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कनाडा से लौटेगी 18वीं सदी पुरानी देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति, जानिए, क्या है खास

प्रतिमा वाराणसी से चुरा ली गई और तस्करी के जरिए कनाडा पहुंच गई- सांकेतिक फोटो (pikrepo)
प्रतिमा वाराणसी से चुरा ली गई और तस्करी के जरिए कनाडा पहुंच गई- सांकेतिक फोटो (pikrepo)

लगभग 100 साल पहले प्रतिमा वाराणसी से चुरा ली गई और कनाडा पहुंच गई. अब देवी अन्नपूर्णा (goddess Annapurna) की मूर्ति की वापसी का जिक्र खुद पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने किया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 29, 2020, 3:16 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में कनाडा से मां अन्नपूर्णा की मूर्ति वापस लाने की बात बताई. वाराणसी (तत्कालीन बनारस) से लगभग सौ साल पहले ये मूर्ति तस्करी के जरिए कनाडा पहुंच गई. मूर्ति का इतिहास काफी पुराना है और इसके लौटने को अच्छा संकेत माना जा रहा है. बता दें कि कुछ महीनों पहले ही शिव प्रतिमा के भी ब्रिटेन से वापस लौटने का एलान हुआ.

क्या खास है मूर्ति में 
माता अन्नपूर्णा यानी हिंदू माइथोलॉजी में अन्न और संपदा की देवी की ये मूर्ति 18वीं सदी की बताई जा रही है. 100 साल पहले वाराणसी में ये तस्करों के हाथ लगी और इंटरनेशनल बॉर्डर पार करते हुए कनाडा जा पहुंची. लंबे समय से ये यूनिवर्सिटी ऑफ रेजिना के मैंकेंजी आर्ट गैलरी (MacKenzie Art Galler) का हिस्सा बनी हुई थी. अब भारत ने तस्करी से गायब हुई कलाकृतियों को वापस पाने का अभियान चलाया है, जिसके तहत कनाडा सरकार से भी बात हुई.

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कैसे हुई पहचान


फिलहाल मूर्ति ओटावा में भारतीय हाई कमिश्वर को दी जा चुकी है. वैसे मूर्ति के भारतीय कनेक्शन को खोजने का किस्सा काफी दिलचस्प है. हुआ ये कि मूर्ति के हाथों में खीर से भार कटोरा और चम्मच है. ये देखकर पीबॉडी एसेक्स म्यूजियम में सेवाएं दे रहे भारतीय अधिकारी ने पहचाना लिया कि ये मां अन्नपूर्णा  की प्रतिमा है.

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माता अन्नपूर्णा यानी हिंदू माइथोलॉजी में अन्न और संपदा की देवी - सांकेतिक फोटो (twitter)


हमेशा से होती आई है तस्करी
देश से कलाकृतियों की चोरी कोई नई घटना नहीं. एक अनुमान के मुताबिक देश से हर साल औसतन 10000 प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां चोरी की जाती हैं और तस्करी से विदेशों में चली जाती हैं. इनमें से कई बहुत ज्यादा भारी और मूल्यवान होती हैं. तांबे और कांसे या मिश्रित धातुओं से बनी कई मूर्तियां 15 से 16 टन तक की होती हैं.

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न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से बताया गया है. इस बारे में सिंगापुर में भारतीय मूल के व्यापारी और शिपिंग एग्जीक्यूटिव एस विजय कुमार कहते हैं कि हर दशक में कम से कम 10 हजार बहुमूल्य कृतियां भारत से तस्करी की जाती हैं. विजय भारतीय मूर्तियों की चोरी को लगभग दो दशकों से देख रहे हैं. इस बारे में साल 2018 में एक किताब भी आई है, द आइडल थीफ यानी मूर्ति चोर. किताब में देश के मूर्तियों की तस्करी कैसे होती है, इस बारे में बताया गया है.

