मणिपुर का कबीला, जिसके सिर्फ एक आदमी को पता है फोक कल्चर!

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यूनेस्को (UNESCO) की 'भूली बिसरी जनजाति' की इस आबादी ने एक दशक पहले पुरज़ोर दावे किए थे कि वो पूरी शिद्दत से जी रही है. अब दर्दनाक हकीकत है कि कैसे इतिहास और संस्कृति (North-East Culture) खो रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 11, 2021, 9:37 AM IST
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उत्तर पूर्व (North-East), भारत का वो हिस्सा है, जहां कुदरत की गोद में कई राज़ छुपे हुए हैं और कुछ ऐसे इतिहास भी, जो खो रहे हैं. साल 2009 था, जब यूनेस्को ने 'तराओ' को विलुप्ति (Tarao Extinction) की कगार पर पहुंच गई भाषा करार दिया था. तब इस भाषा के बोलने वाले करीब 1000 लोग थे, लेकिन 900 से भी कम रह गए हैं. इन 900 में से भी सिर्फ एक व्यक्ति बाकी है, जो इस भाषा के लोकगीत (Folk Songs) जानता है और इस तराओ जनजाति के पारंपरिक वाद्य यंत्र (Folk Music Instruments) बजा सकता है.

मणिपुर के हीककपोकपी गांव के मुखिया हैं लामताचाओ, जो अब इकलौते तराओ व्यक्ति रह गए हैं, जो इसकी परंपरा के बारे में मालूमात रखते हैं. यह जनजाति और भाषा 'मणिपुर की भूली बिसरी जनजाति' कहलाती है, जो पिछले कुछ दशकों से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है.

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लामताचाओ और तराओ का फैलाव
तराओ जनजाति की भाषा बोलने 800 से कुछ ज़्यादा लोग मणिपुर के छह गांवों में बसे हैं. हीककपोकपी के अलावा, लाइमनाई, लिशोकचिंग, खुरिंगमूल के साथ ही उखरूल ज़िले के सनकीथेल गांव में यह आबादी रहती है. इस पूरी आबादी में अब सिर्फ लामताचाओ ही शेष हैं, जो परंपरा को संभाले हुए हैं.

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तराओ आबादी अपने ​अस्तित्व के संकट से जूझ रही है.

उनके मुताबिक साल 2011 में उन्होंने पहली बार अपनी जनजाति के पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोकगीतों को सीखना शुरू किया था. 70 की उम्र के करीब लामताचाओ ने इम्फाल फ्री प्रेस को बताया कि उस वक्त तराओ के गांवों में चार या पांच बुज़ुर्ग थे जो संगीत व गीत परंपरा को जानते थे. लेकिन अब, लामताचाओ के भाई के साथ ही वो सब गुज़र चुके हैं.



आखिर कौन हैं तराओ लोग?

2001 की जनगणना के मुताबिक तराओ लोगों की आबादी 870 थी. मणिपुर के चंदेल ज़िले में ही यह अल्पसंख्यक आबादी ज़्यादा रहती है, जिसे तराओ नागा भी कहा जाता रहा. इनका इतिहास 13वीं सदी से मिलता है और इन्हें मणिपुर की सबसे पुरानी जनजातियों में शुमार किया जाता है.

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पारंपरिक और ऐतिहासिक रूप से यह आबादी खेती बाड़ी के काम से जुड़ी रही है और अब भी तराओ का मुख्य काम केन और बांस से ही जुड़ा है. ये लोग साल भर चटाइयां बुनने जैसा काम करते हैं या फिर पौधों व फसलों वाले खेतों में मेहनत करते हैं. बताया जाता है कि मणिपुर की सबसे सूखी ज़मीन इनकी किस्मत में रही.

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तराओ पर संकट और गुस्सा!

भाषा विज्ञान के नज़रिये से तराओ भाषा को तिब्बत व बर्मा के परिवार की माना जाता है. 2009 में जब यूनेस्को ने इसे विलुप्त हो रही भाषाओं की लिस्ट में शुमार किया था, जब तराओ लोगों ने अपने गुस्से का खुलकर इज़हार किया था. उस समय तराओ ट्राइब यूनियन, तराओ स्टूडेंट यूनियन, तराओ चोटनू जूरी और तराओ की लिटरेचर कमेटी ने एक साझा बयान जारी कर कहा था कि 'तराओ अभी मरे नहीं हैं, पूरी तरह ज़िंदा हैं.'

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मणिपुर सहित उत्तर पूर्व की कई भाषाओं और जनजातियों पर अस्तित्व का संकट है.

तराओ लोगों ने उस वक्त साफ कहा था कि आबादी कम होने को आप किसी की पहचान खोने का मापदंड नहीं कह सकते. तराओ लोगों ने कई बातों पर ऐतराज किया था, जैसे अकादमी के लोग सर्वे करने के लिए फील्ड पर आए बगैर ही आंकड़ेबाज़ी करते हैं और कहा था कि अकादमिक सपोर्ट बढ़ाने से भाषा और जनजाति का संरक्षण संभव है, विलुप्त होने की लिस्ट में शुमार कर देने से नहीं.

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सिस्टम को लेकर तराओ लोगों ने उस वक्त साफ तौर पर कहा था कि वो अपनी पहचान और भाषा को बचाने के लिए मज़बूती से कोशिश कर रहे हैं और 'अप्राकृतिक मौत' उन्हें कबूल नहीं होगी. लेकिन अब लामताचाओ के बयान से साबित हो रहा है कि इतिहास व संस्कति का एक अध्याय कैसे खत्म हो रहा है.

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