ये हैं मैंग्रूव, जानें ये 'फानी' जैसे तूफानों से हमें कैसे बचाते हैं

जब चक्रवाती तूफान आते हैं और समुद्री तटों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, तब मैंग्रूव की जड़ें और शाखाएं हमारे लिए मोर्चा संभालती हैं. ये तूफानों को बेअसर कर हमें बचाती हैं. जानें क्या है इस कुदरती देन का अजूबा और क्या है हमारी करतूत?

News18Hindi
Updated: July 2, 2019, 10:18 PM IST
ये हैं मैंग्रूव, जानें ये 'फानी' जैसे तूफानों से हमें कैसे बचाते हैं
मैंग्रूव वनस्पति का जंगल.
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Updated: July 2, 2019, 10:18 PM IST
पिछले दिनों फानी तूफान के चलते ओडिशा में हुई मौतों और बर्बादी के बाद राहत कार्य जारी हैं. ये आप जानते हैं कि तूफान आने से पहले तूफान से लड़ने की तैयारी करते हुए तटीय इलाकों के लोगों को विस्थापित किया गया था और कुछ सुरक्षा इंतज़ाम भी हुए थे. लेकिन, सवाल ये है कि क्या ऐसी तैयारी से बेहतर ये नहीं है कि ऐसे तूफानों को आने से ही रोका जा सके या किसी हद तक लगाम लगाई जा सके? चूंकि बंगाल की खाड़ी में चक्रवात बनते ही रहते हैं तो क्या ऐसा मुमकिन है? आपको शायद हैरानी हो जानकर कि इस सवाल का जवाब है हां!

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अगर आप मैंग्रूव के पौधों का जाल बिछाएं तो काफी हद तक ये मुमकिन है.

जी हां, मैंग्रूव ऐसे पेड़ और झाड़ियां हैं, जो समुद्री तटों पर समुद्र और तट की ज़मीन के बीच के हिस्से में जड़ें फैलाते हैं और एक ऐसा जाल तैयार करते हैं, ​जो चक्रवातों के असर को रोकने में मददगार साबित होता है. आइए कुदरत के इस अजूबे और इसके जान बचाने वाले हुनर के बारे में ज़रा तफ़्सील से जानें.

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डेल्टा में होते हैं मैंग्रूव
उष्ण ​कटिबंध क्षेत्रों में पाए जाने वाले पौधों की इकलौती प्रजाति मैंग्रूव है, जो खारे पानी में भी पनपती है. भारत में मैंग्रूव के जंगल उन जगहों पर पाए जाते हैं, जहां नदियां समुद्रों से मिलती हैं यानी डेल्टा. पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के बीच के तटीय इलाकों में मैंग्रूव के जंगल देखे जाते हैं, जहां कई प्रमुख नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं.
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ओडिशा के तटबंधों पर मैंग्रूव. इनके झाड़ों की जड़ें और शाखाएं तूफान का सामना करने में कारगर साबित होती हैं.


ऐसे जाल बिछाते हैं मैंग्रूव
जब चक्रवात आते हैं, तब तटीय इलाकों में भारी नुकसान होता है. लेकिन, इनसे निपटने के लिए मैंग्रूव बेहद कारगर साबित होते हैं. मैंग्रूव की जड़ें और शाखाएं मिलकर एक मोर्चा बनाते हैं, जो खारे पानी की घुसपैठ रोकते हैं और आंधी के लिए भी तोड़ साबित होते हैं.

तटीय पर्यावरण पद्धति के विषय में विशद अध्ययन कर चुके और आंध्र यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर नागेश्वर राव का कहना है 'चूंकि डेल्टा क्षेत्र सीधे समुद्री स्तर पर ही बसे होते हैं, इसलिए अगर आपको समुद्र स्तर से एक मीटर भी ऊपर जाना हो तो 10 से 15 किलोमीटर का सफर करना होता है. यानी समुद्री स्तर ज़रा भी बढ़े तो इन इलाकों को खतरा हो सकता है. ऐसे में केवल मैंग्रूव ही हैं, जो जान बचा सकते हैं'.

सुपर तूफान में जान बचा चुके हैं मैंग्रूव
ओडिशा के केंद्रापाड़ा में टीचर रह चुके हेमंत राउत कहते हैं '1999 में जो सुपर चक्रवाती तूफान आया था, जिसमें ओडिशा में 10 हज़ार के करीब जानें गई थीं, तब भी मैंग्रूव ने ही गांवों को बचाया था'. राउत ने बताया कि तब मैंग्रूव से उन्हें प्रेरणा मिली और उन्होंने 25 से 30 एकड़ के इलाके में इन झाड़ों का प्लांटेशन करवाया.

