मंगल और चांद के लावा ट्यूब में हो सकता है अंतरिक्ष यात्रियों का ठिकाना- शोध

मंगल और चांद के लावा ट्यूब में हो सकता है अंतरिक्ष यात्रियों का ठिकाना- शोध
मंगल और चंद्रमा पर कई विशाल लावा ट्यूब्स हैं जहां इसान ठहर सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर, नासा)

वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रमा (Moon) और मंगल ग्रह (Mars) पर लावा की विशाल सुरंगे या गुफाएं (Lava Tubes) हैं जो इंसान के रहने के लिए उपयुक्त हो सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 7, 2020, 1:16 PM IST
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मंगल ग्रह (Mars) इस समय दुनिया भर के वैज्ञानिकों के अध्ययन का केंद्र है. इसके अलावा पृथ्वी (Earth) के बाहर इंसान को लंबे समय तक ठहराने का वातावरण बनाने पर भी गंभीरता से शोधकार्य चल रहा है. इसी बीच वैज्ञानिकों का कहना है कि मंगल और चंद्रमा (Moon) पर लावा ट्यूब्स (Lava Tubes) ऐसी जगह हैं जो इंसान के ठहरने के लिए उपयुक्त हो सकते हैं.

क्या होती हैं ये लावा ट्यूब्स
लावा ट्यूब वह सुरंग या गुफा होती है जो किसी पहाड़ या पर्वत पर ज्वालामुखी फटने के बाद वहां से लावा निकलने के बाद जगह खाली होने से बन जाती है. पृथ्वी पर ये सुरंगें या गुफाएं ज्यादा चौड़ी या लंबी नहीं होती हैं, लेकिन मंगल और  चंद्रमा पर बहुत से विशाल लावा के ट्यूब हैं.

पृथ्वी पर हैं इस तरह की कई ट्यूब्स
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये इतने ज्यादा बड़े हैं कि ये अंतरिक्ष यात्रियों के ठिकाने हो सकते हैं. इस शोध ने पृथ्वी पर इस तरह की ट्यूब के पड़ताल की है और उनके बारे में यह आंकलन करने कि कोशिश की है कि क्या ऐसी और इससे बड़ी सुरंगें दूसरे ग्रहों पर की सतह के नीचे मौजूद हैं या नहीं.



बहुत उपयोगी हो सकती है चांद और मंगल पर ये ट्यूब्स
आने वाले सालों में जिस तरह से चंद्रमा और मंगल ग्रह पर इंसान के लंबे समय तक ठहराने की योजनाएं बनाई जा रही हैं और प्रयास किए जा रहे हैं, उसे देखते हुए माना जा रहा है कि इस तरह की ट्यूब या सुरंगें अंतरिक्ष यात्रियों को उन खतरनाक विकिरणों से बचा सकती हैं जिसे पृथ्वी पर उसका मैग्नेटिक फील्ड इंसानों का बचा लेता है. इस तरह की कोई भी सुरक्षा मंगल या चंद्रमा पर नहीं हैं. ऐसे में यहां की सतहों पर अंतरिक्ष यात्रियों का सुरक्षित रह पाना मुश्किल है.

पृथ्वी से कई गुना बड़ी होती हैं ये चांद-मंगल पर
यह समस्या केवल मंगल और चंद्रमा पर ही नहीं बल्कि दूसरे ग्रहों पर भी होगी. माना जाता है कि चंद्रमा पर इस तरह की जो ट्यूब या सुरंगें हैं वे पृथ्वी पर पाई गई ट्यूब्स से हजार गुना ज्यादा चौड़ी हैं और तीस मीटर तक की लंबाई की हो सकती है. इनके विशाल आकार की वजह यहां पर कम गुरूत्व का होना बताया जाता है.

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क्यों होती हैं वहां ये इतनी विशाल
अर्थ साइंस रीव्यूज में प्रकाशिक इस शोध के मुताबिक चंद्रमा और मंगल पर इन ट्यूब्स के बड़े आकार के बावजूद ये ट्यूब एक घर की तरह होने के लिए पर्याप्त रूप स्थायी हैं. कम गुरुत्व के कारण इन ट्यूब के ध्वंस होने की संभावना भी लगभग खत्म हो जाती है. इस शोध में यूरोपीय स्पेस एजेंसी और बोलोग्ना और पाडुआ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पृथ्वी पर इस तरह की सुरंगों का अध्ययन किया जो हवाई, कैनरी द्वीपों,ऑस्ट्रेलिया और आइसलैंड में पाई गई हैं.

कैसे किया गया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने चंद्रमा और मंगल पर खत्म हो चुकी ट्यूब्स का भी अध्ययन कर उनके आकार को नापा. इसके लिए उन्होंने विभिन्न अंतरिक्ष यानों से ली गई तस्वीरों और अन्य आंकड़ों की सहायता ली.  उन्होंने इनके आंकड़ो से पृथ्वी के सतह पर खत्म हो चुकी सुरंगों से तुलना की जिससे उन्हें खत्म हो चुकी सुरंगों और सुरक्षित रही सुरंगों के बारे में संबंध स्थापित करने में मदद मिली. शोधकर्ताओं ने पाया दूसरे ग्रहों की ट्यूब्स यानि सुरंगों या गुफाएं खत्म होने से पहले काफी बड़ी हो जाती है.

एक छोटा शहर तक समा सकता है इनमें
इस अध्ययन के एक शोधकर्ता और पाडुआ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक रिकार्डो पोजोबोन ने बताया, “ये ट्यूब 40 किलोमीटर तक लंबी हो सकती हैं. इससे चंद्रमा की सतह के नीचे के अन्वेषण करने और यहां लंबे समय तक रहने के लिए यह उपयुक्त जगह साबित होगी जहां एक सुरक्षित और स्थायी वातारवण मिल सकता है. इनमें से कई इतने बड़े हैं कि इनमें एक पूरा पाडुआ शहर तक आ सकता है.” इस तरह की ट्यूब्स या सुरंगें मंगल और चंद्रमा पर रिहायशी इलाके बनने की योजना का हिस्सा हो सकती है, जहां अभी पृथ्वी के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक हालात हैं

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क्यों फायदेमंद होंगी ये ट्यूब्स
यूरोपीय स्पेस एजेंसी प्रोग्राम के लिए काम करने वाले इस अध्ययन के एक लेखक फ्रांसिसको साओरो का कहना है कि ये लावा ट्यूब्स कॉस्मिक किरणें, सौरविकिरणों और छोटे उल्कापिंडों के टकराव से एक सुरक्षा कवच की भूमिका निभा सकते हैं, जो कि किसी भी ग्रह की सतह पर होने वाला आमतौर पर होती रहनी वाली घटनाएं हैं. इसके अलावा ये सतह पर होने वाले दिन रात के तापमान के अंतर से भी कम प्रभावित होती हैं.
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