ले लिया. इसके बाद नंदीग्राम में हिंसा की घटना हुई. सेज (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) विकसित करने के लिए गांव वालों की जमीन ली जानी थी.



    माओवादियों के समर्थन से गांव वालों ने पुलिस कार्रवाई का प्रतिरोध किया, लेकिन गांव वालों और पुलिस बलों के हिंसक संघर्ष में 14 लोगों की मौत हो हुई. ममता ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री शिवराज पाटिल से कहा कि बंगाल में सीपीएम समर्थकों की हिंसक गतिविधियों पर रोक लगाई जाए. बाद में जब राज्य सरकार ने परियोजना को समाप्त कर दिया, तब हिंसक विरोध भी थम गया. लेकिन इस दौरान केंद्र और कांग्रेस से उनके मतभेद शुरू हो गए.



    क्‍यों रहीं जीवनभर कुंवारी
    एक सवाल बार-बार उठता है कि ममता बनर्जी ने कभी शादी क्यों नहीं की, उम्र भर कुंवारी क्यों रहीं? दरअसल स्वभाव से बागी ममता सामाजिक परंपराओं की विरोधी भी हैं. शादी में एक औरत की स्थिति से उनका इत्तेफाक नहीं था और उन्होंने जीवन भर समाज सेवा का भी वचन लिया था. बाद में समाजसेवा के लिए उन्‍होंने कभी शादी ना करने का फैसला ले लिया.

    सफ़ेद साड़ी का सच
    आपने अकसर नीली कन्‍नी वाली सफेद साड़ी में ही ममता बनर्जी को देखा होगा. इसके पीछे ये वजह है कि जब 9 साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हुआ था तो उस समय वो बहुत गरीब थे। गरीबी में रही ममता को कपड़े खरीदने और इकट्ठा करने का शौक ही नहीं है. आज भी उनके घर जो मेहमान आते हैं वो उन्‍हें मुरमुरे और पानी ही देती हैं.

    Tags: BJP, Kolkata, Mamta Bannerjee, Narendra modi, TMC

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