क्या कहा रिसर्च ने?
2005 में भारत के वन्यजीवन इंस्टीट्यूट ने तीन गांवों पर ​एक रिसर्च केंद्रित की, बांकुआल, बंधमाल और सिनगिडी. इनमें से केवल बांकुआल में मैंग्रूव का एक जंगल था, बाकी दो जगह नहीं. रिसर्च में पाया गया कि जहां मैंग्रूव जैसे तटबंध थे, वहां तूफान बढ़ने का असर न के बराबर हुआ, जबकि जहां ऐसे तटबंध नहीं थे, वहां काफी नुकसान हुआ. इस स्टडी ने यह भी कहा कि 'मानवनिर्मित समुद्री बचाव के तरीके महंगे भी हैं और कई मामलों में असरकारी भी नहीं साबित होते'.

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स्रोत : एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन


इस स्टडी में निष्कर्ष तौर पर कहा गया कि मैंग्रूव जंगल कुदरती देन हैं​ जिनकी मदद से तूफान के समय में एक रक्षाकवच मिलता है. 'साथ ही, उन इलाकों में तूफान का भारी असर होने का खतरा भी बढ़ गया है, जहां विकास, कृषि और बसाहट के लिए मैंग्रूव के जंगल काट दिए गए हैं'.

मैंग्रूव कवर पर बढ़ते खतरे
देश में विकास के बढ़ते कार्यक्रमों से तटीय इलाकों के मैंग्रूव इकोसिस्टम के लिए खतरा पैदा हो गया है. तटीय इलाकों में बंदरगाहों का निर्माण, पर्यटन, औद्योगिकीकरण के साथ ही कृषि, एक्वाकल्चर और लकड़ी कटाई के लिए बड़ी आबादी भी यहां बसने आने लगी है. पिछले समय ये भी खबर आई थी कि मुंबई अहमदाबाद हाई स्पीड ट्रेन कॉरिडोर के लिए 32 हज़ार मैंग्रूव साफ कर दिए जाएंगे.

कुछ स्टडीज़ बताती हैं कि पिछले 30 सालों में भारत के पश्चिमी तटीय इलाकों में बने मैंग्रूव कवर का 40 फीसदी हिस्सा या तो कृषि या आवासीय कॉलोनी में बदल चुका है. वहीं, 35 हज़ार हेक्टेयर के मैंग्रूव कवर को झींगा खेती के लिए हटा दिया गया है.

भारत के फॉरेस्ट सर्वे की 2017 की रिपोर्ट की मानें तो देश में मैंग्रूव कवर 2013 से 2017 के बीच 181 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बढ़ा है. लेकिन, इन आंकड़ों के साथ दो बड़े डिस्क्लेमर दिए गए हैं इसलिए इन्हें ध्यान से समझा जाना चाहिए. इसे एक विशेषज्ञ यानी ओडिशा के एक शोधकर्ता राजन पंडा की ज़बानी समझिए.

'पहला, रिपोर्ट के आंकड़े इस पर आधारित हैं कि बने बनाए यानी कुदरती तौर पर तैयार मैंग्रूव कवर को हटाकर, इस नुकसान की भरपाई के लिए अलग से मैंग्रूव कवर का प्लांटेशन किया गया, यानी ये पूरी तरह पनपा नहीं है. इसका मतलब ये है कि इन्हें पनपने में लंबा समय लगेगा. नए प्लांटेशन से मैंग्रूव के जंगलों को ​हटाया जाना जस्टिफाई नहीं हो जाता.'

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पंडा के मुताबिक दूसरी बात ये भी है कि जो प्लांटेशन किया गया है, वो मोनोकल्चर है और इस तरह से हम कुदरती मैंग्रूव कवर के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते, जिसमें कई प्रजातियों का प्राकृतिक जंगल था. और, दूसरा डिस्क्लेमर ये है कि भारत में मैंग्रूव कवर का 40 फीसदी हिस्सा खुला हुआ और ​तितर बितर है यानी बिखराव के साथ फैला हुआ है.

ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि हम कुदरत की इस अनोखी देन को समझें और मैंग्रूव कवर की न केवल हिफाज़त करें बल्कि इसे और फैलाने के लिए सही और अनुकूल कोशिशें करें.

(रिपोर्ट : रिषिका पारदीकर)

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First published: July 2, 2019, 9:44 PM IST
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