प्रोटेम स्पीकर को लेकर हो चुके हैं विवाद, महाराष्ट्र में क्या होगा

बीते कुछ सालों में प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को लेकर विवाद हो चुके हैं. अब देखना है महाराष्ट्र में क्या होगा?
बीते कुछ सालों में प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को लेकर विवाद हो चुके हैं. अब देखना है महाराष्ट्र में क्या होगा?

बीते कुछ सालों में स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण राज्यों में प्रोटेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) की नियुक्ति को लेकर विवाद (Controversy) हो चुका है. सबसे नजदीकी मामला कर्नाटक, गोवा और मणिपुर का है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 26, 2019, 2:56 PM IST
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मुंबई. भारतीय संसदीय सिस्टम (Indian Constitutional System)  में प्रोटेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) बनाए जाने की पुरानी संवैधानिक परंपरा रही है. प्रोटेम स्पीकर की मुख्य जिम्मेदारी सामान्य तौर विधायकों/सांसदों को शपथ दिलवाने की होती है. लेकिन जब चुनाव में किसी भी दल पूर्ण बहुमत हासिल नहीं होता है तब प्रोटेम स्पीकर की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. ऐसे स्थिति में प्रोटेम स्पीकर बहुमत परीक्षण भी कराना होता है. कई बार राजनीतिक दलों की बीच गर्मागर्मी की स्थिति ज्यादा बढ़ जाती है तब भी यह प्रोटेम स्पीकर की ही जिम्मेदारी होती है कि वो सदन में बहुमत परीक्षण शांतिपूर्ण ढंग से करवाए.

नतीजे आने के बाद मची खींचतान
बीते 24 अक्टूबर को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राज्य में खींचतान मची है. सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी है लेकिन वो भी बहुमत से काफी दूर है. कोई दल गवर्नर के सामने ये साबित नहीं कर पाया कि उसके पास बहुमत के लिए जादुई आकड़ा मौजूद है. इसके बाद गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया. देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथग्रहण करने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य में 27 नवंबर को बहुमत परीक्षण कराया जाए. कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति के भी आदेश दिए हैं.

बीते कुछ सालों में स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण राज्यों में प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को लेकर विवाद हो चुका है. सबसे नजदीकी मामला कर्नाटक, गोवा और मणिपुर का है.
कर्नाटक में केजी बोपैय्या पर विवाद


साल 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी सिंगल लारजेस्ट पार्टी बनी थी. वह बहुमत के आंकड़े से बस कुछ अंक दूर रह गई थी. दूसरे नंबर पर कांग्रेस और तीसरे नंबर पर जनता दल सेकुलर थे. नतीजा आने पर किसी भी पार्टी के पास बहुमत नहीं था लेकिन कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देकर सरकार की तस्वीर साफ कर दी थी. लेकिन गवर्नर वजूभाई वाला ने सबसे पहले सिंगल लारजेस्ट पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को बुलाया. गवर्नर ने प्रोटेम स्पीकर के लिए केजी बोपैय्या को चुना.

62 वर्षीय बोपैय्या तीन बार बीजेपी विधायक रह चुके थे. उनका नाम आने पर बवाल मच गया. इसका कारण ये था वरिष्ठता के आधार पर दो विधायकों का नाम आ रहा था. कांग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी बीएस येदियुरप्पा. अब चूंकि बीएस येदियुरप्पा सीएम बन गए थे और उन्हें बहुमत साबित करना था तो परंपरा के आधार पर आरवी देशपांडे को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाना चाहिए था. लेकिन बोपैय्या बनाए गए. इस पर कांग्रेस की तरफ से तीखा विरोध दर्ज कराया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पक्षपातपूर्ण करार दिया था.

गोवा में विवाद
कर्नाटक की तरह ही 2017 में गोवा में प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को लेकर विवाद हुआ था. तब बहुमत परीक्षण के लिए दो बार के बीजेपी विधायक सिद्धार्थ कुंकोलिएंकर को प्रोटेम स्पीकर बनाया गया था. तब भी कांग्रेस ने परंपरा का निर्वहन न किए जाने को लेकर विरोध दर्ज कराया था. ऐसे ही मणिपुर और मेघालय में भी विवाद हुआ था. मणिपुर में कम अुनभवी बीजेपी विधायक वी हांगखालियान को प्रोटेम स्पीकर बनाया गया. इसी तरह मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी के वरिष्ठ नेता टिमोथी डी शिरा के नाम पर भई विवाद हुआ था. मेघायल में बहुमत परीक्षण डी शिरा ने ही करवाया था.
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