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अधिकतर मूर्तियां समुद्र के रास्ते से स्मगल होती हैं. भारी मूर्तियों को तब कस्टम से बचाते हुए लाया जाता है और कहीं पकड़ाई में आ भी गए तो उन्हें पीतल की बगीचे में सजाने वाली मूर्तियां बताया जाता है. इसके लिए भारी रिश्वत भी दी जाती है. समुद्री रास्ते से एक देश से दूसरे देश पहुंचने के बाद काला बाजार में उन्हें भारी कीमत पर बेचा जाता है. जहां से तस्करों का ही सफेदपोश गिरोह मूर्तियों को विदेशी रईसों को और ऊंची कीमत पर बेच देता है. इसके बाद भी ये कीमत मूर्ति की असल कीमत से काफी कम होती है.

अधिकतर तस्करी पानी के रास्ते से की जाती है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


तस्करी की हुई मूर्तियों का कोई लीगल डॉक्युमेंट नहीं होता है कि वो किस धातु से बनी हैं. कहां से हैं. किस काल की हैं या किस कलाकार की हैं. ये सारी जानकारी सिर्फ तस्कर के पास होती हैं, जो जानकर निजी संग्रहकर्ताओं से छिपाई जाती हैं ताकि वे बेझिझक मूर्ति खरीद सकें.

क्या हैं तस्करी रोकने के नियम
वैसे देश में एंटीक चीजों की चोरी को रोकने के लिए The Antiquities and Art Treasures Act, 1972 बना हुआ है. इसके तहत धातु से बनी मूर्तियां, पत्थरों से बनी मूर्तियां या दूसरे तरह के आर्ट वर्क, पेंटिंग्स, आभूषण, कागजों पर उकेरी कलाकृतियां, लकड़ी पर नक्काशी, कपड़े पर कलाकृति के साथ-साथ सैकड़ों साल पुरानी पांडुलिपियों को तस्करी से बचाना भी शामिल है.

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एंटीक एक्ट ये भी कहता है कि इस तरह की प्राचीन कलाकृति अगर किसी निजी संग्रहकर्ता के पास हो तो उसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में इसे रजिस्टर करना होगा. और अगर देश के भीतर भी किसी वजह से कलाकृति किसी दूसरे को बेची जाए तो उसे लाइसेंस लेना होगा. अगर कोई इसका पालन न करे तो उसे सजा का भी प्रवधान है. हालांकि कई वजहों से इस एक्ट का सही ढंग से पालन नहीं हो पा रहा है. यही वजह है कि हर साल अरबों-खरबों कीमत की भारतीय कलाकृतियों दूसरे देशों में जा रही हैं.


तस्करी की हुई मूर्तियों का कोई लीगल डॉक्युमेंट नहीं होता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


नहीं है डाटाबेस
भारत में अपने ही आर्टवर्क का सही तरीके से लेखा-जोखा नहीं रखा गया है. National Mission for Monument and Antiquities के मुताबिक देश में कम से कम 7 मिलियन प्राचीन चीजें हैं. लेकिन इनमें से केवल 1.3 मिलियन एंटीक चीजों का ही डॉक्युमेंटेशन हो सका है. कमेटी बनने के बाद भी कड़े नियम नहीं हो सके और बने भी तो उनका पालन नहीं कराया जा सका. समुद्री सीमाओं पर कड़ी निगरानी न होना भी तस्करी को बढ़ा चुका है.

ट्रैकिंग के बाद भी लौटना आसान नहीं
वैसे दूसरे देशों में गई कई कलाकृतियां इंटरनेशनल संधि के तहत लौट भी आती हैं. चूंकि भारत 1970 यूनेस्को ट्रीटी में शामिल है, इसलिए देश अगर अपने यहां भारत की कोई प्राचीन कृति अपने यहां पाते हैं, तो वे उसे लौटा सकते हैं. हालांकि एक बार अगर आर्ट वर्क देश से बाहर निकल जाए तो उसे पाना आसान नहीं होता. बहुत बार ये निजी संग्रहकर्ता के पास पहुंच जाते हैं, जहां ये ट्रैक भी नहीं हो पाते.
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