मंगल पर और आगे जाने के लिए काम की साबित हो सकती है यह तकनीक

नई तकनीक निर्वात (Vaccum) अंतरिक्ष (Space) में हमारे यानों (Spacecraft) को बहुत ही ज्यादा गति मिल सकेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर:pixabay )

नई तकनीक निर्वात (Vaccum) अंतरिक्ष (Space) में हमारे यानों (Spacecraft) को बहुत ही ज्यादा गति मिल सकेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर:pixabay )

मंगल ग्रह (Mars) या उससे भी लंबे अंतरिक्ष अभियानों (Space Missions) के लिए ईंध (Fuel) की समस्या नई फ्यूजन रॉकेट थ्रस्टर (Fusion Rocket Thruster) तकनीक सुलझा सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 31, 2021, 6:46 AM IST
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नासा (NASA) अभी आर्टिमिस अभियान (Artemis) पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं. लेकिन यह अभियान नासा के भविष्य के अभियानों (Future missions) के लिए एक भूमिका होगा. इसके बाद नासा का एक ही लक्ष्य पर जोर रहने की उम्मीद है और वह है मंगल (Mars) का मानव अभियान. चंद्रमा (Moon) से इंसानों को लौटाने के बाद अब नासा के लंबे अभियानों की तैयारी पर तेजी से काम होने की उम्मीद है. इसमें सबसे कड़ी चुनौती इतनी लंबी यात्रा के लिए ईंधन (Fuel) की व्यवस्था करना है. ऐसे में फ्यूजन रॉकेट थ्रस्टर (Fusion Rocket Thruster) तकनीक मददगार हो सकती है.

बहुत सारी चुनौतियों से निपटना होगा

दरअसल मंगल पर इंसान को लेकर जाना और उसे वापस लाना एक नहीं बहुत ही चुनौतियों का एक पिटारा होगा. इसमें कई चुनौतियों पर एक साथ काम चल रहा है और समाधान मिलने की उम्मीद भी दिख रही है. इन चुनौतियों में यात्रियों को लंबे समय तक अंतरिक्ष, फिर मंगल, और फिर वापसी में अंतरिक्ष में जैविक और मनोवैज्ञानिक रूप से रह पाना एक बहुत ही बड़ी चुनौती है वावजूद इसके कि बहुत सारे अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक इंटरनेशनल स्पेस में रह चुके हैं.

ईंधन की व्यवस्था बड़ी चुनौती
ऐसी और भी चुनौतियों पर काम चल रहा है, लेकिन सबसे अहम चुनौती है मंगल तक यान में ईंधन की व्यवस्था. वैसे तो मंगल ग्रह पर ईंधन बनाने के लिए नासा ने मंगल पर भेजे गए पर्सवियरेंस रोवर के साथ एक प्रयोग भेजा है जिसमें मंगल की कार्बन डाइऑक्साइड से ऑक्सीजन बनाया जाएगा जो मंगल यात्रियों के लिए वापसी के लिए ईंधन के तौर पर काम कर सकती है. लेकिन इसके नतीजे आने में समय है.

क्यों होगी बहुत सारे ईंधन की जरूरत

मंगल पर जाने के लिए अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने के लिए यानि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण मुक्त होने के लिए और उसके बाद मंगल तक की लंबी दूरी क कारण बहुत सारे ईंधन की जरूरत होगी. वैसे तो इसका एक समाधान अंतरिक्ष में दूसरे यान से रीफ्यूलिंग हो सकता है. लेकिन यह पक्का समाधान होगा यह स्पष्ट नहीं है.



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इस तकनीक ने मंगल ग्रह (Mars) तक की यात्रा के लिए ईंधन (Fuel) की कई समस्या का समाधान सुझाया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

इस डिजाइन से उम्मीद

इस समाधान की उम्मीद स्काइ रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के एनर्जी प्रिंसटन प्लाजमा फिजिक्स लैबोरेटरी (PPPL) की भौतिकविद डॉ फातिमा इब्राहिमी की एक डिजाइन में नजर आ रही है. उन्होंने एक फ्यूजन रॉकोट थ्रस्टर डिजाइन किया है जो वर्तमान में हो रही अंतरिक्ष यात्रा को और तेज कर सकता है. इस रिपोर्ट के अनुसार रॉकेट मैग्नेटिक फील्ड का उपयोग करेगा जो प्लाज्मा कणों को दागेगा. ये कण वास्तव में विद्युतीय आवेशित गैस के कण होंगे जो अंतरिक्ष के निर्वात में यान को तेजी से आगे धकेलेंगे.

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10 गुना तेज गति

बताया जा रहा है कि इस तकनीक से रॉकेट की गति अभी तक के किसी भी यान या सिस्टम से 10 गुना ज्यादा तेज हो जाएगी. बहुत कम लोग जानते हैं कि आज भी अंतरिक्ष अभियानों में प्लाज्मा प्रपल्शन इंजनों का उपोयग होता है लेकिन वे कणों के फेंकने काम विद्युतक्षेत्रों के उपयोग के जरिए करते हैं.  लेकिन डॉ इब्राहिमी की डिजाइन मैग्नेटिक रीकनेक्शन का उपोयग करती है.

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यह तकनीक हमारे सौरमंडल (Solar System) के दूसरे ग्रहों (Planets) तक की यात्रा भी संभव बना सकेगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

ऐसे पैदा होगी ऊर्जा

यह प्रक्रिया हमारे ब्रह्माण्ड में बहुत आम है. इसे केवल सूर्य सतह पर अवलोकित गया है. जब भी मैग्नेटिक फील्ड सूर्य से जुड़ने से या अलग होने से पहले उसकी सतह पर अभिसारित होती है, यानि एक बिंदु पर मिलने की कोशिश करती है, तब एक विशाल मात्रा में ऊर्जा निकलती है. यही अवधारणा इस डिजाइन में भी मिलती है. इस तरह की ऊर्जा वाहनों के टायर के ट्यूब के आकार, जिसे टॉरस कहते हैं, की मशीनों में पैदा होगी जिन्हें टोकमाक्स कहते हैं.

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यह मशीन ऐसे मैग्नेटिक बबल या प्लास्मोइड्स बनाती है जो 20 किलोमीटर प्रति सेंकड की रफ्तार से चलते हैं इससे हमारे यान मंगल ही नहीं आगे के भी यात्राएं संभव हो जाएंगी. फिर भी यह समस्या केवल निर्वात में ही काम करेगी और वातावरण में प्रवेश करने के बाद ईंधन की चुनौती कायम रहेगी. इन हालातों में अभी निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है

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